दोस्तों, आदि कवि महर्षि वाल्मीकि द्वारा संस्कृत भाषा में रचित महाग्रन्थ रामायण को आधार मानकर अब तक पूरी दुनिया में तकरीबन 3000 रामायण ग्रन्थों की रचना की जा चुकी है। यदि केवल हिन्दी भाषा की बात करें तो कम से कम 11 रामायण ग्रन्थ हैं। इनमें गोस्वामी तुलसी द्वारा अवधि भाषा में रचित ‘रामचरितमानस’ को उत्तर भारत में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।
जबकि बांग्ला भाषा में 25 रामायण, मराठी में 08, तमिल भाषा में 12, उड़िया में 06 तथा कन्नड़ भाषा में 20 रामायण उपलब्ध हैं। संस्कृत भाषा में रचित ‘वाल्मीकि रामायण’ में कुल 24000 श्लोक हैं। ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि ‘वाल्मीकि रामायण’ को ही सबसे मानक ग्रन्थ माना जाता है।
क्योंकि महर्षि वाल्मीकि न केवल भगवान श्रीराम के समकालीन थे अपितु रामायण की घटनाओं का हिस्सा भी बने। वाल्मीकि रामायण के अतिरिक्त अन्य रामायण बहुत बाद के हैं, जहां तक उत्तर भारत के सबसे पॉपुलर ग्रन्थ ‘रामचरित मानस’ का प्रश्न है, इसके लेखक गोस्वामी तुलसीदास तो बादशाह अकबर के समकालीन थे।
लेखिका नीना राय अपनी चर्चित किताब ‘अद्भुत अयोध्या’ में लिखती हैं कि “यदि सच से रूबरू होना है तो वाल्मीकि रामायण पढ़ें अन्यथा बाकी ग्रन्थों में सिर्फ राम-सीता की कहानियां प्रतीत होती हैं।” वाल्मीकि रामायण और अन्य रामायण ग्रन्थ के तथ्यों में बहुत अन्तर देखने को मिलता है।
बतौर उदाहरण- गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस व अन्य रामायण ग्रन्थों सहित टेलीविजन सीरियल्स में सीता स्वयंवर को प्रमुखता दी गई है, जबकि वाल्मीकि रामायण के अनुसार, सीता स्वयंवर हुआ ही नहीं था। अब आपके मन में एक प्रश्न कौंध रहा होगा कि आखिर में सच क्या है? इस गूढ़ को तथ्य जानने के लिए यह रोचक स्टोरी जरूर पढ़ें।
शिव धनुष ‘पिनाक’ का इतिहास
यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि राजा जनक ने शिव धनुष ‘पिनाक’ को उठाने के लिए श्रीराम को निमंत्रण नहीं दिया था। जबकि सच यह है कि दशरथ पुत्र राम-लक्ष्मण को महर्षि विश्वामित्र सिर्फ पिनाक दिखाने के लिए मिथिला लेकर गए थे।
वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड में राजा जनक से महर्षि विश्वामित्र कहते हैं “ये दोनों महाराज दशरथ के पुत्र राम-लक्ष्मण हैं और आपके यहां रखी शिव धनुष पिनाक को देखने की इच्छा रखते हैं। पिनाक को देखने ही से इनका प्रयोजन हो जाएगा और ये चले जाएंगे।”
तत्पश्चात महर्षि विश्वामित्र और राम-लक्ष्मण को भगवान शिव के धनुष पिनाक का वृत्तांत सुनाते हुए राजा जनक कहते हैं कि बहुत समय पहले राजा दक्ष के यज्ञ विध्वंस के समय महादेव ने क्रोध में आकर इस धनुष को उठाकर देवताओं से कहा कि मैं यज्ञ में अपना भाग प्राप्त करना चाहता था किन्तु तुम लोगों ने मुझे नहीं दिया। अब मैं इसी धनुष से तुम लोगों के सिर काट दूंगा।
भयभीत देवतागण भगवान शिव की स्तुति करने लगे, जिससे महादेव प्रसन्न हुए और उन्होंने यह धनुष देवताओं को अर्पित कर दिया। तत्पश्चात देवताओं ने पिनाक धनुष को राजा जनक के पूर्वज महाराजा देवरात के पास धरोहर रूप में रख दिया। देवरात के बाद उनके पुत्र राजा महावीर तत्पश्चात राजा ह्रस्वरोमन एवं उनके पुत्र राजा जनक ने पिनाक धनुष को अपने संरक्षण में रखा था। महाराजा देवरात से लेकर विदेह राज जनक के काल तक कई पराक्रमी राजाओं ने पिनाक को उठाने का असफल प्रयत्न किया।
सिर्फ शिव धनुष देखने गए थे राम-लक्ष्मण
सीता स्वयंवर का उल्लेख मुख्यतया गोस्वामी तुलसीदास रचित ‘रामचरितमानस’ में ही मिलता है, वाल्मीकि रामायण में नहीं। वाल्मीकि रामायण के मुताबिक, सीता का पारम्परिक स्वयंवर नहीं हुआ था, अपितु राजा जनक ने यह शर्त रखी थी कि जो कोई भी पिनाक धनुष पर प्रत्यंचता चढ़ाएगा, उसी से सीता का विवाह होगा।
आमजन में यह कथा प्रचलित है कि सीता स्वयंवर में दूर-देश के कई राजा आतें हैं, शिव धनुष को उठाने का प्रयत्न करते हैं। जबकि ठीक इसके विपरीत वाल्मीकि रामायण में अनेक राजाओं द्वारा तकरीबन एक वर्ष तक मिथिला पर आक्रमण करने का उल्लेख किया गया है। अन्य रामायण ग्रन्थों में यह भी उल्लेख मिलता है कि लंकापति रावण ने भी शिव धनुष को उठाने का प्रयत्न किया था, किन्तु यह घटना सिर्फ कल्पना मात्र है।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार, श्रीराम को राजा जनक की तरफ से कोई निमंत्रण नहीं था, महर्षि विश्वामित्र अपने शिष्य राम-लक्ष्मण को मिथिला केवल पिनाक धनुष दिखाने के लिए ले गए थे। वाल्मीकि रामायण के सर्ग 67 के अनुसार, पिनाक धनुष को राजा जनक के महल में नहीं अपितु मिथिला नगरी के एक यज्ञशाला में रखा गया था।
महर्षि विश्वामित्र जब राजा जनक से पिनाक धनुष दिखाने के लिए कहते हैं तब 5000 सैनिक 8 पहियों वाली लोहे की सन्दूक में रखी उस धनुष को खींचकर वहां ले आए। तत्पश्चात राजा जनक पिनाक को दिखाकर महर्षि विश्वामित्र से कहते हैं कि आजतक भूमण्डल का कोई भी नरेश इसे हिला तक नहीं सका।
श्रीराम द्वारा पिनाक धनुष उठाने का अनुरोध
शिव धनुष ‘पिनाक’ देखने के पश्चात श्रीराम ने महर्षि विश्वामित्र से स्वयं कहा कि मैं पिनाक को उठाने तथा उस पर प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयत्न करूंगा। तत्पश्चात श्रीराम ने पिनाक को उठाते हुए उस प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए जैसे ही अपने कानों तक उसे खींचा, धनुष बीच से ही टूट गया। पिनाक धनुष के टूटते ही भयंकर ध्वनि हुई जिससे महर्षि विश्वामित्र, राजा जनक और राम-लक्ष्मण को छोड़कर वहां उपस्थित सभी लोग मूर्छित होकर गिर पड़े।
यह देखकर राजा जनक ने कहा कि महादेव के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाना एक अद्भुत घटना है, मेरी पुत्री सीता दशरथ पुत्र राम को प्राप्त करके जनकवंश की कीर्ति का विस्तार करेगी। तत्पश्चात राजा जनक ने महर्षि विश्वामित्र से आज्ञा लेकर राजा दशरथ को आमंत्रित करने के लिए अपने मंत्रियों को भेजा।
महाराज दशरथ के आने के बाद राजा जनक ने श्रीराम के लिए सीता तथा लक्ष्मण के लिए उर्मिला को समर्पित करने की बात कही। बाद में गुरु वशिष्ठ ने भरत और शत्रुघ्न के लिए मांडवी और श्रुतकीर्ति का वरण करने के लिए कहा। इस प्रकार राम का विवाह सीता व लक्ष्मण का विवाह उर्मिला के साथ तथा राजा जनक के भाई कुशध्वज की पुत्री माण्डवी और श्रुतकीर्ति का विवाह भरत और शत्रुघ्न के साथ सम्पन्न हुआ।
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