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Who was that queen of beauty 'Rasakpur' who is called 'Anarkali of Jaipur'?

कौन थी वह हुस्न की मलिका ‘रसकपूर’ जिसे ‘जयपुर की अनारकली’ कहा जाता है?

सवाई प्रताप सिंह की मृत्यु के बाद सवाई जगत सिंह द्वितीय जयपुर की राजगद्दी पर बैठे। जयपुर के शासक सवाई जगत सिंह द्वितीय और खूबसूरत नृत्यांगना रसकपूर के मोहब्बत के चर्चे आज भी जयपुर की गलियों में सुनने को मिल जाते हैं। नर्तकी रसकपूर इतनी सुन्दर थी कि इसे जयपुर का नूरजहांभी कहा जाता है।

कहते हैं जयपुर राजपरिवार से जुड़े एक विद्वान पं.शिवनारायण मिश्र और तवायफ नूरी बेगम की बेटी रसकूपर भी मोहब्बत की ही देन थी, जो कि जौहरी बाजार स्थित सांगानेरी गेट पर बने तवायफों के कटले कांचमहल में रहती थी।

इतिहासकार राजेन्द्र सिंह खंगारोत के अनुसार, गुणीजन खाने की नर्तकी पारो बेगम ने ही रसकपूर को नृत्य सिखाया था। दरअसल बेहद खूबसूरत रसकपूर को जयपुर में नृत्य करते समय जगत सिंह ने पहली बार देखा था तब उसके रूप-लावण्य पर मोहित हो गए। चूंकि जयपुर के गुणीजन खाने में काम करने वाली सुन्दर तवायफ पारो बेगम अलसुबह सिटी पैलेस के चन्द्रमहल में भैरवी सुनाकर जगत सिंह द्वितीय को प्रतिदिन नींद से जगाती थी। इसलिए तवायफ पारो बेगम अपने साथ नौयौवना रसकपूर को भी चंद्रमहल ले गई जहां रसकपूर और जगत सिंह द्वितीय की यह मुलाकात बसंत पंचमी के दिन हुई।

राजा जगत सिंह को वह हुस्न की मलिका इतनी पसंद आई कि उन्होंने हुक्म दिया रसकपूर से उनकी मुलाकात आमेर महल में कराई जाए। जगत सिंह की दीवानगी इस कदर उन पर हावी हो चुकी थी कि वह रसकपूर का साथ छोड़ने को तैयार नहीं थे। इसलिए उनके प्रधानमंत्री और सलाहकार राजा को शासन की सुध लेने की गुजारिश करने आमेर गए।  इस पर राजा ने कहा कि वे चन्द्रमहल तभी जाएंगे जब रसकपूर भी उनके साथ रहेगी। हांलाकि इस बात का काफी विरोध हुआ बावजूद इसके राजा के नजदीकी सलाहकारों की मदद से रसकपूर को चन्द्रमहल पहुंचाया गया।

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बता दें कि सिटी पैलेस परिसर के सबसे महत्वपूर्ण और शक्तिशाली प्रशासनिक भवन का नाम चन्द्रमहल है क्योंकि यह भवन जयपुर के पूर्व राजाओं का निवास स्थान था। यह सात मंजिला भवन जयपुर शहर का एक बेजोड़ प्राकृतिक दृश्य प्रदान करता है। चंद्र महल में हर मंजिल का अपना आकर्षण और महत्व है। चन्द्रमहल के प्रत्येक मंजिल का नाम कुछ इस प्रकार है-पितम निवास, सुख निवास, चाबी निवास, रंग मंदिर, मुकुंत महल और श्री निवास।

रसकपूर के चन्द्रमहल पहुंचते ही जयपुर राजदरबार में उसकी तूती बोलने लगी। इतिहासकार खंगारोत के अनुसार, स्थिति यह हो गई थी कि रानियों और पटरानियों की लम्बी फेहरिस्त होने के बावजूद जगत सिंह बदनाम गली की रसकपूर पर जान छिड़कने लगे। जगत सिंह जहां भी जाते थे रसकपूर को साथ लेकर जाते थे, यहां तक कि वह राजा के साथ दरबार में भी बैठने लगी थी और जागीरदारों के प्रशासनिक मामलों में भी हस्तक्षेप करने लगी। अब सामन्तों को महाराजा के साथ ही रसकपूर का भी अभिवादन करना पड़ता था।  इसका जयपुर के जागीरदारों ने कड़ा विरोध किया।

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महाराजा जगत सिंह द्वितीय अपनी प्रेयसी के प्रति इस कदर सम्मोहित हो चुके थे कि उन्होंने रसकपूर को अपना आधा राजपाट दे दिया। इसी वजह से रसकपूर को अर्धराजेश्वरी भी कहा जाने लगा। यहां तक कि जयपुर की रियासत में रसकपूर के नाम के सिक्के भी ढलवाए गए। पोथीखाना और सूरतखाना भी उसके नाम कर दिया गया। इतना ही नहीं शाही सवारी के समय महाराजा ने रसकपूर को हाथी पर बैठाकर रानी के समकक्ष स्थान दिया। यह भी कहा जाता है कि रसकपूर के कारण जयुपर का राजकीय खजाना भी खाली हो गया था। यही वजह है कि सवाई जगत सिंह द्वितीय को जयपुर के बदनाम शासक के रूप में जाना जाता है। यद्यपि यह सोचने वाली बात है कि जयपुर के राजा जगत सिंह द्वितीय का एक तवायफ की खूबसूरत बेटी को अपनी रानियों और पटरानियों के समकक्ष सम्मान देना महज वासना का परिणाम नहीं हो सकता है।

कहते हैं कि महाराजा जगत सिंह द्वितीय जब गिंगोली युद्ध में चला गया था तब जयपुर का राजकाज रसकपूर ही सम्भालती थी। इस बीच पटरानी और दूसरी रानियों ने भी रसकपूर के विरूद्ध खूब षडयंत्र किए। जगत सिंह की गैर मौजूदगी का लाभ उठाकर जयपुर के सामन्तों ने रसकपूर को चरित्रहीन बताकर नाहरगढ़ के किले में कैद कर दिया।

आखिरकार जब राजा को इस सच्चाई का पता लगा तो वे रसकपूर को कैद से मुक्त कराने गए लेकिन वह नहीं आई। 21 दिसम्बर 1818 को जगत​ सिंह द्वितीय की हत्या हो गई। गैटोर की छतरी में महाराजा का अन्तिम संस्कार किया जा रहा था, तभी रसकपूर ने किसी तरह तरकीब लगाकर खुद को कैद से मुक्त कर लिया और राजा की जलती चिता में कूदकर सच्ची प्रेयसी होने का सबूत दिया और सदा के लिए जीवन्त हो गई।