
दोस्तों, यह जानकर आप को थोड़ा अजीब लग रहा होगा कि राजस्थान की राजधानी जयपुर में एक ऐसा श्मशान घाट है जिसे देखने के लिए लोगों को टिकट खरीदना पड़ता है। जी हां, मैं गैटोर की छतरियों की बात कर रहा हूं जहां भ्रमण करने के लिए प्रति व्यक्ति टिकट की कीमत 30 रुपए है। जयपुर के सिंधी कैम्प बस स्टैंड से तकरीबन 6 किलोमीटर तथा आमेर किले से 7 किमी की दूरी पर स्थित कछवाहा राजवंश का शाही श्मशान घाट जयपुर-आमेर रोड पर नाहरगढ़ किले की तलहटी में ब्रह्मपुरी नामक चहारदीवारी वाले परिक्षेत्र में स्थित है। ब्रह्मपुरी पहुंचने के बाद तकरीबन 100 मीटर पैदल चलकर आप गैटोर की छतरियों तक पहुंच सकते हैं। जयपुर रेलवे स्टेशन से गैटोर की छतरियों तक पहुंचने के लिए आप निजी वाहन जैसे- टैक्सी व आटो रिक्शा आदि भी किराए पर ले सकते हैं।
इस शाही श्मशान घाट को एक तरफ से नाहरगढ़ किले की दीवारें तो दूसरी तरफ से गढ़ गणेश का पहाड़ी इलाका घेरे हुए है। इस श्मशान भूमि पर कछवाहा राजाओं की स्मृति में खूबसूरत छतरियां बनी हुई हैं जो राजपूताना इतिहास में ‘गैटोर की छतरियों’ के नाम से विख्यात है। इस स्टोरी में हम आज ‘गैटोर की छतरियों’ के रोचक इतिहास का वर्णन करेंगे।
राजपूताना में छतरियों का निर्माण काल
राजपूताना यानि राजस्थान में राजपूत शासकों, सामन्तों, धर्माचार्यों तथा सम्पन्न वर्ग के लोगों की स्मृति में स्मारक बनाने की परम्परा मध्यकाल से ही देखने को मिलती रही है। मध्ययुगीन स्मारक स्तम्भों पर सम्बन्धित योद्धा एवं उससे जुड़ी महत्वपूर्ण उपलब्धियों का अंकन होता था। ठीक इसी प्रकार मुगलों के सम्पर्क में आने के बाद राजपूताना में छतरियां बनाने का प्रचलन आरम्भ हुआ, जिसमें मुगलशैली को प्रधानता दी जाती थी। 17वीं से 19वीं तक निर्मित छतरियां प्राय: एक वर्गाकार अथवा गोलाकार चूबतरे पर बनी हुई हैं, जहां चार, छह, आठ अथवा बारह खम्भों पर आश्रित एक गोलाकार गुम्बद बना रहता है। इन छतरियों के खम्भे कोणीय अथवा गोलाकृतियों में बने हुए हैं, जिन्हें विभिन्न रेखाकृतियों द्वारा अलंकृत किया गया है। गुम्बदों की छतें प्राय: सादी हैं परन्तु कहीं-कहीं शिवलिंग की आकृति में भी छतरियों का निर्माण देखने को मिलता है।
मध्ययुगीन छतरियों में बीकानेर में बीकाजी और रायसिंह की छतरी, जोधपुर में मण्डोर उद्यान स्थित राव मालदेव और अजीत सिंह की छतरी, उदयपुर के आहड़ ग्राम में अमरसिंह और कर्ण सिंह की छतरियों के साथ ही जयपुर के ब्रह्मपुरी परिक्षेत्र स्थित गैटोर प्रांगण में सवाई जय सिंह द्वितीय, सवाई राम सिंह, सवाई माधो सिंह की छतरी समेत 12 भव्य छतरियां पंचायतन शैली में निर्मित हैं।
गैटोर की छतरियां, जयपुर
आमेर के शक्तिशाली राजा सवाई जयसिंह द्वितीय को जयपुर शहर निर्माण के लिए आज तक याद किया जाता है। 18 नवम्बर 1727 को जयपुर शहर की नींव रखी गई और 1733 तक जयपुर ने कछवाहों शासकों की राजधानी आमेर की जगह ले ली। ऐसे में सवाई जयसिंह द्वितीय ने इन्ही दिनों कछवाहा राजाओं के अंतिम संस्कार के लिए गढ़ गणेश मंदिर के निकट और नाहरगढ़ की तलहटी में जिस स्थान को चुना, आज वहां गैटोर की छतरियां मौजूद हैं। इस प्रकार 1733 ई. के बाद से प्रत्येक कछवाहा राजा का अंतिम संस्कार यहीं किया जाता रहा है। केवल सवाई ईश्वरी सिंह का अंतिम संस्कार जयपुर के सिटी पैलेस में किया गया था।
गैटोर के छतरियों की वास्तुकला
गैटोर की छतरियों में मुगल तथा हिन्दू वास्तुकला का मिश्रित संयोजन देखने को मिलता है। कछवाहा राजाओं के अंतिम संस्कार स्थल पर बने स्मारकों का अलंकृत गुम्बद छाते के आकार का है इसलिए इन्हें ‘छतरी’ कहा गया है। गैटोर की अलंकृत छतरियां खुले मंडपों के रूप में जटिल रूप से तराशे गए चार, छह, आठ, बारह अथवा बीस खम्भों पर आश्रित हैं। इन छतरियों के खम्भे अष्टकोणीय पैटर्न में हैं। इसके अलावा अष्टकोणीय खिड़कियां भी मौजूद हैं। बीच में खड़े होकर आप चारों तरफ खुले बरामदे देख सकते हैं। स्मारकों के शीर्ष तक जाने वाली सीढ़ियां इसके उत्तर में हैं। आप यहाँ से अपने चारों ओर की छतरियों का शानदार नज़ारा देख सकते हैं।
कछवाहा राजाओं की समाधि स्थल पर निर्मित गैटोर की छतरियों का निर्माण संगमरमर और बलुआ पत्थर से करवाया गया है, उनमें से कई स्मारकों में हिन्दू देवताओं, हाथी, युद्ध के दृश्य, संगीतकारों, दासियों तथा अन्य व्यक्तियों आदि को बारीकी से उकेरा गया है। चूंकि कछवाहा राजाओं की समाधियां गैटोर परिसर में जगह-जगह मौजूद हैं परिणामस्वरूप गैटोर परिसर में छोटे-छोटे खुल मण्डपों वाले महलों तथा खूबसूरत स्तम्भों का सम्मिश्रण स्पष्ट दिखाई देता है। कछवाहों राजाओं के अंतिम संस्कार स्थलों को दर्शाने वाली ये छतरियां वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण हैं।
गैटोर परिसर में मौजूद हैं 12 छतरियां
तीन हिस्सों वाले गैटोर परिसर में प्रमुख रूप से सवाई जयसिंह द्वितीय, सवाई रामसिंह, सवाई माधो सिंह, सवाई प्रताप सिंह समेत अन्य कछवाहा राजाओं की कुल 12 छतरियां मौजूद है। जिनमें चार विशाल छतरियां तथा आठ छोटी छतरियां हैं।
सवाई जय सिंह द्वितीय की छतरी- सशक्त योद्धा, खगोलशास्त्री, जयपुर शहर के निर्माणकर्ता तथा अश्वेमध यज्ञ सम्पन्न कराने वाले राजस्थान के एकमात्र शासक सवाई जयसिंह द्वितीय की छतरी गैटोर परिसर के मध्य में स्थित है। कछवाहा वंश के इस महान राजा के स्मारक स्थल को सबसे प्रभावशाली माना जाता है। सवाई जयसिंह द्वितीय की छतरी नक्काशीदार 20 खम्भों पर आश्रित है। जयपुर के सबसे महान कछवाहा राजा सवाई जयसिंह द्वितीय की छतरी में मकराना के सफेद संगमर का इस्तेमाल बहुत खूबसूरती से किया गया। गैटोर प्रांगण के मध्य में बनी इस छतरी में देवगणों, संगीतकारों, दासियों सहित अन्य व्यक्तियों की मूर्तियां उकेरी गई हैं।
सवाई राम सिंह की छतरी- जयपुर को आधुनिक बनाने वाले तथा कला व फोटोग्राफी के शौकीन सवाई राम सिंह की छतरी गैटोर प्रांगण में सवाई जयसिंह द्वितीय की छतरी के ठीक पीछे बनी हुई है। सवाई राम सिंह की छतरी भी सवाई जयसिंह द्वितीय की छतरी की ही नकल है, इतालवी संगमरमर से बनी इस छतरी में सेना के शाही खेलों की आकृतियां उकेरी गई हैं।
सवाई माधो सिंह की छतरी- राजा ईश्वरी सिंह की मृत्यु के बाद सवाई माधो सिंह आमेर की गद्दी पर बैठे। राजस्थान के सवाई माधोपुर शहर की स्थापना करने वाले सवाई माधो सिंह की छतरी गैटोर प्रांगण में मौजूद सभी छतरियों में सबसे भव्य है। सवाई माधो सिंह की छतरी का निर्माण सवाई प्रताप सिंह ने करवाया था जिसमें सगमरमर और पत्थरों का अद्भुत संयोजन देखने को मिलता है। सवाई माधो सिंह की छतरी के प्रवेशद्वार पर पत्थर के दो शेर बने हुए हैं। इस छतरी की नक्काशी और सजावट देखते ही बनती है।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि गैटोर प्रांगण में निर्मित कछवाहा राजाओं की छतरियों में केवल एक शासक सवाई ईश्वरी सिंह की छतरी यहां मौजूद नहीं है। तांत्रिक विद्या में माहिर माने जाने वाले सवाई ईश्वरी सिंह की छतरी राज महल के उद्यान में बनी हुई है। सवाई इश्वरी सिंह की छतरी चार खम्भों पर आश्रित है। इस छतरी के अन्दर नक्काशीदार चित्र उकेरे गए हैं, इन चित्रों में एक चित्र सवाई ईश्वरी सिंह का भी है।
गौरतलब है कि कुछ वर्षों पूर्व लोग अपने शासकों के सम्मान में एकत्र होकर शाम के वक्त दीप प्रज्जवलित कर श्रद्धांजलि अर्पित करते थे, परन्तु समय के साथ यह महत्वपूर्ण और आनन्ददायक गतिविधि भी लगभग समाप्ति की ओर है।
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