ब्लॉग

Did Indira Gandhi get hold of the treasure of Jaigarh Fort?

क्या इंदिरा गांधी के हाथ लगा था जयगढ़ किले का खजाना?

दोस्तों, यह घटना है साल 1975 की जब भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजेन्सी (आपातकाल) की घोषणा कर दी। परिणामस्वरूप प्रेस पर कठोर सेंसरशिप लगाने के अतिरिक्त नागरिक स्वतंत्रता भी रद्द कर दी गई। इतना ही नहीं, देश के सभी राजनीतिक वि​रोधियों जैसे- लोकनायक जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, मोरारजी देसाई, चन्द्रशेखर आदि को जेल में कैद कर दिया गया। इन्ही दिनों राजस्थान की राजधानी जयपुर में एक अजीबोगरीब कार्रवाई देखने को मिली, दरअसल तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जयगढ़ फोर्ट में तथाकथित छुपे एक विशाल खजाने को तलाशने के लिए इंडियन आर्मी की एक टुकड़ी (37 इंजीनियर्स कोर) के साथ ही आयकर विभाग तथा स्थानीय पुलिस की पूरी टीम लगा दी। जयगढ़ किले में पांच महीने तक चले लम्बे खोज अभियान के बाद इंदिरा गांधी का आधिकारिक बयान आया कि जयगढ़ में कोई भी खजाना नहीं मिला सिर्फ 230 किलो चांदी मिली थी। परन्तु जयगढ़ फोर्ट में खजाने की खोज के दौरान कुछ ऐसी भी घटनाएं देखने को मिलीं जो एक साथ कई प्रश्नचिह्न खड़ा करती हैं। इस स्टोरी में हम जयगढ़ फोर्ट में छुपे तथाकथित खजाने के खोज अभियान से जुड़ी हैरान कर देने वाली घटनाओं पर विस्तार से प्रकाश डालने की कोशिश करेंगे।

राजा मानसिंह के ​हाथ लगा था अकल्पनीय स्वर्ण खजाना

राजा भगवन्तदास की मृत्यु के पश्चात उसका ज्येष्ठ पुत्र मानसिंह आमेर का शासक बना। राजा मानसिंह ने 12 वर्ष की उम्र से ही मुगल दरबार की शाही सेवा में प्रवेश कर लिया था और मृत्युपर्यन्त मुगलिया सेवा में ही रहा। नि​:सन्देह राजा मान सिंह एक कुशल सेनानायक, पराक्रमी सैनिक, निपुण राजनीतिज्ञ तथा योग्य प्रशासक था। मुगल सेनापति के रूप में मानसिंह ने अकबर के कई सैन्य अभियानों का नेतृत्व किया था। बतौर मुगल मनसबदार बिहार, बंगाल की सूबेदारी के साथ ही उड़ीसा और काबुल विजय मानसिंह की प्रमुख उपलब्धियां हैं। यहां तक कि महान योद्धा महाराणा प्रताप के विरूद्ध हल्दीघाटी के युद्ध में भी मुगल सेना की कमान अकबर ने मानसिंह को ही सौंपी थी।

इतिहासकार आरएस खंगारोत और पीएस नाथावत अपनी किताब जयगढ़ : द इनविंसिबल फोर्ट ऑफ आमेर में लिखते हैं कि सन् 1581 से 1585 ई. के दौरान बादशाह अकबर ने मुगल सेनापति मानसिंह को काबुल सै​न्य अभियान पर भेजा था। तदनुसार मानसिंह ने काबुल पर आक्रमण कर उस क्षेत्र को जीत लिया। बादशाह अकबर अपने सेनापति मानसिंह की उपलब्धियों से इतना प्रसन्न हुआ कि उसे काबुल का सूबेदार नियुक्त कर दिया। ऐसा कहा जाता है कि काबुल अभियान के दौरान ही मानसिंह भारी मात्रा में धन लेकर आमेर आए थे।

बता दें कि आमेर फोर्ट से जुड़े सागर तालाब नामक विशाल टैन्क (स्थानीय भाषा में टांका) में पानी जमा करने की क्षमता छह मिलियन गैलन थी। भीषण गर्मी के दिनों में भी यह विशाल टांका कभी सूखता नहीं था। पानी भंडारण करने के अलावा इस टांके के तल में छिपे हुए कई कक्ष भी थे। अफवाह यह थी कि कछवाहा नरेश मानसिंह ने काबुल से लाए अपने गुप्त खजाने (सोना-चांदी और हीरे-जवाहरात) को मुगल अकबर को सौंपने के बजाय आमेर लाकर इसी टांके में छुपा दिया था। सागर तालाब नामक यह विशाल टांका वर्तमान में जयगढ़ किले में स्थित हैं, बता दें कि जयगढ़ फोर्ट का निर्माण महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने 1726 ई. में करवाया था।

जयगढ़ फोर्ट में खजाना रखे जाने की बात को शम्स ताहिर खान अपनी रिपोर्ट में कुछ इस प्रकार बताते हैं, “मानसिंह ने जहां अपना खजाना छुपाया था, वहां एक सुरंग से जुड़ी है जो आमेर किले को जयगढ़ से जोड़ती है। जयगढ़ फोर्ट तक पहुंचने वाली यह सुरंग आमेर महल के पश्चिमी भाग में बनी है। हांलाकि यह सुरंग अब आमजनों के लिए बंद कर दी गई है।

अंग्रेजों ने भी की थी इस खजाने की खोज

कहते हैं कि मुगल सेनापति राजा मानसिंह ने काबुल से प्राप्त अकूत स्वर्ण खजाने के बारे में मुगल बादशाह अकबर को कोई जानकारी नहीं दी थी और आमेर किले की दीवारों में लाकर दबा दिया। इस बात की किसी को भनक तक नहीं थी परन्तु एक अरबी पुस्तक 'हफ्त तिलिस्मत-ए-अम्बरी' (आमेर के सात जादुई खजाने) में इस रहस्य का सर्वप्रथम उल्लेख किया गया कि राजा मान सिंह ने काबुल से लाए अकूत धन को आमेर किले के पीछे सात टांकों (सागर नामक पानी का टैन्क) के बीच बड़ी हिजाफत से छुपाया था। ब्रिटिश शासन के दौरान 'हफ्त तिलिस्मत-ए-अम्बरी' नामक यह किताब जब अंग्रेजों के ​हाथ लगी तो वे उत्सुक हो उठे और इस अकूत खजाने को खोजने की नाकाम कोशिश की।

इसके अतिरिक्त जयगढ़ किले के एक पुराने किलेदार के एक वंशज बालाबख्श के पास कुछ चमड़े के दस्तावेज थे तथा जयसिंह खवास के पास जयसिंह का बीजक था जिस पर खजाने से जुड़ी गोपनीय जानकारी थी। बालाबख्स की मृत्यु के बाद उसके परिजनों ने सरकार द्वारा घोषित इंडियन ट्रेजर एण्ड ट्रोव एक्टके तहत खजाना बताने वाले को कुल सम्पत्ति का 2 फीसदी भाग देने के लालच में इस बीजकों को सरकारी अफसरों को सौंप दिया था। जयपुर रियासत के एक बड़े पदाधिकारी राव कृपाराम के पुत्र रावकिस्तूरचन्द के परिवार ने जयपुर के अंतिम महाराजा भवानी सिंह को जो दस्तावेज सौंपे थे, उसमें भी ठीक वही विवरण था जो बालाबख्श के परिजनों के पास मिले बीजकों में था। इस प्रकार इंदिरा गांधी ने भी बालाबख्श के परिजनों से मिले बीजक के अनुसार ही जयगढ़ किले की खुदाई करवाई थी।

जयगढ़ में खजाने की खोज और महारानी गायत्री देवी की गिरफ्तारी

साल 1975 में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जब आपातकाल की घोषणा की तब न केवल नागरिक स्वतंत्रता रद्द कर दी गई, अपितु प्रेस पर भी कठोर कार्रवाईयां की गई। इसके अतिरिक्त कद्दावर राजनीतिक विरोधियों को जेल में डाल दिया गया। गौर करने वाली बात यह है कि जिस समय इंदिरा गांधी ने अपने बेटे संजय गांधी की सलाह पर जयगढ़ में खजाने की खोज शुरू करवाई ठीक उसी समय जयपुर रियासत के राजा मानसिंह द्वितीय की पत्नी महारानी गायत्री देवी को विदेशी मुद्रा मामले में गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेज दिया गया। बता दें कि जयपुर राजघराने की महारानी गायत्री देवी स्वतंत्र पार्टीकी एक लोकप्रिय सांसद थीं जिन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी को तीन बार शिकस्त दी थी। जाहिर है, जयपुर राजघराने और कांग्रेस हाईकमान के रिश्ते कुछ ठीक नहीं थे।

एक तरफ जहां आयकर विभाग ने जयपुर राजघराने के महलों पर छापे मारे वहीं भारतीय सेना की एक टुकड़ी तथा स्थानीय पुलिस ने जयगढ़ फोर्ट में खजाने की खोज शुरू की। जयगढ़ किले की चारों ओर से घेराबंदी कर दी गई, जिससे खजाने के खोज की खबर ज्यादा तेजी से फैली। पांच महीने तक चले इस लम्बे खोज अभियान में सेना के आला अधिकारी भी एक-दो बार हेलीकॉप्टर से निरीक्षण के लिए इस किले में आए। वरिष्ठ अपराध पत्रकार शम्स ताहिर खान के मुताबिक, सेना के सेना के हेलीकॉप्टरों के किले के अंदर-बाहर आने-जाने के कारण खजाने के मिलने की अटकलें तेज हो गईं। इसके अलावा एक बार संजय गांधी अचानक अपना छोटा विमान उड़ाकर सांगानेर हवाई अड्डे पहुंचे, तब भी यह अफवाह फैली कि जयगढ़ में खजाना मिल चुका है।

खजाने में पाकिस्तान ने भी मांगा अपना हिस्सा

जयगढ़ किले में खजाने की खोज पांच महीने तक चलती रही। सेना, आयकर विभाग, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और स्थानीय पुलिस इस काम में जोर शोर से लगी हुई थी। इसी बीच अगस्त 1976 ई. में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को एक पत्र लिखा कि आप की सरकार के आदेश पर जयगढ़ किले में जो खजाना खोजा जा रहा है, विभाजन के पूर्व के समझौते के अनुसार उस पर पाकिस्तान का हिस्सा बनता है। भुट्टो ने लिखा था कि पाकिस्तान को यह पूरी आशा है कि खोज और खुदाई के बाद मिली दौलत पर पाकिस्तान का जो हिस्सा बनता है वह उसे बगैर किसी शर्तों के दिया जाएगा।

जयगढ़ किले में खजाने के खोज अभियान बंद होने के ठीक पांच माह बाद नम्बर 1976 में इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के पत्र का जवाब कुछ इस प्रकार से दिया- "मैंने अपने कानूनी विशेषज्ञों से पाकिस्तान की ओर से आपके द्वारा किए गए दावे पर सावधानीपूर्वक विचार करने को कहा था। उनका स्पष्ट मत है कि दावे का कोई कानूनी आधार नहीं है। इंदिरा गांधी ने अपने पत्र में यह भी लिखा कि जयगढ़ में खजाने नाम की कोई चीज ही नहीं मिली।

हांलाकि इंदिरा गांधी ने आधिकारिक तौर पर कहा था कि जयगढ़ किले से कोई खजाना नहीं मिला। केवल 230 किलो चांदी और चांदी के कुछ सामान ही मिले हैं। सेना ने इन सामानों की सूची राजपरिवार के प्रतिनिधि को दिखाई और उसके हस्ताक्षर लेकर सभी सामानों को सीलकर दिल्ली लेकर चली गई।

जयगढ़ किले के खजाने से जुड़े कुछ अनुत्तरित सवाल

पहला सवाल यह है कि जयगढ़ किले में खजाने की खोज के बाद जब सेना के 50-60 ट्रक जयपुर से दिल्ली जा रहे थे, तब दिल्ली-जयपुर राजमार्ग को एक दिन के लिए क्यों बंद किया गया?

क्या सेना के इन ट्रकों में जयपुर राजघराने की सम्पत्ति थी?

साल 2005 में आरटीआई के तहत गृह मंत्रालय से एक जवाब मांगा गया कि क्या आपातकाल के दौरान केन्द्रीय सरकार द्वारा जयपुर रियासत के किलों, महलों पर छापामार कर सेना द्वारा रियासत कालीन खजाना निकाला गया था? यही हाँ तो यह खजाना इस समय कहाँ पर रखा गया है?  जवाब मिला कि मांगी गई सूचना राष्ट्रीय अभिलेखागार में उपलब्ध नहीं है।

गौरतलब है कि उपरोक्त अनुत्तरित प्रश्नों के साथ ही जयगढ़ फोर्ट से इंदिरा सरकार को खजाना मिला कि नहीं, यह अलग बात है लेकिन जयगढ़ किले में रखे खजाने से जुड़ी कहानियां आज भी लोगों के बीच यथावत जिन्दा हैं।

इसे भी पढ़ें : जयपुर का शाही श्मशान घाट जिसे देखने के लिए लगता है टिकट

इसे भी पढ़ें : पं. जवाहरलाल नेहरू के साथ रोमांस में थी ये छह चर्चित महिलाएं