
अरुणा गांगुली से अरुणा आसफ अली
अरुणा गांगुली का जन्म बंगाली ब्राह्मण परिवार में 16 जुलाई 1909 को पंजाब के कालका (वर्तमान में हरियाणा) में हुआ था। अरुणा के पिता उपेन्द्र नाथ गांगुली का होटल व्यवसाय था। नैनीताल से प्रारम्भिक शिक्षा हासिल करने के बाद कुशाग्र बुद्धि वाली अरुणा ने आगे की शिक्षा लाहौर से पूरी की। तत्पश्चात अरुणा गांगली कोलकाता के ‘गोखले मेमोरियल कॉलेज’ में अध्यापन कार्य करने लगीं।
1928 ई.में 19 वर्षीय अरुणा गांगुली ने अपने पिता उपेन्द्र नाथ गांगुली की सहमति के विरूद्ध जाकर खुद से 21 साल बड़े एक मुस्लिम युवक आसफ अली से प्रेम विवाह कर लिया। हांलाकि अरुणा गांगुली की नजर में यह विवाह पारस्परिक आकर्षण के अलावा सोच-समझकर लिया गया निर्णय था क्योंकि आसफ अली की माली हालत भी ठीक नहीं थी। असहयोग आन्दोलन के दौरान वकालत का पेशा छोड़ने के बाद आसफ अली पुश्तैनी जमीन का अपना हिस्सा भी बेच चुके थे। यह अलग बात है कि आसफ अली साल 1946 में पं. जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता वाली अंतरिम सरकार में रेलवे तथा परिवहन मंत्री थे। तत्पश्चात 1947 से 1949 तक अमेरिका में भारत के पहले राजदूत के रूप में कार्यरत रहे।
अरुणा लिखती हैं कि “मैंने आसफ अली से विवाह इसलिए किया था क्योंकि अंग्रेजी साहित्य में हम दोनों समान रुचि रखते थे। इतिहास और दर्शन में आसफ के ज्ञान की गहराई और उनके सुसभ्य आचरण तथा पारस्परिक नजदीकी ने मुझे विशेषरूप से प्रभावित किया।”
अरुणा गांगुली और आसफ अली के इस विवाह को चक्रवर्ती राजगोपालाचारी और देशबुन्ध गुप्ता जैसे बड़े नेताओं का समर्थन प्राप्त था। देशबुन्ध गुप्ता तो अरुणा को ‘पंडित आसफ अली’ कहकर बुलाते थे। स्वयं अरुणा के शब्दों में “विवाह के बाद जब मैंने महात्मा गांधी से मिलना शुरू किया तो उन्होंने मेरे विवाह को ‘हिन्दू-मुस्लिम एकता’ का प्रतीक कहा था।”
पं. मदन मोहन मालवीय की प्रतिक्रिया
यह सच है कि सांप्रदायिक तनाव के उस काल में एक ब्राह्मण लड़की का एक मुस्लिम लड़के से विवाह करना बहुत ही जोखिमपूर्ण कार्य था। अरुणा आसफ़ अली की जीवनी में जीएनएस राघवन लिखते हैं कि, “अरुणा और आसफ़ अली की उम्र में 21 साल का अंतर भी था। इसके साथ उन दिनों बहुत से लोग हिंदू-मुस्लिम विवाह के विरुद्ध थे क्योंकि इस प्रकार के विवाह से पैदा हुए बच्चों को इन दोनों में से कोई भी संप्रदाय पूरी तरह से स्वीकार नहीं कर पाता था।” दूसरा उदाहरण यह है कि साल 1934 के विधानसभा चुनाव में जब कांग्रेस ने आसफ अली को अपना उम्मीदवार बनाया तो कुछ हिंदू तथा मुस्लिम संप्रदायवादियों ने केवल इस आधार पर विरोध किया क्योंकि आसफ अली ने एक हिंदू लड़की से शादी की थी।
तीसरा सबसे रोचक उदाहरण यह है कि कांग्रेस के चार बार (क्रमश: 1909, 1918, 1930, 1932 में) अध्यक्ष रह चुके पं. मदन मोहन मालवीय जो 1923 से 1926 तक हिन्दू महासभा के अध्यक्ष भी रहे। सनातन संस्कृति को सर्वोपरि मानने वाले तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक मालवीयजी को अरुणा गांगुली का आसफ अली से विवाह करना कत्तई पसन्द नहीं था। इसीलिए जब भी अरुणा आसफ अली उनके सम्मुख होती थीं, महामना उनकी तरफ से अपना मुंह फेर लेते थे। सम्भवत: उनको यह बरदाश्त नहीं होता था कि एक ब्राह्मण परिवार की लड़की किसी मुसलमान से शादी कर ले। संयोग की बात यह है कि जहां एक तरफ पं. मदन मोहन मालवीय ने भारत छोड़ो आन्दोलन का विरोध किया था वहीं अरुणा आसफ अली को भारत छोड़ो आन्दोलन के लिए विशेष रूप से याद किया जाता है।
अरुणा आसफ़ अली की राजनीतिक उपलब्धियां
आपको यह बात जानकर हैरानी होगी कि वीर सावरकर की सर्वाधिक चर्चित किताब ‘भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम’ को पढ़ने के बाद ही अरुणा आसफ अली ने राजनीति में जाने का निर्णय लिया। दरअसल वीर सावरकर की इस किताब को प्रकाशित होने से पूर्व ही अंग्रेज सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था। बावजूद इसके इस किताब की साइक्लोस्टाइल प्रतियां अवैध रूप से भारत लाई जाती थीं। यह सौ फीसदी सच है कि गांधी और नेहरू की चिंतनधारा के विपरीत अरुणा आसफ़ अली के मन में सावरकर के लिए बहुत सम्मान था।
भारतीय मुक्ति संग्राम में 1930, 1932 और 1941 के व्यक्तिगत सत्याग्रह में सक्रिय भागीदारी के चलते अरुणा आसफ अली को जेल जाना पड़ा। यह भी एक संयोग ही है कि साल 1929 में जब भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने नई दिल्ली की असेम्बली में बम फेंका था, उस दौरान केंद्रीय विधान सभा की विशिष्ट दर्शक दीर्घा में अरूणा अपने पति आसफ अली के साथ मौजूद थीं। सत्याग्रह के दौरान अरुणा आसफ अली पर लोकनायक जयप्रकाश, डॉ॰ राम मनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन जैसे समाजवादियों के विचारों ने उन्हें विशेषरूप से प्रभावित किया। भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन की इस ‘ग्रैंड ओल्ड लेडी’ को आज भी 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान मुम्बई के ग्वालिया टैंक मैदान में कांग्रेस का झंडा फहराने के लिए याद किया जाता है। बता दें कि 1942 की अगस्त क्रांति के दौरान जब महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू सहित कांग्रेस अन्य सभी नेता गिरफ्तार हो चुके थे तब अरुणा आसफ अली ने तीन साल तक भूमिगत रहकर इस आन्दोलन का नेतृत्व किया। अगस्त क्रांति की इस महानायिका ने महज 33 साल की उम्र में यह करिश्मा कर दिखाया था।
अरुणा आसफ़ अली ने डॉ. राममनोहर लोहिया के साथ मिलकर मासिक पत्रिका ‘इन्कलाब’ का सम्पादन किया तथा ऊषा मेहता के साथ मिलकर एक गुप्त रेडियो स्टेशन से प्रसारण करना भी शुरू किया। अरुणा आसफ़ अली साल 1942 से 1946 तक पूरे देश में सक्रिय रहीं। इस दौरान ब्रिटिश सरकार जब अरुणा आसफ़ अली को गिरफ्तार नहीं कर पाई तो इनकी सम्पत्ति जब्त कर बेच दी बावजूद इसके उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया। साल 1946 में जब उनके नाम का वारंट कैन्सिल हुआ तब वे अपने भूमिगत जीवन से बाहर आईं। देश की आजादी के बाद अरुणा आसफ अली को दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष निर्वाचित किया गया।
साल 1948 में अरुणा आसफ़ अली ने ‘सोशलिस्ट पार्टी’ ज्वाइन कर ली। इसके ठीक दो साल बाद आप सक्रिय रूप से मज़दूर-आंदोलन में जुट गईं। 1955 में आपने भारतीय कम्यनिस्ट पार्टी का दामन थाम लिया। हांलाकि 1958 में अरुणा आसफ़ अली ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी भी छोड़ दी। साल 1958 में अरुणा आसफ़ अली दिल्ली नगर निगम की प्रथम महापौर चुनी गईं। अरुणा आसफ़ अली ने अपने जीवनकाल में अंग्रेजी समाचारपत्र ‘पेट्रियट’ तथा ‘लिन्क’ नाम पत्रिका का सम्पादन किया। ‘लिन्क’ अपने जमाने की सर्वश्रेष्ठ मासिक पत्रिका हुआ करती थी।
अरुणा आसफ अली का सम्मान
अरुणा आसफ़ अली को वर्ष 1965 में लेनिन शांति पुरस्कार, 1991 में जवाहर लाल नेहरू सम्मान, 1992 में 'पद्म विभूषण' से सम्मानित किया गया। अरुणा आसफ अली का निधन 87 साल की उम्र में 29 जुलाई 1996 को कोलकाता में हुआ। मरणोपरान्त साल 1997 में आपको भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया।
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