
भारतीय संविधान के वास्तुकार तथा दलितों के मसीहा बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को इंदौर के नजदीक एक छोटे से कस्बे महू छावनी में हुआ था। बता दें कि इस साल डॉ. भीमराव अम्बेडकर का 134वां जन्मदिन है। महार जाति (दलित) में जन्मे डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने अपनी प्रतिभा के दम 32 डिग्रीयां हासिल की थी। हिन्दी, संस्कृत, पाली, अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, मराठी, पर्शियन और गुजराती जैसे 9 भाषाओं के जानकार बाबा साहेब ने कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधियाँ प्राप्त की थी।
स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने आजीवन यह प्रयास किया कि दलितों को देश-समाज में सम्मान मिले और उन्हें बराबरी का दर्जा हासिल हो। डॉ. अम्बेडकर एक मशहूर न्यायविद्, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ और समाज सुधारक थे जिन्होंने अछूतों (दलितों) के खिलाफ सामाजिक भेदभाव को खत्म करने तथा महिलाओं-श्रमिकों के अधिकारों के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन होम कर दिया।
बाबा साहेब ने दलितों को मंदिरों में प्रवेश, सार्वजनिक जगहों पर भोजन-पानी करने का अधिकार, अस्पृश्यता से मुक्ति आदि के लिए कई लड़ाईयां लड़ी। डॉ. अम्बेडकर ने ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ की स्थापना की और इस संस्था के माध्यम से दलित समाज को संगठित करने की पूरी कोशिश की। उन्होंने दलित समाज के लिए यह नारा दिया- “दलितों, शिक्षित बनो, एकत्रित रहो और संघर्ष करो”। इसमें कोई दो राय नहीं है कि बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर दलितों के अन्दर से हीनभावना को खत्म करने में काफी हद तक कामयाब रहे।
बाबा साहेब ने अपनी राजनीतिक विचारधारा को प्रचारित-प्रसारित करने तथा दलितों की आवाज़ उठाने के लिए मूकनायक (1920), बहिष्कृत भारत (1924), समता (1928), जनता (1930), आम्ही शासनकर्ती जमात बनणार (1940), प्रबुद्ध भारत (1956) जैसे पत्र भी निकाले। इस बारे में डॉ. अम्बेडकर लिखते हैं कि “अछूतों के पास अपना कोई प्रेस नहीं है। कांग्रेस के प्रेस उनके लिए बंद हैं, उसने अछूतों का रत्ती भर भी प्रचार न करने की कसम खा रखी है।” बाबा साहेब एक ओजस्वी लेखक थे जिनके द्वारा लिखित किताबें मौजूदा दौर में देश में सर्वाधिक बिकने वाली किताबों में स्थान रखती हैं। इस स्टोरी में डॉ. भीमराव अम्बेडकर की उन 5 पॉपुलर किताबों पर रोशनी डालने का प्रयत्न करेंगे जो दलित चेतना जागृत करने में कामयाब रहीं।
1-भारत में जातियां : उनका तंत्र, उत्पत्ति और विकास
चर्चित किताब ‘भारत में जातियां : उनका तंत्र, उत्पत्ति और विकास’ मूलत: डॉ. अम्बेडकर का एक शोधपत्र है, जिसे उन्होंने कोलम्बिया विश्वविद्यालय में मानव विज्ञान के सेमिनार में 9 मई 1916 को प्रस्तुत किया था। बाबा साहेब के इस पहले शोध पत्र में भारत में जाति की उत्पत्ति, विकास और समाज पर पड़ने वाले प्रभावों का उल्लेख किया गया है। बाबा साहेब ने इस पुस्तक में लिखा है कि भारत का प्राचीन समाज चार वर्गों में विभाजित था। 1-ब्राह्मण यानि पुरोहित वर्ग 2-क्षत्रिय यानि सैनिक वर्ग 3-वैश्य यानि व्यापारी वर्ग 4-शूद्र यानि शिल्पकार और सेवक वर्ग
डॉ. अम्बेडकर ने लिखा है कि इस प्राचीन समाज में कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छा और योग्यता से किसी भी वर्ग का चुनाव कर सकता था। लेकिन इतिहास के किसी कालखंड में पुरोहित वर्ग ने इसे वर्ग समाज से हटाकर जाति में परिवर्तित कर दिया। हिन्दू समाज में जाति का मतलब विजातीय विवाह पर रोक। सजातीय विवाह की प्रथा ही जाति का मूल लक्षण है। सजातीय विवाह को बनाए रखने के लिए पुरोहित वर्ग ने हिन्दू धर्मशास्त्रों के माध्यम से बाल विवाह, विधवा विवाह पर रोक तथा सती प्रथा जैसी कुरीतियों को बढ़ावा दिया।
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2- जाति का विनाश
डॉ. भीमराव अम्बेडकर की चर्चित किताब ‘जाति का विनाश’ मूलत: अंग्रेजी भाषा में साल 1936 में प्रकाशित की गई थी। इस पुस्तक को डॉ. अम्बेडकर ने जात-पात तोड़क मंडल के वार्षिक अधिवेशन में अध्यक्षीय उद्बबोधन के लिए तैयार किया था। लेकिन मंडल के पदाधिकारियों में वैचारिक मतभेद उत्पन्न होने पर यह अधिवेशन निरस्त कर दिया गया। इसके बाद बाबा साहेब ने इसे अपने खर्च पर पुस्तक के रूप में प्रकाशित करवा दिया। जब यह पुस्तक प्रकाशित हुई तब तक डॉ. अम्बेडकर दलित नेता और प्रखर विद्वान के रूप में स्थापित हो चुके थे। इस किताब में तत्कालीन जाति व्यवस्था के साथ-साथ धार्मिक नेताओं का भी प्रखर विरोध किया गया है। दरअसल यह पुस्तक अम्बेडकर की किताब ‘भारत में जातियाँ’ की अगली कड़ी है।
3-गांधी और अछूतों का उद्धार
बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने अपनी महत्वपूर्ण किताब ‘गांधी और अछूतों का उद्धार’ को सबसे पहले एक लेख के रूप में तैयार किया जिसे उन्होंने साल 1942 में इंस्टीट्यूट आफ पेसिफिक रिलेशन्स कनाडा में ‘भारत में अछूतों की समस्या’ पर होने वाले सम्मेलन में प्रस्तुत किया था। अपने इस लेख को डॉ. अम्बेडकर ने साल 1943 में पुस्तक के रूप में प्रकाशित करवाया। इस पुस्तक में दलितों की दुर्दशा और तिरस्कार का उल्लेख किया गया है। इस पुस्तक के माध्यम से उन्होंने कहा कि भारत में रहने वाले अछूतों की तुलना विश्व के किसी भी उत्पीड़ित, शोषित व तिरस्कृत समुदाय से नहीं की जा सकती है। रोम में दास, स्पार्टा में हेलोट, ब्रिटेन में विलियन, अमेरिका में नीग्रो, जर्मनी में यहूदी की ठीक वहीं स्थिति है जैसी हिन्दुओं में अछूतों की है, परन्तु इनमें से कोई इतना बदनसीब न था जितना भारत का अछूत है। बाबा साहेब ने लिखा कि भारत का अछूत केवल तिरस्कृत ही नहीं बल्कि उसकी तरक्की के सभी दरवाजे बंद हैं। फिर भी अछूतों की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया।
बाबा साहेब ने पहली बार इस पुस्तक के जरिए अछूतों के आर्थिक, शैक्षणिक व सामाजिक उत्थान के लिए विशेष प्रावधान की मांग रखी। बाबा साहेब ने अछूतों के लिए पृथक निर्वाचन मण्डल, सामाजिक निर्वाचन क्षेत्र, पृथक बस्तियाँ बसाने, कार्यपालिका, विधायिका, प्रशासनिक सेवाओं आदि में जनसंख्या के हिसाब से प्रतिनिधित्व की मांग की।
4- ‘कांग्रेस और गांधी ने अछूतों के लिए क्या किया?’
बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर ने कांग्रेस और गांधी की अछूतों के प्रति नीतियों के खोखलापन को जाहिर करने के दृष्टिकोण से जून 1945 में एक किताब प्रकाशित करवाई जिसका शीर्षक था- कांग्रेस और गांधी ने अछूतों के लिए क्या किया? तकरीबन चार सौ पृष्ठों की इस पुस्तक में डॉ. अम्बेडकर ने 1917 से लेकर 1945 तक कांग्रेस के कार्यों का मूल्यांकन अछूतों को केन्द्र में रखकर किया है। इस पुस्तक में अछूतों द्वारा चलाए गए आन्दोलनों का भी विस्तृत विवरण दिया गया है।
5- अखिल भारतीय अनुसूचित जाति महासंघ
बाबा साहेब ने अपनी किताब ‘अखिल भारतीय अनुसूचित जाति महासंघ’ को दलितों की मौलिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से लिखा है। बाबा साहेब ने इस पुस्तक को 15 मार्च 1947 को प्रकाशित करवाया। इस पुस्तक में भारत के संविधान का प्रारूप प्रस्तुत किया गया है। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के अनुयायी इस पुस्तक को बाबा साहेब का मूल संविधान भी कहते हैं। इस पुस्तक के जरिए बाबा साहेब ने कृषि के अलावा बड़े एवं बुनियादी उद्योगों, बैंक- बीमा के राष्ट्रीयकरण का प्रस्ताव रखा था। इस पुस्तक में अनुसूचित जातियों के मूल अधिकारों का उल्लेख किया गया है। डॉ. अम्बेडकर की आर्थिक नीतियों का विवरण भी इस किताब में किया गया है, जिसे ‘राजकीय समाजवाद’ कहा जाता है।
गौरतलब है कि बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर की इन्हीं पांच किताबों का अध्ययन करके देश के बुद्धिजीवी दलित अपने समाज उत्थान के मूल तत्व को पहचानने और उनमें चेतना जागृत करने में पूरी तरह से सफल रहे।
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