
बंगला साहित्य के प्रसिद्ध इतिहासकार दिनेशचन्द्र सेन के मुताबिक, “बंगाल में सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रंथ वाल्मीकि रामायण की कृत्तिवास द्वारा अनूदित बंगला रामायण है। 'कृत्तिवास रामायण' को बंगाल का ‘बाइबिल’ कहा जाता है।” वहीं इतिहासकार हरिश्चन्द्र वर्मा के अनुसार, “बंगाल में इस ग्रन्थ का वही स्थान है जैसा कि तुलसीदास रचित रामचरितमानस का उत्तर भारत में है।”
कृत्तिवास का जन्म 1433 में 11 फरवरी, दिन रविवार को माघ संक्रान्ति के रात्रिकाल में हुआ था। पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के फुलिया नामक गांव में पैदा हुए कृत्तिवास के पिता का नाम वनमाली ओझा था जबकि दादा का नाम मुरारी ओझा था। बंग भाषा के अदि कवि कृत्तिवास द्वारा रचित 'कृत्तिवास रामायण' संस्कृत के अतिरिक्त उत्तर भारतीय भाषाओं का पहला रामायण है। आपको जानकर हैरानी होगी कि गोस्वामी तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ से तकरीबन 100 वर्ष पहले ‘कृत्तिवास रामायण’ की रचना की गई थी।
बंगला साहित्य के आदि कवि माने जाने वाले कृत्तिवास नीतिशास्त्र, धर्म, ज्योतिष, छंद तथा व्याकरण आदि के भी ज्ञाता थे। राम नाम में परम आस्था रखने वाले कृत्तिवास ने अपने रामायण में ‘वाल्मीकि रामायण’ का शब्दानुवाद नहीं किया है बल्कि मध्यकालीन बंगाली समाज और संस्कृति का व्यापक चित्रण किया है। जहां गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस में सात काण्ड हैं वहीं ‘कृत्तिवास रामायण’ में छह काण्ड हैं- आदि काण्ड, अयोध्या काण्ड, अरण्य काण्ड, किष्किन्धा काण्ड, सुन्दर काण्ड और लंका काण्ड।
कृत्तिवास रामायण की पांडुलिपियां पश्चिम बंगाल के विभिन्न विश्वविद्यालयों जैसे- विश्वभारती विश्वविद्यालय, कलकत्ता विश्वविद्यालय, रवींद्र भारती विश्वविद्यालय, बर्दवान विश्वविद्यालय, जादवपुर विश्वविद्यालय और उत्तर बंगाल विश्वविद्यालय में आज भी मौजूद हैं।
रामचरितमानस से इतर ‘कृत्तिवास रामायण’ में हैं कई दुर्लभ प्रसंग
उत्तर भारत के हर घर में लोकप्रिय ‘रामचरितमानस’ में गोस्वामी तुलसीदास ने इस बात का उल्लेख नहीं किया है कि लंकापति रावण ने भगवान श्रीराम से पूर्व उनके पूर्वज चक्रवर्ती राजा मान्धाता से भी युद्ध किया था। इसके अलावा गोस्वामी तुलसीदास ने लंकाकाण्ड में रावण की मृत्यु का रहस्य उसकी नाभि में अमृत होना बताया है। जबकि कृत्तिवास ने रावण की मृत्यु का रहस्य ब्रह्म बाण बताया है। इसके अतिरिक्त रावण की मृत्यु के बाद मन्दोदरी का क्या हुआ, इस बारे में भी तुलसीदास ने कुछ नहीं लिखा है। परन्तु ‘कृत्तिवास रामायण’ में उपरोक्त सभी प्रसंगों का बड़ा ही रोचक वर्णन किया गया है।
महर्षि भार्गव ने राजा मान्धाता को बताया कि रावण किसके हाथों मारा जाएगा?
कृत्तिवास रामायण के एक प्रसंग में महर्षि अगस्त्य भगवान श्रीराम को पूर्व की एक कथा सुना रहें हैं जिसके मुताबिक, एक बार लंकापति रावण आकाश मार्ग से जा रहा था तभी उसने राजहंसों वाले एक दिव्य रथ पर सवार एक श्रेष्ठ पुरुष को देखा जिसके पास सात सौ देवकन्याएं थीं। नृत्य संगीत करती उन सुन्दर देवकन्याओं के बीच वह श्रेष्ठ पुरुष बैठा हुआ था। जब रावण ने उस दिव्य पुरुष को देखा तो उसने कहा कि मैं लंकापति रावण हूं, तुम कहां भागे जा रहे हो? तुम मुझसे युद्ध करो अन्यथा इनमें से कुछ सुन्दर देवकन्याओं को मुझे देते जाओ। तब उस दिव्य पुरुष ने कहा कि लंकेश्वर सुनो, मैंने सैकड़ों वर्षों प्रचण्ड तपस्या की है। तुम जैसे कई राजाओं के प्राण लिए हैं। मुझे कोई पराजित नहीं कर सकता। अब मैं इन देवकन्याओं के साथ स्वर्ग हेतु प्रस्थान कर रहा हूं। इस समय मैं तुमसे युद्ध नहीं कर सकता। तब रावण ने कहा- मैंने तीनों लोक जीत लिए हैं, अब मैं सोच रहा हूं कि किसके साथ युद्ध करूं?
तब उस दिव्य पुरुष ने कहा, तुम सूर्यवंशी मान्धाता के साथ युद्ध करो, वह सप्त-द्वीपों का राजा है। वह देश भ्रमण के लिए उत्तर दिशा में गया है। आज तुम इसी रमणीय-पर्वत पर रहो। इसी पर्वत पर उससे तुम्हारी भेंट होगी। तश्चात वह मुनि स्वर्ग में रहने के लिए चले गए। तभी वहां राजा मान्धाता सेना सहित आ गए। रावण और मान्धाता के बीच हुए युद्ध में कई दिव्य अस्त्रों जैसे— अग्नि बाण, ब्रह्मास्त्र तथा पाशुपत अस्त्र आदि का प्रयोग किया गया जिससे पूरा संसार कांप उठा। तब ब्रह्माजी ने महर्षि भार्गव को भेजा।
महर्षि भार्गव ने राजा मान्धाता से कहा- यह युद्ध रोक दो। क्रोध मत करो। ब्रह्मा के वरदान से रावण की मृत्यु नहीं होगी। तुम रावण के साथ मैत्री कर लो। तुम्हारे वंश में एक दिव्य पुरुष जन्म लेगा जिसके द्वारा रावण अपने कुल सहित मारा जाएगा। ऐसे में यह युद्ध अनिर्णायक स्थिति में ही बंद हो गया। महर्षि अगस्त्य की यह बात सुनकर श्रीराम उत्साहित हो उठे।
सूर्यवंशी राजा अनरण्य का लंकापति रावण को श्राप
कृत्तिवास रामायण के उत्तरकाण्ड के मुताबिक, एक प्रसंग में सूर्यवंशी राजा अनरण्य लंकापति रावण से कहते हैं कि एक राजा के रूप में मैंने प्रजा का पालन किया है। नित्य दस लाख द्विजों को भोजन करवाता हूँ। मेरे इन पुण्यकर्मों से सभी भलीभांति परिचित हैं। हे रावण! तेरा वध करने वाला मेरे ही कुल में जन्म लेगा। अन्तत: राजा अनरण्य का श्राप सत्य सिद्ध हुआ। सूर्यवंशी राजा श्रीराम के द्वारा रावण का वध किया गया।
रावण की मृत्युबाण का रहस्य
कृतिवास रामायण के लंकाकाण्ड के एक प्रसंग में विभीषण श्रीराम से कहता है कि एक बार हम तीनों भाईयों (रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण) ने मिलकर ब्रह्मजी की घोर तपस्या की थी। तब रावण ने स्वयं के लिए अमर होने का वरदान मांगा। ब्रह्मजी ने रावण से कहा कि अमर होने का वरदान मत मांगों, बदले में कोई दूसरा वर मांग लो। रावण ने कहा, मुझे कोई दूसरा वर नहीं चाहिए क्योंकि मेरे पास तीनों लोकों की सम्पदा है।
ब्रह्माजी ने रावण से कहा कि मैं तुम्हे ऐसा वर दूंगा जिससे तुम अमर हो जाओगे। तुम्हारी मृत्यु हाथ-पैर अथवा सिर कटने से नहीं होगी। तुम्हारे हृदय पर कोई कितना ही आघात करे तब भी तुम मरोगे नहीं। मैंने तुम्हारे लिए ब्रह्म-बाण का निर्माण किया है, तुम इसे अपने घर पर सुरक्षित रखो। उस ब्रह्मबाण को रावण ने अपनी रानी रानी मन्दोदरी को रखने के लिए दे दिया। ऐसे में रानी मन्दोदरी ने वह ब्रह्म-बाण कहां छुपा रखा था, किसी को नहीं पता था। इसी ब्रह्म बाण द्वारा रावण की नाभि में आघात करने पर उसकी मृत्यु होनी थी।
विभीषण ने श्रीराम से कहा कि रावण का मृत्यु-बाण कहाँ सुरक्षित रखा गया है, यह मन्दोदरी के सिवाय कोई नहीं जानता है। रावण के भय से वहाँ पवन भी नहीं पहुँच सकता है, कौन है जो उस स्थान से बाण ले आएगा। तब हनुमानजी ने कहा, हे दशरथ नन्दन! आप क्यों चिन्ता करते हैं? उस मृत्यु बाण को मैं ले आऊँगा। इसके बाद हनुमान जी ने जामवन्तजी और सुग्रीव को प्रणाम किया और एक बूढ़े ब्राह्मण का वेष धारण कर मन्दोदरी के रनिवास में प्रवेश किया और रावण का जयनाद करते हुए मन्दोदरी से कहा कि मैं ज्योतिष में बड़ा प्रवीण हूँ और सदा से रावण के हित की चिन्ता करता हूँ। नर-वानर ने आकर विपत्ति खड़ी कर दी, मैं आशीर्वाद देता हूँ कि राजा की जय हो। हनुमानजी ने मन्दोदरी से कहा कि ज्योतिष गणना से मैं देख सकता हूं कि तुम्हारे कक्ष (कमरे) में जो धन है, उसके प्रभाव से श्रीराम भी रावण का कुछ नहीं बिगाड़ सकते।
मन्दोदरी ने प्रश्न किया कि ऐसा कौन सा धन है? तब ब्राह्मण वेशधारी हनुमानजी ने कहा कि ज्योतिष गणना द्वारा मुझे पता चला है कि राजा रावण की मृत्यु तुम्हारे घर में ही है। यह बात किसी को बताना मत, ऐसा कहकर विप्रवर उठ खड़े हुए और जाने लगे। मन्दोदरी को लगा कि यह कोई साधारण ज्योतिषि नहीं है, उसने विप्रवर से कहा- उस धन को मैंने बहुत जतन से छुपाकर रखा है। तब ब्राह्मण वेशधारी हनुमानजी ने कहा- ठीक है, पर किसी को बताना मत! क्योंकि घर का भेदी विभीषण बड़ा ही घनघोर शत्रु है, उसके लिए लंका में कोई भी स्थान गुप्त नहीं है। तब मन्दोदरी ने कहा कि हे द्विज! तुम लंकापति के परम हितैषी हो, तुम्हारे आशीर्वाद से उसे कौन ले सकता है, मैंने उस ब्रह्म बाण को इस खम्भे के भीतर चुनवा रखा है।
यह शब्द सुनते ही हनुमान जी ने उस स्फटिक-स्तम्भ पर अपने लात से प्रहार किया। खम्भे के टूटते ही वह ब्रह्मबाण दिखाई दिया और उसे लपककर हनुमानजी एक ही छंलाग में श्रीराम के पास पहुंच गए। हनुमान जी ने श्रीराम को रावण का मृत्युबाण सौंपकर प्रणाम किया। इसके बाद सभी वानर श्रीराम की जयघोष करने लगे।
रावण वध के बाद मन्दोदरी का क्या हुआ?
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित ‘रामचरितमानस’ में रावण वध के बाद रानी मन्दोदरी का क्या हुआ, इसका उल्लेख नहीं मिलता है। जबकि बंगला रामायण में कृत्तिवास ने इस घटना का विस्तार से उल्लेख किया है। बंगला रामायण के लंकाकाण्ड में कृत्तिवास लिखते हैं कि रावण वध के बाद मन्दोदरी उसका कटा हुआ सिर लेकर जोर-जोर से रोने लगी। कोई भी उसको धीरज नहीं बंधा पा रहा था। मन्दोदरी कहती है कि जिसने मेरे पति का वध किया है, उसे मैं एक बार अपनी आंखों से देखना चाहती हूं। क्योंकि राम नर नहीं, नारायण हैं। ऐसा कहकर वह अपने खुले-बिखरे केशों के साथ राम को देखने के लिए चल पड़ी।
वानरी सेना के बीच बैठे राम के पास जाकर मन्दोदरी ने उन्हें प्रणाम किया। राम ने मन्दोदरी को सीता समझकर अखण्ड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दिया। तब रानी मन्दोदरी श्रीराम के चरण पकड़कर बोली हे! रघुनन्दन आपने ऐसा वर मुझे क्यों दिया? सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी और समुद्र अपनी जगह से टल सकते हैं परन्तु आपका दिया हुआ वचन नहीं टल सकता।
वह राम से कहती है कि मैं मयदानव की पुत्री और रावण की पत्नी मन्दोदरी हूं। मेरा पति मृत पड़ा है और आप मुझे सौभाग्यवती (सुहागिन) बने रहने का आशीर्वाद दे रहे हैं। तब श्रीराम ने लज्जित होकर कहा, मेरा वचन सत्य रहेगा। रावण की चिता सदा के लिए प्रज्ज्वलित (जलती) रहेगी। हे मन्दोदरी सुनो तुम अपने घर जाओ विलाप मत करो। मेरी बात सुनो हे रानी! मेरे हाथों मरकर रावण स्वर्ग गया और उसके सारे पाप धुल गए। तुम चिरकाल तक सौभाग्यवती बनी रहोगी। इसके बाद श्रीराम ने विभीषण को लंका का राजा घोषित करके छत्र-दण्ड सहित रानी मन्दोदरी को देने की घोषणा की। इस प्रकार विभीषण की पत्नी बनकर मन्दोदरी चिरकाल तक सौभ्यागवती बनी रही।
इसे भी पढ़ें : महान संगीतज्ञ तानसेन को हराने वाले बैजू बावरा की कहानी : आधा हकीकत आधा फसाना
इसे भी पढ़ें : नर्तकी मोरन सरकार और महाराजा रणजीत सिंह की अनूठी प्रेम कहानी