
भारतीय इतिहास में ऐसे तीन भयंकर युद्ध लड़े गए जिसमें शक्तिशाली राजाओं ने कुछ ऐसे घातक हथियारों का इस्तेमाल किया जिसे शत्रु सेना ने अपने जीवन में पहली बार देखा था। ऐसे में इन घातक हथियारों ने शत्रु सेना में भारी तबाही मचा दी थी। इस रोचक स्टोरी में हम आपको उन्हीं घातक हथियारों से रूबरू कराने जा रहे हैं।
1. अजातशत्रु और लिच्छवियों के बीच युद्ध (484-468 ईसा पूर्व)
अपने पिता बिम्बिसार की हत्या कर अजातशत्रु (कुणिक) मगध का शासक बना। अजातशत्रु भी अपने पिता बिम्बिसार के ही समान साम्राज्यवादी था। काशी और कोशल से निपटने के बाद अजातशत्रु ने वज्जि संघ की ओर ध्यान दिया। बता दें कि वैशाली वज्जि संघ का प्रमुख था जहां के शासक लिच्छवि थे।
दरअसल बिम्बिसार के समय से ही मगध और वज्जि संघ में मनमुटाव चल रहा था। परन्तु अजातशत्रु के समय में यह युद्ध में परिवर्तित हो गया, इसके दो प्रमुख कारण थे- 1. सुमंगलवासिनी के मुताबिक, गंगा नदी किनारे एक रत्नों की खान थी, समझौते के अनुसार, वज्जि और मगध दोनों को इसके बराबर-बराबर हिस्से लेने थे। परन्तु वज्जियों ने समझौते का उल्लंघन कर सम्पूर्ण खान पर अधिकार कर लिया, जो मगध के साथ युद्ध का कारण बना।
2. वहीं जैन ग्रन्थों के अनुसार, बिम्बिसार ने लिच्छवि राजकुमारी चेलना से उत्पन्न अपने दो पुत्रों हल्ल और बेहल्ल को अपना हाथी सेंयनाग और रत्नों का एक हार दिया था। मगध का शासक बनने के बाद अजातशत्रु ने अपने सौतेले भाईयों से इन वस्तुओं की मांग की। इसके बाद हल्ल-बेहल्ल अपने नाना चेटक के पास भाग गए। अत: अजातशत्रु ने चेटक से अपने सौतेले भाईयों को वापस देने को कहा जिसे चेटक ने अस्वीकार कर दिया। अत: अजातशत्रु ने लिच्छवियों के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।
उन दिनों लिच्छवियों की शक्ति और प्रतिष्ठा काफी बढ़ी हुई थी, उन्हें परास्त करना इतना आसान नहीं था। लिच्छवियों के प्रधान चेटक ने 9 लिच्छवियों, 9 मल्लों तथा काशी-कोशल के 18 गणराज्यों को एकत्र कर अजातशत्रु के विरूद्ध एक शक्तिशाली मोर्चा तैयार किया।
महाशिलाकंटक और रथमूसल जैसे घातक हथियारों का इस्तेमाल
लिच्छवियों की विशाल सेना से सुरक्षा के लिए अजाशत्रु ने सबसे पहले एक सुदृढ़ किले का निर्माण करवाया। तत्पश्चात अपने मंत्री वस्सकार के जरिए वज्जि संघ में फूट डलवा दी। फिर अजातशत्रु ने एक बड़ी सेना के साथ लिच्छवियों पर आक्रमण किया। जैन ग्रन्थों से पता चलता है कि अजातशुत्र ने इस युद्ध में पहली बार ‘महाशिलाकंटक’ और ‘रथमूसल’ जैसे दो गुप्त हथियारों का इस्तेमाल किया था।
महाशिलाकंटक एक ऐसा हथियार था जिससे बड़े-बड़े पत्थर शुत्र सेना पर फेंके जाते थे, एक प्रकार से यह शिला प्रक्षेपास्त्र था। जबकि रथमूसल एक ऐसा हथियार था जिससे भारी संख्या में मनुष्य मारे जा सकते थे। दरअसल रथ में तीक्ष्ण ब्लेड लगे होते थे और रथ के चलने पर ब्लेड भी तीव्र गति से घूमने लगते थे जिससे शत्रु सेना में लाशों के ढेर लग जाते थे। इन दोनों हथियारों ने शत्रु सेना का भीषण संहार किया था, अत: इस भयंकर युद्ध में अजातशत्रु की सेना ने लिच्छवियों को बुरी तरह पराजित किया।
हैरानी की बात है कि साल 2015 की महामूवी ‘बाहुबली’ में प्रख्यात निर्देशक एस.एस. राजामौली ने ‘महाशिलाकंटक’ और ‘रथमूसल’ को बेहतरीन तरीके से फिल्माया है। इन दोनों प्राचीन हथियारों को पहली बार फिल्मी पर्दे पर देखकर दर्शक मंत्रमुग्ध हो उठे थे।
2. बाबर और इब्राहिम लोदी के बीच पानीपत का प्रथम युद्ध (21 अप्रैल 1526 ई.)
पानीपत का प्रथम युद्ध 21 अप्रैल 1526 ई. को पानीपत के निकट लड़ा गया था। यह एक ऐसी निर्णायक लड़ाई थी जिसे जीतने के बाद बाबर ने भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखी। पानीपत का यह युद्ध मुगल बादशाह बाबर और दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी के बीच लड़ा गया था। इस युद्ध में पहली बार मुगलों ने बारूद और तोपों का प्रयोग किया था।
पानीपत के प्रथम युद्ध में बाबर की सेना में लगभग 15,000 सैनिक और 20 से 24 तोपें थीं। जबकि इब्राहिम लोदी की सेना में तकरीबन 40,000 सैनिक और कम से कम 1000 हाथी थे।
तोपों और बारूद का इस्तेमाल
पानीपत के प्रथम युद्ध में मुगल बादशाह बाबर की विजय का मुख्य कारण उसका तोपखाना व कुशल सेनापतित्व था। पानीपत के युद्ध में मुगल बाबर ने ‘तुलुगमा’ युद्ध पद्धति व तोपें सजाने की ‘उस्मानी विधि’ का प्रयोग किया था।
तुलुगमा पद्धति के तहत वह सैन्य टुकड़ी जो सेना के दाएं और बाएं भाग के किनारे खड़ी रहती थी और चक्कर काटकर शत्रु पर पीछे से हमला करती थी। जबकि उस्मानी विधि के तहत दो गाड़ियों के बीच जगह छोड़कर उसमें तोपों को रखकर चलाया जाता था। बाबर ने उस्ताद अली कुली नामक एक तोपची को नियुक्त किया था।
दिल्ली सल्तनत की सेना के लिए बारूद और तोपें बिल्कुल नए आग्नेयास्त्र थे। वहीं बाबर के तोपों की आवाज इतनी तेज थी कि उसने इब्राहिम लोदी के हाथियों को डरा दिया और इन हाथियों ने अपने ही आदमियों को रौंद डाला। इस प्रकार मुगल बादशाह बाबर ने तोपों की बदौलत कई गुना बड़ी दुश्मन सेना को शिकस्त दी। पानीपत की जीत के बाद बाबर ने काबुल के प्रत्येक निवासी को एक-एक चांदी का सिक्का दान में दिया था। इसी उदारता के कारण बाबर को ‘कलन्दर’ भी कहा जाता है।
3. टीपू सुल्तान और अंग्रेजों के बीच मैसूर युद्ध
द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के दौरान 7 दिसम्बर 1782 ई. को हैदरअली की मृत्यु हो गई, इसके बाद अंग्रेजों से निपटने की जिम्मेदारी उसके पुत्र टीपू सुल्तान के सिर पर आ पड़ी। टीपू सुल्तान और अंग्रेजों के बीच दो और युद्ध लड़े गए जो आधुनिक भारत के इतिहास में द्वितीय एवं तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के नाम से विख्यात हैं। आपको जानकारी के लिए बता दें कि टीपू सुल्तान ने इन दोनों ही युद्धों में रॉकेट्स का इस्तेमाल किया था और अंग्रेजी सेना को भारी क्षति पहुंचाई थी।
मैसूरियन रॉकेटों का इस्तेमाल
तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1792 ई.) के दौरान टीपू सुल्तान ने दो रॉकेट यूनिट्स को युद्ध मैदान में उतारा था, एक यूनिट में 120 लोग तथा दूसरे यूनिट में 131 लोग थे। 6 फरवरी 1792 की रात श्रीरंगपट्टनम के पास लेफ्टिनेंट कर्नल नॉक्स पर रॉक़ेट से हमला किया गया था। यहां तक कि चुर्तथ आंग्ल मैसूर युद्ध (1799ई.) के दौरान भी टीपू सुल्तान की सेना ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ़ सैकड़ों रॉकेट्स दागे थे।
इन रॉकेट्स की मारक क्षमता तकरीबन 200 मीटर थी जिनमें 250 ग्राम तक बारूद इस्तेमाल किया जाता था। टीपू सुल्तान की सेना में जो रॉकेट इस्तेमाल किए जाते थे, उनका नाम 'तकरनुकसाक' रखा गया था। टीपू सुल्तान की रॉकेट यूनिट्स बड़े इलाके को नुकसान पहुंचाने में सक्षम थी।
ऐसा कहा जाता है कि टीपू सुल्तान की मौत के बाद श्रीरंगपट्टनम से 600 लांचर, 700 काम करने लायक रॉकेट और 9,000 खाली रॉकेट पाए गए। अंग्रेजों ने इनमें से कई मैसूरियन रॉकेटों को अनुसन्धान के लिए इंग्लैण्ड भेज दिया। इसके बाद इन रॉकेट्स में अनुसंधान करके इंग्लैण्ड में नए और उन्नत तकनीक के रॉकेट्स का निर्माण किया गया। टीपू सुल्तान के मैसूरियन रॉकेट्स आज भी लंदन के मशहूर साइंस म्यूजियम में रखे हुए हैं।
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