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America is the progenitor of neo-imperialism in world history.

विश्व इतिहास में नव-साम्राज्यवाद का जन्मदाता है अमेरिका

यह सौ फीसदी सच है कि द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिका एक परमशक्तिशाली देश (Super Power) के रूप में उभरा। दरअसल प्रथम एवं द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिका को कोई विशेष क्षति नहीं हुई, सिवाय जापान द्वारा अमेरिकी नौसैनिक अड्डे पर्ल हार्बर पर आक्रमण के। ऐसे में अमेरिका ने ब्रिटेन को पीछे छोड़ते हुए शक्ति अर्जित करना आरम्भ किया, दुर्भाग्यवश उसके एकमात्र प्रतिद्वंदी सोवियत संघ रूस के विभक्तिकरण ने उसे पूरे विश्व का नेतृत्वकर्ता बना दिया।

तत्पश्चात अमेरिका ने महसूस किया कि पुरानी उपनिवेशवादी व्यवस्था को कायम रखना राजनीतिक चेतनायुक्त समाज में असम्भव है अत: उसने विकास एवं सहायता’ (development and aid) के नाम पर कुछ बड़ी अर्न्तराष्ट्रीय संस्थाओं जैसे- विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र संघ, विश्व स्वास्थ्य संगठन तथा विश्व व्यापार संगठन के जरिए नव साम्राज्यवाद की शुरूआत की, जो आज तक प्रगतिशील है। 

आतंकवाद के गढ़ पाकिस्तान को आर्थिक व सैन्य मदद, भारत पर चार- चार बार आर्थिक प्रतिबन्ध, ईराक पर आक्रमण एवं सद्दाम हुसैन को फांसी, वेनेजुएला पर प्रभुत्व व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी तत्पश्चात ईरान पर आक्रमण  सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की हत्या अमेरिकी नवसाम्राज्यवाद के बेहतरीन उदाहरण हैं, जिनसे जुड़ा सच जानने के लिए यह रोचक स्टोरी जरूर पढ़ें।

1. पाकिस्तान को कर्ज एवं सैन्य सहायता 

ताजा आंकड़ों के अनुसार, साल 1948 से लेकर 2016 के बीच महाशक्ति अमेरि​का पाकिस्तान को तकरीबन 78.3 बिलियन डॉलर की सहायता दे चुका है जिसमें सैन्य सहायता भी शामिल है। अमेरिका ने आतंकवादी देश पाकिस्तान को सैन्य सहायता के रूप में F-16 लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर्स में UH-60 ब्लैक हॉक, CH-47 चिनूक, CH-46 सी नाइट तथा बख्तरबंद गाड़ियां, टैंक एवं टोही विमान भी दे रखे हैं। इसके अलावा पाकिस्तानी आर्मी अमेरिका निर्मित छोटी बंदूकें, मोर्टार और एंटी-टैंक हथियार भी उपयोग करती है।

हांलाकि साल 2011 में आतंकवादी अलकायदा नेटवर्क के सरगना ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान के एबटाबाद में अमेरिकी सैनिकों द्वारा मार ​गिराए जाने के बाद से यह सहायता राशि थोड़ी कम हुई थी। किन्तु अमेरिका ने कर्ज के जाल में फंसे पाकिस्तान को एक बार फिर से अपना मोहरा बनाने के लिए सितम्बर, 2024  में आईएमएफ से 07 अरब डॉलर का ऋण मंजूर करवाया। इस बात को पूरी ​दुनिया जानती है कि अमेरिकी प्रभाव के चलते ही आईएमएफ ने पाकिस्तान को इतना बड़ा कर्ज दिया है।

वर्तमान में अमेरिका की नजर पाकिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध प्रांत बलूचिस्तान पर है, जहां से वह तांबा, सोना, प्राकृतिक गैस, कोयला और दुर्लभ खनिजों (क्रोमाइट, संगमरमर) को हासिल करना चाहता है। अमेरिका ने पाकिस्तान के बलूचिस्तान में रेको डिक माइनिंग प्रोजेक्ट के तहत तांबा और सोना निकालने के लिए 1.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग 11,000 करोड़ रुपए से अधिक) के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है।

 2. भारत पर चार बार लगा चुका है आर्थिक प्रतिबन्ध

विश्व राजनीति में अपनी वैश्विक साख बनाए रखने की सियासी नीति के तहत भारत के विरूद्ध महाशक्ति अमेरिका अबतक चार बार आर्थिक प्रतिबन्ध लगा चुका है। यह अलग बात है कि अमेरिकी प्रतिबन्धों के समक्ष प्राकृतिक संसाधनों से सम्पन्न भारत ने कभी भी अपना सिर नहीं झुकाया।

साल 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने अमेरिकी हथियारों का जमकर ​इस्तेमाल किया था, बावजूद इसके भारतीय सेना ने अपनी बढ़त बकरार रखी। ऐसे में युद्ध रोकवाने के नाम पर अमेरिका ने 1965 ई. में भारत पर ​आर्थिक प्रतिबन्ध लगा दिया।

इसके बाद साल 1974 में जब भारत ने पोखरण में अपना प्रथम परमाणु परीक्षण किया तो परमाणु जखीरों का जन्मदाता अमेरिका नाराज हो उठा और उसने अगले 30 सालों के लिए भारत पर प्रतिबंध लगा दिया जिसमें परमाणु तकनीकी सहित सामग्री के निर्यात पर रोक भी शामिल था।

तत्पश्चात साल 1998 के मई महीने में भारत ने पोखरण में दो परमाणु परीक्षण किए, इसके बाद अमेरिका एक बार फिर से भड़क उठा और उसने भारत पर एक साथ कई प्रतिबन्ध लगा दिए। जैसे- हथियारों की बिक्री पर रोक, आर्थिक सहायता और ऋण पर रोक आदि। इतना ही नहीं, अमेरिका ने भारत की परमाणु ऊर्जा कम्पनियों पर भी रोक लगा दिया। अमेरिका इस भ्रम में था कि इससे भारत अलग-थलग पड़ जाएगा और उसकी अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी।

वहीं, साल 2025 के मई महीने में पाकिस्तान के विरूद्ध भारत के ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के बाद अमेरिका ने एक बार फिर से पाकिस्तान को सपोर्ट करने की नीति अपनाई है। ऐसा प्रतीत हो रहा है, अमेरिका अपने इतिहास को पुन: दोहरा रहा है। अमेरिका ने पाकिस्तान को आईएमएफ (IMF) से न केवल ऋण दिलवाने में मदद की अपितु पाकिस्तानी आर्मी चीफ असीम मुनीर को व्हाइट हाउस (white house) में बुलाकर डिनर पार्टी भी दी।

 इतना ही नहीं, अमेरिका ने भारत पर 25 फीसदी टैरिफ लागू करने की घोषणा भी कर दी, फिलहाल इसे घटाकर 18 फीसदी कर दिया है। यह अलग बात है कि अमेरिका अपने टैरिफ कार्ड पर ​चाहे जितनी पैंतरेबाजी कर ले किन्तु भारत उसके समक्ष झुकने वाला नहीं है।

3. इराक पर आक्रमण

ईरान और इराक के बीच 1980 से 1988 के मध्य 8 वर्षों तक युद्ध चला जिसमें तकरीबन 10 लाख लोग मारे गए। इराक के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने ईरान के तेल-समृद्ध क्षेत्रों पर कब्जा करने के उद्देश्य से यह आक्रमण किया था। इस युद्ध के दौरान अमेरिका सहित कई पश्चिमी देशों ने सद्दाम हुसैन को समर्थन के साथ ही आर्थिक व सैन्य मदद दी।

हैरानी की बात है कि उसी सद्दाम हुसैन को अमेरिका ने सामूहिक विनाश के हथियारों के कथित कब्ज़े और आतंकवाद के समर्थन के नाम पर मार्च 2003 में इराक पर हमला कर पकड़ा और अंततः दुजैल नरसंहार सहित मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए इराकी अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद 2006 में फाँसी दे दी। जबकि सच्चाई यह है कि सद्दाम हुसैन के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई का असली उद्देश्य तेल नियंत्रण और रणनीतिक स्थिति जैसे अन्य भू-राजनीतिक कारण थे। ​अमेरिका का ईराक से यह युद्ध साल 2011 तक चला।

4. वेनेजुएला पर प्रभुत्व

अमेरिकी सैन्य बलों द्वारा ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ॉल्व के तहत 3 जनवरी, 2026 को वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को गिरफ्तार कर लिया गया। अमेरिका ने निकोलस मादुरो पर मादक पदार्थों की तस्करी, हथियार रखने और नारको-आतंकवाद से जुड़े गंभीर आरोप लगाए हैं। उपरोक्त आरोपों के बाद मादुरो को न्यूयॉर्क की एक संघीय अदालत में पेश किया गया। वर्तमान में मादुरो व उनकी पत्नी फ्लोरेस को ब्रुकलिन के मेट्रोपॉलिटन डिटेंशन सेंटर में हिरासत में रखा गया है।

BBC की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका का लक्ष्य वेनेजुएला के तेल संसाधनों पर नियंत्रण कर वहां की खराब बुनियादी सुविधाओं को ठीक करना और उत्पादन को दोबारा शुरू करना है। लिहाजा वेनेजुएला के तेल पर नियंत्रण स्थापित करने के पश्चात अमेरिका ने तेल की बिक्री भी शुरू कर दी है, जिसकी कमाई को अमेरिकी नियंत्रित खातों में रखा गया है।

5. ईरान पर आक्रमण

अमेरिका ने ईरान की मिसाइल क्षमता तथा उसकी नेवी को कमजोर करने व न्यूक्लियर वेपन हासिल करने से रोकने के नाम पर इजरायल के साथ मिलकर भयंकर आक्रमण किया है।

दरअसल अमेरिका द्वारा ईरान पर हमले का उद्देश्य बहुआयामी है, जिसमें तेल संसाधनों पर नियंत्रण और रणनीतिक भू-राजनीतिक हित दोनों शामिल हैं। ईरान का आरोप है कि अमेरिका उसके तेल संसाधनों पर कब्ज़ा करना चाहता है।

ईरान के विरूद्ध अमेरिका-इजरायल के संयुक्त हमले 14 दिनों से जारी हैं। इस आक्रमण में ईरान को काफी नुकसान पहुंचा है। सबसे बड़ा नुकसान यह है कि अमेरिका-इजरायल के हवाई हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई, बेटी, दामाद, पोते-पोती मारे गए।

इसके साथ ही इस हमले में सैन्य प्रमुखों, रक्षा मंत्री अजीज नसीरज़ादे, मोहम्मद पाकपुर और सलाहकार अली शमखानी सहित कई शीर्ष अधिकारी भी मारे गए हैं। अमेरिका ने पहली बार किसी देश के शीर्ष नेता को हवाई हमले के जरिए अपना निशाना बनाया है।

अपने परमाणु हथियारों से दुनिया को सात बार खत्म करने की ताकत रखने वाले अमेरिका ने ईरान की परमाणु क्षमताओं और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को खत्म करने का बहाना बनाकर हमला किया है, जबकि हकीकत यह है कि वह ऊर्जा निर्यात के लिए रणनीतिक जलमार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण स्थापित करना चाहता है।

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