NEET Paper लीक और फिर परीक्षा रद्द होने के पश्चात उपजे मानसिक तनाव और अनिश्चितता के कारण देशभर में तकरीबन 12 से 14 छात्रों ने आत्महत्या कर ली थी। फिर क्या था, NEET Paper लीक से जुड़ी विसंगतियों और प्रशासनिक पारदर्शिता के सवालों को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने दिल्ली के जंतरमंतर स्थित प्रदर्शन स्थल पर आमरण अनशन शुरू कर दिया।
हांलाकि 26 दिनों तक भूख हड़ताल पर रहने के पश्चात सोनम वांगचुक ने अपना अनशन तोड़ दिया। यद्यपि सोनम वांगचुक का यह संघर्ष भारत में आमरण अनशन के स्वर्णिम इतिहास की एक नवीनतम कड़ी मात्र है, जिसमें दमन और अन्याय के खिलाफ अपने शरीर और आत्मा को सबसे मारक हथियार के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। इस रोचक स्टोरी में हम आपको भारत के उन सात आमरण अनशनों का स्वर्णिम इतिहास बताने की कोशिश रहे हैं जिसे जनता आजतक नहीं भूली है।
1. महात्मा गांधी
भारतीय इतिहास में आमरण अनशन को प्रासंगिक बनाने का श्रेय महात्मा गांधी को जाता है जो अपने प्राणों को दांव पर लगाकर विरोधी अथवा सत्ता पक्ष के तर्कों को कुंद कर देते थे। साल 1915 से लेकर 1948 के बीच महात्मा गांधी ने कुल 30 बार अनशन किए।

महात्मा गांधी ने 21 दिन का बेहद लम्बा आमरण अनशन साल 1933 में किया था, इस आमरण अनशन का उद्देश्य हिंदू समाज में छुआछूत के विरुद्ध जागरूकता फैलाना था। इसके बाद गांधीजी ने साल 1943 में हिन्दू-मुस्लिम दंगे रूकवाने, साम्प्रदायिक सद्भाव तथा अपनी गिरफ्तारी के विरूद्ध आगा खान पैलेस में 21 दिन का सबसे लम्बा आमरण अनशन किया था।
इस आमरण अनशन के दौरान गांधीजी की उम्र 73 वर्ष थी। आमरण अनशन के दौरान अंग्रेज इस बात से पूरी तरह आश्वस्त थे कि इस बार महात्मा गांधी जिन्दा नहीं बचेंगे। स्थिति यह हो गई थी कि गांधीजी के अंतिम संस्कार के लिए चन्दन की लकड़ी तक मंगवा ली गई थी। महात्मा गांधी की सहयोगी मीरा बेन ने लिखा है कि “ब्रिटिश सरकार ने इस बात की भी योजना बना ली थी कि गांधीजी की शवयात्रा किस रास्ते से निकलेगी।”
तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल और वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने महात्मा गांधी की मांगों के समक्ष झुकने के प्रति बेहद सख्त रुख अपनाया। लिहाजा गांधीजी ने 21 दिन की अवधि समाप्त होने पर 3 मार्च 1943 को संतरे का जूस पीकर अपना अनशन खुद समाप्त कर लिया था।
2. जतिन दास
महान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और वीर क्रांतिकारी जतिन दास (यतीन्द्रनाथ दास) हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के सक्रिय सदस्य थे। भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, बटुकेश्वरदत्त और राजगुरू जैसे क्रांतिकारियों के परम सहयोगी जतिन दास ने केंद्रीय असेम्बली के लिए बम बनाया था।

जतिन दास को 63 दिन की ऐतिहासिक भूख हड़ताल के लिए आज भी याद किया जाता है। लौहार सेण्ट्रल जेल में कैद जतिन दास ने राजनीतिक कैदियों के अधिकारों के लिए 63 दिनों की ऐतिहासिक भूख हड़ताल की थी। इस दौरान अंग्रेजी सरकार ने जतिन दास को जबरन खाना खिलाने (फोर्स-फीडिंग) की हर मुमकिन कोशिश की। बावजूद इसके जतिन दास ने बिना अन्न-जल ग्रहण किए लगातार 63 दिन तक आमरण अनशन किया और अंत में 13 सितंबर 1929 को महज 24 वर्ष की आयु में कालकवलित हो गए। जतिन दास के आमरण अनशन ने आमजन को इतना प्रभावित किया कि उनके अंतिम संस्कार में पांच लाख से अधिक लोग शामिल हुए थे।
3. श्रीदेव सुमन जी
उत्तराखंड के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्रीदेव सुमनजी ने टिहरी रियासत के सामंती राजा के अत्याचारों के खिलाफ व जेल अधिकारियों के अमानवीय व्यवहार के विरोध में 3 मई, 1944 को अपना ऐतिहासिक अनिश्चितकालीन उपवास (आमरण अनशन) शुरू किया।

टिहरी रियासत की स्वतंत्रता से जुड़ी मांगों के बदले श्रीदेव सुमनजी को रिहा किए जाने की शर्तें रखी गई थी जिसे उन्होंने इनकार कर दिया। आमरण अनशन के दौरान श्रीदेव सुमन को जबरदस्ती भोजन दिए जाने की भी कोशिश की गई।
अंग्रेजी सत्ता तथा टिहरी रियासत की आंतरिक तानाशाही के खिलाफ 84 दिनों तक लगातार भूख हड़ताल पर रहने के कारण 25 जुलाई 1944 को श्रीदेव सुमनजी की मृत्यु हो गई।
4. पोट्टी श्रीरामुलु
पोट्टि श्रीरामुलु ने रेलवे की नौकरी से इस्तीफा देकर गांधी जी के नमक सत्याग्रह में हिस्सा लिया। महात्मा गांधी के परम भक्त श्रीरामुलु साबरमती आश्रम में रहे और 1940-41 के व्यक्तिगत सत्याग्रह अभियान के दौरान 18 महीने जेल में बिताए।

श्रीरामुलु ने आजादी के पांच साल बाद यानि साल 1952 में तेलुगु भाषी लोगों के लिए मद्रास स्टेट से अलग आंध्र प्रदेश राज्य के निर्माण की मांग को लेकर निर्वाचित सरकार के खिलाफ आमरण अनशन शुरू कर दिया। 58 दिनों की ऐतिहासिक भूख हड़ताल के पश्चात पोट्टि श्रीरामुलु की असामयिक मृत्यु हो गई।
पोट्टि श्रीरामुलु की मृत्यु के पश्चात समस्त दक्षिण भारत में जन-आक्रोश भड़क उठा। मद्रास के तेलुगु भाषी जिलों में विरोध-प्रदर्शन के दौरान हिंसा और पुलिस फायरिंग हुई। तत्पश्चात तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को नतमस्तक होना पड़ा और उन्हें मद्रास स्टेट से अलग सिर्फ भाषाई आधार पर आंध्र प्रदेश के गठन की घोषणा करनी पड़ी।
5. इरोम चानू शर्मिला
आयरन लेडी के नाम से मशहूर मणिपुर की मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम चानू शर्मिला ने सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून के खिलाफ साल 2000 में एक ऐसा अनशन शुरू किया जो विश्व इतिहास सबसे लम्बा आमरण अनशन माना जाता है।

इरोम चानू शर्मिला तकरीबन 16 वर्षों (4 नवम्बर 2000 से 9 अगस्त 2016) तक भूख हड़ताल पर रहीं। इन वर्षों में सरकार ने इरोम चानू शर्मिला को जिंदा रखने के लिए उनकी नाक की नली से जबरन लिक्विड डाइट देती रही। दरअसल इरोम ने अपनी भूख हड़ताल तब शुरू की थी जब 2 नवम्बर के दिन मणिपुर की राजधानी इंफाल के मालोम में असम राइफल्स के जवानों के हाथों 10 बेगुनाह लोग मारे गए थे।
6. अन्ना हजारे
सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने साल 2011 में दिल्ली स्थित रामलीला मैदान में 12 दिनों तक ऐतिहासिक आमरण अनशन किया था। अन्ना हजारे का आमरण अनशन तत्कालीन सरकार से जुड़े भ्रष्टाचार और जन लोकपाल बिल की मांग को लेकर था।

अन्ना हजारे के इस आन्दोलन में अरविंद केजरीवाल, कुमार विश्वास और किरण बेदी जैसे प्रमुख चेहरे भी शामिल हुए थे, जिससे पूरे देश में जनसैलाब उमड़ पड़ा था। 74 वर्षीय अन्ना हजारे ने दो छोटी बच्चियों (सिमरा और इकरा) के हाथों नारियल पानी पीकर अपना 12 दिवसीय अनशन तोड़ा था।
7. सोनम वांगचुक
सोशल एक्टिविस्ट, इंजीनियर, इनोवेटर और शिक्षाविद् सोनम वांगचुक लद्दाख से जुड़ी मांगों तथा नीट पेपर लीक-2026 को लेकर जंतर मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान 26 दिनों तक भूख हड़ताल पर चले गए थे। भूख हड़ताल के दौरान सोनम वांगचुक का वजन 11 किलो तक कम हो गया था।

अंत में सरकार के बतौर प्रतिनिधि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह के साथ हुई सकारात्मक बातचीत और लिखित आश्वासन के बाद सोनम वांगचुक ने अपना आमरण अनशन समाप्त कर दिया।
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