
प्रख्यात इतिहासकार द्विजेन्द्र नारायण झा के मुताबिक, “दक्षिण भारत पर वैदिक धर्म का गहरा प्रभाव था। इसके अतिरिक्त ब्राह्मण धर्म को भी यहां के राजाओं द्वारा पर्याप्त प्रोत्साहन मिला।” दक्षिण भारत में मुरुगन की उपासना सबसे प्राचीन है। वैसे तो भगवान मुरुगन की पूजा दक्षिण भारत के सर्वत्र राज्यों में की जाती है परन्तु मुरुगन के अधिकतर भक्त तमिल हिन्दू हैं। ऐसे में तमिलनाडु के अलावा जहां कहीं भी तमिल निवासी रहते हैं (जैसे- श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर आदि) वे मुरुगन की ही पूजा करते हैं। तमिल जाति के लोग भगवान मुरुगन को ‘तमिल कडवुल’ अर्थात तमिलों के देवता कहकर सम्बोधित करते हैं। भगवान मुरुगन दक्षिण भारत के राज्य तमिलनाडु के रक्षक देव भी हैं। अब सवाल यह उठता है कि आखिर में भगवान मुरुगन कौन हैं और तमिलनाडु के रक्षक देवता के रूप में इनकी पूजा क्यों की जाती है।
शिव पुत्र कार्तिकेय ही हैं भगवान मुरुगन
भगवान मुरुगन का सर्वप्रथम उल्लेख ‘संगम साहित्य’ में मिलता है। बता दें कि संगम साहित्य की रचना मुख्य रूप से तमिल भाषा में की गई है। हांलाकि संगम युग की तिथि को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है परन्तु 300 ईसा पूर्व से 300 ई. सामान्यत: इसका काल माना जाता है।
कालान्तर में तमिल देश के सबसे प्राचीन देवता मुरुगन का नाम ‘सुब्रह्मण्य’ हो गया और स्कन्द-कार्तिकेय के साथ इनका तादात्म्य स्थापित कर दिया गया। जैसा की आप भी जानते हैं कि हिन्दू धर्म में भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र का नाम स्कन्द-कार्तिकेय है। स्कन्द-कार्तिकेय के जन्म से जुड़ी कई कथाएं रामायण, महाभारत, पुराण तथा अन्य ग्रन्थों में मिलती हैं।
विभिन्न कथाओं में भगवान कार्तिकेय को अग्नि, कृत्तिका, गंगा अथवा शिव पुत्र के रूप में बताया गया है। सबसे बड़ी बात की दक्षिण के जनमानस ने इन सभी मान्यताओं को स्वीकार कर लिया। तमिल में मुरुगन का एक अर्थ ‘कुमार’ भी है जो कि वैदिक परम्परा में ‘स्कन्द’ का ही एक नाम है। भगवान मुरुगन एक नाम ‘वेलन’ भी है। वेलन का सम्बन्ध वेल से है जिसका अर्थ ‘वर्छा’ है। भगवान मुरुगन को सबसे शक्तिशाली अस्त्र ‘वेल’ उनकी मां पार्वती से प्राप्त हुआ था।
महाभारत तथा पुराणों में स्कन्द के अस्त्र को ‘शक्ति’ कहा गया है तथा स्कन्द की प्रतिमाओं में यह प्रदर्शित भी होता है। ऐसे में वेल और शक्ति में समानता स्वत: ही देखने को मिलती है। जिस प्रकार से समुद्र का सम्बन्ध वरुण से और कृषि का सम्बन्ध इन्द्र से जोड़ा जाता है, ठीक उसी तरह से मुरुगन का सम्बन्ध पर्वतों से माना जाता है। दक्षिण भारत में ऐसी मान्यता है कि भगवान मुरुगन को पर्वत शिखर पर क्रीड़ा करना बहुत प्रिय है। बतौर उदाहरण- मुरुगन की पत्नियों में से एक कुरवस नामक पर्वतीय जनजाति की स्त्री भी है। तमिल मान्यता के अनुसार, स्वयं भगवान शिव को मुरुगन से 'प्रणव (ओम की ध्वनि) का रहस्य प्राप्त हुआ था। दक्षिण की परम्परा में मुरुगन का प्रतीक मुर्गा है जबकि उत्तर की परम्परा में स्कन्द का प्रतीक मोर है।
मुरुगन यानि स्कन्द (कार्तिकेय) का संक्षिप्त परिचय
भगवान स्कन्द (कार्तिकेय) के द्वारा कथित सर्वप्रमुख पुराण का नाम स्कन्दपुराण है। भगवान शिव और माता पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र स्कन्द यानि कार्तिकेय के छोटे भाईयों का नाम गणेश और अयप्पा है। जबकि कार्तिकेय की बहनों का नाम अशोक सुन्दरी, देवी ज्योति और देवी मनसा है। तमिल मान्यता के अनुसार, इनकी पत्नियों के नाम क्रमश: देवसेना, वल्ली और कुरवस है।
शिव और पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का पालन-पोषण सप्तर्षियों की पत्नियों ने किया था। तारकासुर वध के बाद कार्तिकेय को देवगणों से सदा युवा रहने का वरदान प्राप्त हुआ। भगवान कार्तिकेय को देव सेनापति का पद प्राप्त है। ऐसी मान्यता है कि भगवान कार्तिकेय की कृपा से प्रतिष्ठा, विजय, व्यवस्था, अनुशासन की शक्ति प्राप्त होती है।
भगवान मुरूगन का उत्तर से दक्षिण की ओर प्रस्थान- दक्षिण भारत में भगवान मुरुगन को युवा और बाल्यरूप में पूजा जाता है। हिन्दू धर्म ग्रन्थों तथा तमिल साहित्य में वर्णित एक कथा के मुताबिक, एक बार कैलाश शिखर पर भगवान मुरुगन और भगवान गणेश में इस बात को लेकर प्रतियोगिता आयोजित की गई कि जो भी सर्वप्रथम पृथ्वी की परिक्रमा कर लेगा उसे प्रथम पूज्य देवता की उपाधि प्राप्त होगी। इसके बाद भगवान मुरुगन ने अपने वाहन मयूर से पृथ्वी की परिक्रमा शुरू की परन्तु युक्तिपूर्वक भगवान गणेश ने अपने माता-पिता की परिक्रमा कर यह प्रतियोगिता जीत ली। तत्पश्चात भगवान मुरुगन रूष्ट होकर कैलाश से दक्षिण भारत की ओर चले गए। ऐसी मान्यता है कि तब से भगवान मुरुगन दक्षिण में ही निवास करते हैं और उनसे मिलने के लिए भगवान शिव अपनी पत्नी पार्वती संग स्वयं जाते हैं।
तमिलनाडु में भगवान मुरुगन के 24 प्रमुख मंदिर
तमिलों के रक्षक देव भगवान मुरुगन से जुड़ी विभिन्न कथाएं तमिलनाडु के अलग-अलग प्रमुख मंदिरों से जुड़ी हुई हैं। बता दें कि तमिलनाडु में भगवान मुरुगन के एक या दो नहीं बल्कि 24 भव्य और विशाल मंदिर हैं और प्रत्येक मंदिर की अपनी अलग धार्मिक मान्यता है।
थिरूपारनकंद्राम - तमिलनाडु के मदुरै शहर में स्थित भगवान मुरुगन का थिरूपारनकंद्राम मंदिर एक पहाड़ी पर मौजूद है। इस मंदिर में भगवान मुरुगन की पूजा सुब्रमण्यम के रूप में की जाती है। इस मंदिर से जुड़ी यह धार्मिक मान्यता है कि यहीं पर भगवान मुरुगन ने देवराज इन्द्र की पुत्री देवयानी से विवाह किया था।
स्वामीमलाई- तमिलनाडु के तंजावुर जिले एक शहर कुंभकोणम के निकट मौजूद भव्य स्वामीमलाई मंदिर एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। 60 सीढ़ियों वाले इस मंदिर में भगवान मुरुगन की पूजा बाल रूप में की जाती है। कहते हैं इसी जगह भगवान भगवान मुरुगन ने अपने पिता भोलेनाथ को ओम शब्द का रहस्य बताया था। इससे पूर्व केवल प्रजापति ब्रह्मा ही ओम शब्द का रहस्य जानते थे। स्वामीमलाई मंदिर में भगवान मुरुगन अपने वाहन मोर नहीं अपितु ऐरावत हाथी पर सवार हैं। कहा जाता है कि देवराज इन्द्र ने मुरुगन को ऐरावत भेंट किया था।
पलानी- दक्षिण भारत के तमिलाडु राज्य स्थित डिंडिगुल ज़िले मौजूद पलानी मंदिर भगवान मुरुगन का एक प्रसिद्ध मंदिर है। पलानी मंदिर में भगवान मुरुगन अपने हाथ में दंड के साथ विराजमान हैं, इसीलिए इन्हें दंडिपति कहा जाता है। इस मंदिर से जुड़ी धार्मिक मान्यता यह है कि गणपति से भेदभाव के चलते भगवान शिव से अप्रसन्न मुरुगन कैलाश छोड़कर सर्वप्रथम यहीं आए थे।
थिरुचेंदुर - तमिलनाडु राज्य के तूतीकोरिन जिले में स्थित थिरुचेंदुर मंदिर समुद्र तट के बिल्कुल नजदीक है। अत्यन्त खूबसूरत और भव्य मंदिर थिरुचेंदुर को भगवान मुरुगन के विजय चिह्न के रूप देखा जाता है। इस मंदिर से जुड़ी धार्मिक मान्यता यह है कि इसी जगह भगवान मुरुगन ने सुरपादमन को पराजित किया था, इसके बाद सुरपादमन ने भगवान मुरुगन के वाहन मयूर के रूप में जन्म लिया था।
पझामुड्रिचोलाई - मदुरै शहर के पास स्थित पझामुड्रिचोलाई मंदिर में भगवान मुरुगन अपनी पत्नियों वल्ली और देवयानी के साथ विराजमान हैं। इस मंदिर से जुड़ी धार्मिक मान्यता यह है कि भगवान शिव भी माता पार्वती के साथ यहीं निवास करते हैं। इस मंदिर में भगवान मुरुगन की पूजा एक गृहस्थ के रूप में की जाती है।
थिरुथानी- तमिलनाडु राज्य के तिरुवल्लूर ज़िले में स्थित थिरुथानी मुरुगन मंदिर भगवान सुब्रह्मण्य को समर्पित है। पहाड़ी पर मौजूद यह मंदिर भगवान मुरुगन के राजकुमारी वल्ली से प्रेम विवाह का प्रतीक है। भक्तोंजनों को इस मंदिर पर चढ़ने के लिए तकरीबन 365 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं।
गौरतलब है कि तमिलनाडु के विभिन्न शहरों में कुल 24 भव्य मंदिर भगवान मुरुगन को समर्पित हैं, जिनके नाम कुछ इस प्रकार हैं— मारुथमलाई मंदिर- कोयंबटूर के पास, वल्लीमलाई-काटपाडी, कुमारकोट्टम मंदिर-कांचीपुरम, अरुल्मिगु कंडास्वामी मंदिर-थिरुपोरूर, वल्लाकोट्टई सुब्रमण्य स्वामी मंदिर-कांचीपुरम, थिरुमलाई कोविल- पानपोली, पचैमलाई अरुलमिगु सुब्रमण्यम स्वामी-गोबिचेट्टीपलायम, वडापलानी अंदावर मंदिर-वडापलानी, सिरुवापुरी श्री बालासुब्रमण्यमस्वामी मंदिर-चिन्नमबेडु, स्कंद आश्रमम मंदिर-तांबरम, कंदस्वामी मंदिर- जॉर्जटाउन, कुमारन कुंद्राम-क्रोमपेट, अरूपदाई विदु मुरुगन मंदिर-बेसेंट नगर, सिक्कल सिंगारवेलन मंदिर- नागपट्टिनम, अरुल्मिगु कोलांजियप्पार मंदिर- विरुधाचलम, कलुगासलमूर्ति मंदिर- कलुगुमलाई, विरालीमलई मुरुगन मंदिर- विरालीमालई, वायलूर मुरुगन मंदिर- तिरुचिरापल्ली।
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