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Vallabhi University was a competitor of Nalanda, what did Hiuen Tsang and Itsing write?

नालन्दा का प्रतिस्पर्धी था वल्लभी विश्वविद्यालय, चीनी यात्री ह्वेनसांग और इत्सिंग ने क्या लिखा है?

गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में भावनगर जिले केवल नामक स्थान पर स्थित वल्लभी विश्वविद्यालय पश्चिमी भारत में उच्च शिक्षा तथा संस्कृति का प्रसिद्ध केन्द्र था। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि वल्लभी विश्वविद्यालय सातवीं शताब्दी में विश्व प्रसिद्ध नालन्दा विश्वविद्यालय को कड़ी टक्कर देने लगा था।

उत्तर प्रदेश व बिहार के अतिरिक्त बंगाल जैसे दूरवर्ती प्रदेश से भी ​विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने के लिए वल्लभी विश्वविद्यालय आते थे। नालंदा और तक्षशिला विश्वविद्यालय के समकक्ष वल्लभी विश्वविद्यालय की शैक्षणिक व्यवस्था के बारे में चीनी यात्री ह्वेनसांग और इत्सिंग ने जो लिखा है उसे जानकर आप दंग रह जाएंगे।

वल्लभी विश्वविद्यालय की स्थापना

गुजरात के सौराष्ट्र स्थित वल्लभी नगर की स्थापना मैत्रक वंशी शासक भट्टार्क ने की। मैत्रक राजवंश की राजधानी थी वल्लभी। सातवीं शती में सौराष्ट्र का महत्वपूर्ण बंदरगाह वल्लभी एक प्रसिद्ध व्यापारिक एवं शैक्षणिक केन्द्र बन गया।

वल्लभी विश्वविद्यालय को मैत्रक शासकों ने उदारतापूर्वक दान दिए जिससे 480-775 ई. के दौरान इस विश्वविद्यालय की खूब उन्नति हुई। राजकीय सरंक्षण के साथ-साथ वल्लभी विश्वविद्यालय को नगर के प्रख्यात व्यापारियों तथा व्यवसायियों से भी जमकर दान मिला जिससे यह विश्वविद्यालय सातवीं शताब्दी तक नालन्दा की प्रतिस्पर्धा करने लगा।

वल्लभी विश्वविद्यालय के शैक्षणिक पाठ्यक्रम

वैसे तो वल्लभी विश्वविद्यालय हीनयान बौद्ध धर्म की शिक्षा का प्रमुख केन्द्र था परन्तु यहां भारत के विभिन्न भागों से विद्यार्थी उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए आते थे। सोमदेव भट्ट कृत कथासरित्सागर से पता चलता है कि गंगा प्रदेश (विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल) के ब्राह्मण अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए वल्लभी ही भेजते थे।

वल्लभी विश्वविद्यालय अपनी सहिष्णुता तथा बौद्धिक स्वतंत्रता के लिए विख्यात था। वल्लभी विश्वविद्यालय में न्याय, विधि, वार्ता, प्रशासन, धार्मिक विचार एवं दर्शन, साहित्य, अर्थशास्त्र एवं लेखाशास्त्र आदि विषयों में उच्च शिक्षा की उत्तम व्यवस्था थी।

चीनी यात्री ह्वेनसांग की वल्लभी यात्रा

चीनी यात्री ह्वेनसांग वल्लभी नगर की समृद्धि का वर्णन कुछ इस प्रकार करता है- “यहां एक सौ बौद्ध विहार थे जिनमें तकरीबन 6000 हीनयानी भिक्षु निवास करते थे। नगर की परिधि छह मील के घेरे में थी इतना ही नहीं, जैन धर्म की द्वितीय संगीति (सभा) का आयोजन वल्लभी में 513 ई. में देवर्धि क्षमाश्रमण के नेतृत्व में सम्पन्न हुई। इसमें धर्म ग्रन्थों का अंतिम संकलन कर इन्हें लिपिबद्ध किया गया।

क्या लिखता है चीनी यात्री इत्सिंग

चीनी यात्री ह्वेनसांग के बाद सातवीं शताब्दी के अंत में इत्सिंग ने वल्लभी की यात्रा की। वल्लभी विश्वविद्यालय के बारे में चीनी यात्री इत्सिंग लिखता है कि सभी देशों के विद्वान यहां एकत्रित होते थे तथा विविध सिद्धान्तों पर शास्त्रार्थ करके उनकी सत्यता निर्धारित किया करते थे। यहां के अध्यापक दो या तीन वर्ष तक विद्यार्थियों को पढ़ाते थे तथा इसी अवधि में विद्यार्थी प्रकाण्ड विद्वान बन जाते थे

इत्सिंग यह भी बताता है कि वल्लभी विश्वविद्यालय के स्नातकों को प्रशासनिक पदों पर नियुक्त किया जाता था। यह तभी सम्भव था जब पाठ्यक्रम में धर्म के अतिरिक्त उपरोक्त लौकिक विषय भी शामिल रहे हों। इत्सिंग के ही विवरण से यह गूढ़ जानकारी मिलती है कि वल्लभी विश्वविद्यालय सातवीं शताब्दी में नालन्दा की प्रतिस्पर्धा करने लगा था।

वल्लभी विश्वविद्यालय की शैक्षणिक उपलब्धि

नालन्दा विश्वविद्यालय की ही तरह वल्लभी में भी विद्वानों का नाम विश्वविद्यालय के तोरणों पर श्वेताक्षरों में अंकित किया जाता था। वल्लभी विश्वविद्यालय के दो आचार्य स्थिरमति तथा गुणमति के रहने के लिए धरसेन प्रथम ने दो सुन्दर विहार बनवाए थे जहां रहकर इन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थों की रचना की। बाद में इसी स्थान से ये दोनों आचार्य नालन्दा विश्वविद्यालय में चले गए थे।

वल्लभी विश्वविद्यालय के आचार्यों द्वारा परीक्षा लिए जाने के बाद ही विद्वानों को अपने सिद्धान्तों की सत्यपरता तथा बौद्धिकता का सही ज्ञान हो पाता था। इस विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण छात्र या तो राजकीय पदों पर नियुक्ति पाते थे अथवा उन्हें अपने जीवनयापन के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की जाती थी। मतलब साफ है, वल्लभी से उत्तीर्ण छात्रों के लिए राजकीय पदों पर नियुक्ति तकरीबन सुनिश्चित थी।

वल्लभी विश्वविद्यालय का पतन

आठवीं शताब्दी में अरब आक्रमणकारियों की वजह से वल्लभी विश्वविद्यालय की प्रगति कुछ काल के अवरूद्ध हो गई। परन्तु शान्ति स्थापित होते ही मैत्रक वंश के उत्तराधिकारियों ने इस शिक्षण संस्थान को संरक्षण एवं सहायता प्रदान की। एक शैक्षणिक केन्द्र के रूप में वल्लभी की ख्याति 12वीं शती के अन्त तक बनी रही परन्तु संरक्षक राजाओं की मृत्यु के साथ ही इसके सभी शैक्षणिक कार्य धीरे-धीरे बन्द हो गए।

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