भोजन इतिहास

South Indian Payasam has a special connection with the birth of Lord Shri Ram

दक्षिण भारतीय पायसम का भगवान श्रीराम के जन्म से है खास कनेक्शन

दोस्तों, इसमें कोई दो राय नहीं है कि खीर के दक्षिण भारतीय चचेरे भाई का नाम पायसम है। दरअसल खीर और पायसम की प्रकृति एक सी है। जहां खीर को गाय के दूध और चीनी से तैयार किया जाता है वहीं पायसम को गुड़ और गाय के दूध अथवा कुछ वैरायटी में नारियल से बनाया जाता है। जिस प्रकार से उत्तर भारत में कोई भी त्यौहार खीर के बिना अधूरा माना जाता है, ठीक उसी प्रकार से पायसम के बिना भी दक्षिण भारत का हर त्यौहार अधूरा है।

वैसे तो पायसम का जन्मस्थान दक्षिण भारत माना जाता है और पायसम की उत्पत्ति से जुड़ी कई कहानियां दक्षिण भारत में विख्यात हैं। परन्तु आपको यह बात जानकर हैरानी होगी कि पायसम का उल्लेख महर्षि वाल्मीकि ने अपने महाग्रन्थ रामायण में किया है। दरअसल पायसम का सम्बन्ध भगवान श्रीराम के जन्म से जुड़ा है। ऐसे में इस तथ्य को जानने के लिए यह रोचक स्टोरी अवश्य पढ़ें।

दक्षिण भारतीय व्यंजन पायसम

उत्तर भारतीय जुबान में हम खीर को पायसम कह सकते हैं क्योंकि इन दोनों मीठे व्यंजनों की प्रकृति बिल्कुल मिलती-जुलती है। बता दें कि सूखे मेवों से भरपूर खीर और पायसम, ये दोनों मीठे व्यंजन दूध, चावल, चीनी अथवा गुड़ से तैयार किए जाते हैं। दक्षिण भारत के पारम्परिक व्यंजन पायसम को मीठे व्यंजनों का रानी कहा जाता है। चाहे कोई भी त्यौहार हो दक्षिण भारत के तकरीबन प्रत्येक घर में पायसम जरूर बनता है।

यदि समस्त भारत की बात करें तो पायसम की 60 से अधिक वैराइटीज हैं। पायसम शब्द की उत्पत्ति भारतीय नाम पायस से हुई है। कन्नड़ में पायसम को पायसा के नाम से भी जाना जाता है। द​क्षिण भारत में पायसम के जन्म से जुड़ी जो स्टोरीज चर्चित हैं, उनसे पहले हम आपको वाल्मीकि रामायण में वर्णित उस प्रसंग के बारे में बता दें जिसमें पायसम का उल्लेख किया गया है।

महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण में है पायसम का उल्लेख

महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण एवं गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरितमानस में इस तथ्य का उल्लेख किया गया है कि जब अयोध्या के चक्रवर्ती राजा दशरथ को पुत्र रत्न की प्राप्ति नहीं हो रही थी, तब उनके कुल गुरु महर्षि वशिष्ठ ने उन्हें पुत्र कामेष्टि यज्ञ करवाने की सलाह दी थी।

महर्षि वशिष्ठ ने राजा दशरथ को बताया था कि अथर्ववेद के ज्ञाता महर्षि श्रृंगी ही पुत्र कामेष्टि यज्ञ करवा सकते हैं। इसके बाद चक्रवर्ती राजा दशरथ नंगे पैर महर्षि श्रृंगी के आश्रम पहुंचे और उनसे पुत्र कामेष्टि यज्ञ सम्पन्न कराने के लिए अनुनय- विनय की। तत्पश्चात महर्षि श्रृंगी ने पुत्र कामेष्टि यज्ञ सम्पन्न करवाया।

महर्षि वाल्मीकि लिखते हैं कि पुत्र कामेष्टि यज्ञ की ज्वाला से अग्नि देवता प्रकट हुए और उन्होंने राजा दशरथ को पायसम का एक कटोरा दिया। इसके बाद राजा दशर​थ की तीनों रानियों कौशल्या, कैकयी और सुमित्रा ने अग्निदेव प्रदत्त पायसम खाया। इस प्रकार चक्रवर्ती राजा दशरथ की तीनों रानियों में कौशल्या से भगवान श्री राम और सुमित्रा से लक्ष्मण-शत्रुघ्न तथा कैकयी से भरत पैदा हुए।

महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण के अति​रिक्त वैदिक ग्रन्थों व अन्य साहित्यिक स्रोतों में भी पायसम जैसे व्यंजनों का उल्लेख किया गया है। महाभारत के एक प्रसंग में युधिष्ठिर द्वारा बड़ी संख्या में विद्वानों को एक भव्य भोजन कराया गया था जिसमें पायसम की तरह व्यंजन का उल्लेख है। ऐसे में एक प्रश्न यह भी उठता है कि क्या पायसम का जन्म स्थान उत्तर भारत है?

पायसम के जन्म से जुड़ी दक्षिण भारतीय स्टोरीज

प्रचलित मान्यतानुसार मीठे व्यंजन पायसम का जन्म स्थान दक्षिण भारत है। अत: दक्षिण भारत में पायसम की उत्पत्ति से जुड़ी कई कहानियां चलन में हैं।

1. शतरंज से जुड़ी कहानी- दक्षिण भारत में पायसम के जन्म की पहली और सर्वमान्य कहानी शतरंज के खेल से जुड़ी है। प्राचीन समय में केरल के अम्बालापुझा (वर्तमान में अलापुझा जिले का एक भाग) का राजा शतरंज खेलने का शौकीन था। उस राजा को एक ऋषि ने शतरंज खेलने की चुनौती दी। परन्तु शतरंज खेलने से पहले उस ऋषि ने राजा से एक शर्त रखी जिसके मुताबिक वह शतरंज के प्रत्येक खाने पर चावल का एक दाना रखे और हर अगले खाने पर उसे दोगुना करे। राजा ने ऋषि की यह शर्त स्वीकार कर ली और शतरंज का खेल शुरू हुआ।

कथा के मुताबिक, वह ऋषि कोई और नहीं बल्कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण थे। ऐसे में देखते ही देखते ही ऋषि ने शतरंज की बाजी राजा से जीत ली और वहां चावल के दानों का ढेर लग गया। इस प्रकार हैरान राजा के समक्ष भगवान श्रीकृष्ण स्वयं प्रकट हुए और मंदिर के आगन्तुकों को पायसम प्रदान करने का कहा। तब से लेकर आज तक अंबालापुझा कृष्ण मंदिर में श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में पायसम दिया जाता है। यही नहीं, दक्षिण भारत के अन्य श्रीकृष्ण मंदिरों में प्रसाद के रूप में पायसम वितरित किया जाता है।

2. कोर्णाक मंदिर निर्माण से जुड़ी कथा - पायसम से जुड़ी दूसरी कथा के मुताबिक, ओडिशा के पुरी जिले के समुद्र तट पर स्थित कोणार्क सूर्य मंदिर में गोइंदा गोदी नाम का एक मीठा व्यंजन बेहद लोकप्रिय था। ऐसी मान्यता है कि काफी मेहनत के बाद भी मंदिर बनाना मुश्किल साबित हो रहा था। ऐसे में इस मंदिर के चीफ इंजीनियर के बेटे को एक उपाय सूझा।

उसने एक मीठे व्यंजन की कटोरी में चावल के दाने गिराते हुए मंदिर की बिल्डिंग बनाने का तरीका समझाया। कहते हैं, इसके बाद चावल से जो मीठा व्यंजन तैयार किया गया, वह गोइंदा गोदी के नाम से लोकप्रिय हो गया।

एक मान्यता यह भी है कि ओडिशा के जगन्नाथ पुरी मंदिर में तकरीबन दो हजार साल पूर्व भगवान जगन्नाथ को प्रसन्न करने के लिए एक खीर बनाई गई थी। तभी से यह खीर यानि पायसम बनाई जा रही है। एक किंवदंती यह भी है कि इस मीठे व्यंजन को सम्राट अशोक के महल में शाम को नाश्ते के रूप में परोसा जाता था।

पायसम की वैरायटीज

केरल, आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना व तमिलनाडु सहित अन्य दक्षिण भारतीय राज्यों में पायसम की 15 से 20 वैरायटी हैं। परन्तु यदि हम पूरे देश की बात करें तो पायसम की वैरायटी तकरीबन 60 से अधिक है। दक्षिण भारत की पारम्परिक पायसम को मीठे व्यंजनों का रानी कहा जाता है। इस स्टोरी में हम आपको पायसम की कुछ प्रमुख वैरायटीज के बारे में बताने जा रहे हैं, जो इस प्रकार हैं- खीर/ पायसम, पाल पायसम, साबूदाना पायसम, गोथाअम्बू पायसम, अक्करावादिसली,चावल नारियल की खीर,थेंगई पाल पायसम, चक्का प्रधानम, पलदा पायसम,सेवई पायसम, जाव-अरिसि पायसम,चावल की खीर, पारुपू पायसम आदि।

पायसम बनाने की विधि

व्यंजन सामग्री पायसम बनाने से पूर्व आपके पास मात्रानुसार चावल, दूध, इलायची पाउडर, सूखे मेवे (जैसे काजू, किशमिश, बादाम, नारियल आदि), चीनी या गुड़ होना चाहिए।

पायसम कैसे बनाएं? — सबसे पहले उत्तम किस्म का चावल लेकर उसे अच्छी तरह से धो लें, इसके बाद उसे आधे घंटे के लिए भिगो दें। गाय के दूध में इस भीगे हुए चावल को नरम होने तक पकाएं। तत्पश्चात इस मिश्रण में चीनी अथवा गुड़ व इलायची डालें। चीनी के पूरी तरह घुलने तक इस मिश्रण को हिलाएं। इसके बाद एक पैन में अलग से देशी घी में काजू को भूनें, जब काजू सुनहरे रंग का हो जाए तो उसमें किशमिश डालें। तकरीबन एक मिनट तक भूनने के बाद एक कटोरे में इन सभी को मिक्स करें। फिर गरमा गरम सर्व करें।

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