
दोस्तों, आज हम आपको एक ऐसे संगीतकार के बारे में बताने जा रहे हैं जिसकी चर्चा प्रत्येक संगीतप्रेमी कभी न कभी जरूर करता है। जी हां, मैं प्रख्यात संगीतज्ञ बैजू बावरा की ही बात कर रहा हूं। अक्सर बैजू बावरा का प्रसंग तब छिड़ जाता है, जब लोग अक्सर यह कहते हुए सुने जाते हैं कि एक संगीत मुकाबले में बैजू बावरा ने महान संगीतज्ञ तानसेन को शिकस्त दी थी। यदि हम इतिहास की बात करें तो यह प्रख्यात संगीतज्ञ इतिहास के पन्नों से बिल्कुल गायब है, ऐसा क्यों हुआ? यह भी एक विचारणीय प्रश्न है। बैजू बावरा की ज्यादातर कहानियों को किंवदंती के रूप में स्वीकार किया जाता है। परन्तु इतिहास में आज भी कुछ ऐसे तथ्य मौजूद हैं, जिससे यह बिल्कुल साफ हो जाता है कि प्रख्यात संगीतकार बैजू बावरा के संगीत में कुछ ऐसी बात जरूर थी जिसने मुगल बादशाह अकबर को हिलाकर रख दिया था। इस स्टोरी में हम बैजू बावरा से जुड़े कुछ ऐतिहासिक स्रोतों पर प्रकाश डालने की कोशिश करेंगे।
गुरु भाई थे तानसेन और बैजू बावरा
तानसेन और बैजू बावरा दोनों ही ब्राह्मण थे, एक का नाम था रामतनु पाण्डेय और दूसरे का नाम था बैजनाथ मिश्र। इन दोनों ने ही ध्रुपद गायन शैली के अविष्कारक और वृन्दावन के प्रसिद्ध संगीतकार स्वामी हरिदास से संगीत की शिक्षा ली थी। उन दिनों स्वामी हरिदास एक महान संगीत शिक्षक थे, वह अद्वितीय थे।
चूंकि तानसेन और बैजू बावरा गुरु भाई थे, ऐसे में इन दोनों ही महान संगीतज्ञों को विभिन्न रागों जैसे राग दीपक, राग मल्हार, राग टोड़ी के अतिरिक्त ध्रुपद गायन शैली में विशेषज्ञता हासिल थी। परन्तु बैजू बावरा ‘राग मालकोस’ भी जानते थे, इस राग से पत्थर भी पिघल जाते थे। कहते हैं इसी राग के बदौलत बैजू बावरा ने तानसेन को शिकस्त दी थी।
जब तानसेन की मृत्यु 1586 ई. में हुई तब उनकी आयु 80 वर्ष थी और बैजू बावरा की मृत्यु 1610 ई. में हुई थी। इन दोनों की आयु में एक बड़ा अन्तर है। सम्भव है, तानसेन और बैजू बावरा ने स्वामी हरिदास से संगीत की शिक्षा एक साथ नहीं ली होगी।
तानसेन और बैजू बावरा की संगीत यात्रा
रामतनु पाण्डेय उर्फ तानसेन ने संगीत की शिक्षा पूरी करने के बाद रीवां के राजा रामचन्द्र (1555-1592) के दरबार में गाना शुरू कर दिया। कुछ ही दिनों में तानसेन की ख्याति ने मुगल बादशाह अकबर का ध्यान आकर्षित किया। इसके बाद अकबर ने दूत भेजकर तानसेन को मुगल दरबार में भेजने की बात कही। इस प्रकार तानसेन 1562 ई. के करीब अकबर के दरबारी संगीतज्ञ बन गए। बादशाह अकबर तानसेन की संगीत का इस कदर कायल हो गया कि उसने तानसेन को न केवल अपने नवरत्नों में शामिल किया बल्कि ‘कंठाभरण वाणी विलास’ और संगीत सम्राट' जैसी उपाधियां भी दीं।
दूसरी तरफ मध्यप्रदेश के चंदेरी में जन्में बैजनाथ मिश्र उर्फ बैजू बावरा अपने गुरु स्वामी हरिदास से संगीत की शिक्षा लेकर ग्वालियर के राजा मान सिंह (1486–1516) के दरबारी गायक बन गए। इतना ही नहीं, राजा मानसिंह ने अपनी रानी ‘मृगनयनी’ को संगीत सिखाने का जिम्मा बैजू बावरा को ही दिया था। चंदेरी के इतिहासकार मजीद खान पठान अपनी किताब 'संगीत सूर्य बैजू बावरा' में लिखते हैं कि “जब बैजू बावरा गाते थे तब कलावती तम्बूरा बजाती थी। उनकी प्रेयसी कलावती चंदेरी में ही उनके घर के पास रहती थी। एक बार बैजू बावरा को अपने माता-पिता के साथ तीर्थाटन पर जाना पड़ा, इसी दौरान प्रेयसी कलावती के वियोग में उनका मन व्याकुल हो उठा। इसके बाद बैजू बावरा पूरी तरह से तन्मय होकर संगीत साधना करने लगे और वे संगीत में इतना रमे कि लोग उन्हें ‘बावरा’ समझने लगे।” तत्पश्चात बैजू बावरा स्वतंत्र रूप से गायन करने लगे।
तानसेन और बैजू बावरा के बीच संगीत मुकाबला
फतेहपुर सीकरी में पंचमहल के सामने अनूप तालाब के बीचोबीच तानसेन का चबूतरा बना हुआ है। इस गहरे तालाब में हर समय पानी भरा रहता है। तानसेन के चबूतरे तक पहुंचने के लिए चारो तरफ से दीवारनुमा गैलरी बनी हुई। इसी चबूतरे पर बैठकर संगीत सम्राट तानसेन रियाज किया करते थे, और यहीं संगीत सभाओं का आयोजन भी होता था। अनूप तालाब स्थित तानसेन के चबूतरे पर ही संगीत सम्राट तानसेन और बैजू बावरा के बीच संगीत मुकाबला हुआ था।
दरअसल मुगल बादशाह अकबर को अपने दरबारी संगीतकार तानसेन की योग्यता पर इतना विश्वास था कि उसने एक संगीत प्रतियोगिता आयोजित की जिसकी शर्त यह थी कि जो कोई भी इस संगीत मुकाबले में तानसेन को पराजित कर देगा, उसे मुगल दरबार में बतौर संगीतकार नियुक्त किया जाएगा अन्यथा हारे हुए प्रतियोगी को मृत्युदंड दिया जाएगा।
कहते हैं अकबर की कठिन शर्त के चलते कोई भी संगीतकार इस मुकाबले में भाग लेने को तैयार नहीं हुआ परन्तु गुरु हरिदास की आज्ञा से बैजू बावरा ने इस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। फतेहपुर सीकरी में अनूप तालाब के बीचोबीच लाल पत्थर से बना तानसेन का चबूतरा आज भी गवाह है, जहां तानसेन और बैजू बावारा के बीच सीधा मुकाबला हुआ।
संगीत सम्राट तानसेन ने ‘राग टोड़ी’ से मुकाबले की शुरूआत की। तानसेन के राग टोड़ी गाते ही हिरणों का झुण्ड एकत्र हो गया, इसके बाद तानसेन ने एक हिरण के गले में अपना हार डाल दिया। राग टोड़ी समाप्त होते ही हिरणों का झुंड वापस लौट गया। राग टोड़ी के मुकाबले बैजू बावरा ने 'मृग रंजनी टोड़ी’ गाया जिससे हिरण वापस आ गए। इस प्रकार तानसेन का हार भी वापस आ गया।
कहते हैं इसके बाद बैजू बावरा ने ‘राग मालकोस’ गाया, जिससे एक पत्थर मोम की तरह पिघल गया। इसके बाद बैजू बावरा ने अपना तानपुरा उस पत्थर पर फेंक दिया, ऐसे में पत्थर के ठंडा होते ही तानपुरा उसमें गड़ा रह गया। इसके बाद बैजू बावरा ने अपने तानपुरे को उस पत्थर से निकालने को कहा, लेकिन तानसेन ऐसा नहीं कर सके और अपनी हार स्वीकार कर ली। परन्तु बैजू बावरा ने बादशाह अकबर से अनुरोध कर तानसेन को मृत्युदंड से मुक्त करा दिया। वहीं कुछ लोग कहते हैं कि इस मुकाबले में तानसेन विजयी हुए थे।
फतेहपुर सीकरी स्थित तानसेन के चबूतरे से जुड़ी एक किंवदंती यह भी है कि तानसेन ने जब ‘राग दीपक’ गाना शुरू किया तो सभी दीपक स्वत: जल उठे, यहां तक कि उपस्थित अतिथियों के वस्त्र आदि भी जलने लग गए। तभी बैजू बावरा ने ‘राग मल्हार’ गाना शुरू किया, इसके बाद बादलों में काली घटाएं घिर आईं और बारिश होने लगी। आखिरकार यह संगीत मुकाबला बराबरी पर छूटा।
फतेहपुर सीकरी में है बैजू बावरा का मकान
तानसेन और बैजू बावरा के बीच हुए संगीत मुकाबले में कौन जीता, यह एक यक्ष प्रश्न है क्योंकि इससे जुड़ा कोई भी ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। परन्तु फतेहपुर सीकरी में लाल पत्थर से बना बैजू बावरा का मकान इस बात का गवाह है कि बादशाह अकबर प्रख्यात संगीतकार बैजू बावरा की संगीत कला से इतना प्रभावित हुआ था कि उसने उसके रहने के लिए अपनी राजधानी में मकान बनवा दिया। स्पष्ट है कि बैजू बावरा ने फतेहपुर सीकरी रहकर बादशाह अकबर के दरबार में कुछ दिनों तक अपनी संगीत प्रतिभा का परिचय दिया होगा।
फतेहपुर सीकरी स्थित बैजू बावरा का मकान वर्तमान में पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है। जीर्णशीर्ण हो चुके इस स्मारक की मुगलकालीन रंगत एक बार फिर से लौट आई है क्योंकि पुरातत्व विभाग ने बैजू बावरा के इस मकान की मरम्मत में कुल 22 लाख रुपए खर्च किए हैं।
चंदेरी में है बैजू बावरा की समाधि
मध्यप्रदेश के अशोक नगर जिले में स्थित चंदेरी किले के पास एक छोटी सी पहाड़ी पर बैजू बावरा की एक समाधि निर्मित है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, बैजू बावरा ने जीवन के अंतिम दिन यहीं बिताए थे। काफी दिनों तक बीमार रहने के बाद बसन्त पंचमी के दिन 1610 ई. में बैजू बावरा ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
भारतीय सिनेमा में ‘बैजू बावरा’
भले ही मध्यकालीन इतिहासकारों ने महान संगीतकार बैजू बावरा को इतिहास के पन्नों पर जगह नहीं दी परन्तु भारतीय सिनेमा ने एक सुपरहिट फिल्म बनाकर बैजू बावरा को हमेशा-हमेशा के लिए अमर कर दिया। फिल्म निर्देशक विजय भट्ट के निर्देशन में बनी फिल्म ‘बैजू बावरा’ 1952 में प्रदर्शित हुई। महान कलाकार भारत भूषण और मीना कुमारी ने अपने अभिनय प्रतिभा से इस फिल्म को जन-जन में लोकप्रिय बना दिया। इस फिल्म के गाने ‘मन तड़पत हरी दरशन को’... और ‘मोहे भूल गए साँवरिया’….. आज भी लोगों को याद है। महान संगीतकार मोहम्मद रफी और भारत रत्न लता मंगेशकर ने अपनी आवाज से मुगलिया दौर की याद दिला दी थी।
इससे इतर प्रख्यात फिल्म निर्देशक संजय लीला भंसाली ने कोविड के दिनों में ‘बैजू बावरा’ पर एक फिल्म बनाने की घोषणा की थी। जिसकी मुख्य भूमिका के लिए आलिया भट्ट और रणवीर सिंह को कास्ट किया गया था परन्तु ज्यादा बजट के कारण यह फिल्म अभी अधर में है। अब यह देखना है कि यह मूवी दोबारा सिनेमाई पर्दे पर कब देखने को मिलती है।
गौरतलब है कि महान संगीतज्ञ बैजू बावरा को इतिहास के पन्नों में भले ही स्थान नहीं मिला लेकिन फतेहपुर सीकरी महल स्थित उनका मकान, तानसेन का चबूतरा तथा चंदेरी स्थित बैजू बावरा की समाधि व 1952 में प्रदर्शित सुपरहिट हिन्दी फिल्म ‘बैजू बावरा’ से यह साबित होता है कि तानसेन के मुकाबले बैजू बावरा आज भी जनमानस के हृदय में यथावत बने हुए हैं।
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