
भारतीय मुक्ति संग्राम के दौरान जब असहयोग आन्दोलन अपने चरम था तभी 4 फरवरी 1922 को गुस्साई भीड़ ने गोरखपुर के चौरी-चौरा के पुलिस थाने को आग के हवाले कर दिया। इस चौरी-चौरा कांड में एक दरोगा और 22 पुलिसकर्मियों की मौत हो गई थी। दरअसल जैसे ही लोगों को पता चला कि चौरी-चौरा पुलिस स्टेशन के थानेदार ने मुंडेरा बाज़ार में कुछ कांग्रेस कार्यकर्ताओं को पीटा है, इसके बाद पुलिस स्टेशन के बाहर जमा हुई गुस्साई भीड़ ने चौरी-चौरा कांड को अंजाम दिया था। इस हिंसक घटना के बाद महात्मा गांधी ने 12 फरवरी 1922 को असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया था।
महात्मा गांधी के इस ऐलान के बाद कांग्रेसी नेतृत्व के प्रति मोहभंग की जो मनःस्थिति बनी उसके परिणामस्वरूप बंगाल, संयुक्त प्रान्त (अब उत्तर प्रदेश) और पंजाब में शिक्षित युवक-युवतियां क्रांतिकारी गतिविधियों की ओर आकृष्ट होने लगे। इसमें भी क्रांतिकारियों की दो विचारधाराएं थीं, पहली यह कि- अंग्रेजों के विरूद्ध सशस्त्र आन्दोलन करने के लिए भारतीय सेना की और यदि सम्भव हो तो अंग्रेज विरोधी विदेशी ताकतों से मदद लेना। दूसरी विचारधारा के नेता देश में हिंसात्मक कार्यक्रम- जैसे कि ब्रिटिश अफसरों, पुलिस और क्रांतिकारी नेताओं के विरूद्ध सूचना देने वाले लोगों को कत्ल करने की नीति में विश्वास करते थे।
इस स्टोरी में हम आपको कुछ ऐसी सशक्त महिलाओं के बारे में बताने जा रहे हैं जिन्होंने सशस्त्र क्रांति में हिस्सा लेकर भारत को ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्ति दिलाने में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। भारतीय मुक्ति संग्राम में उनकी भूमिका अतुलनीय और सर्वदा अमर है।
1- प्रीतिलता वाडेदार
बंगाल के क्रांतिकारी आन्दोलन में बड़े पैमाने पर युवतियों ने भी भागीदारी की थी। मास्टर सूर्यसेन के नेतृत्व में ये क्रांतिकारी महिलाएं क्रांतिकारियों को शरण देने, संदेश पहुंचाने तथा हथियारों की रक्षा करने का काम करती थीं। मौका पड़ने पर हाथ में बंदूक लेकर अंग्रेजों से संघर्ष भी करती थीं।
इन्ही क्रांतिकारी महिलाओं में एक नाम है प्रीतिलता वाडेदार है जिन्हें मास्टर सूर्यसेन ने सशस्त्र क्रांति के लिए पूरी तरह से प्रशिक्षित किया था। साल 1930 में चटगांव के शस्त्रागार पर छापे के दौरान प्रीतिलता वाडेदार ने बड़ी चतुराई से टेलीफोन लाइनों, टेलीग्राफ कार्यालय को नष्ट करने का काम किया था।
दरअसल प्रीतिलता वाडेदार मोस्ट वांटेड क्रांतिकरियों की सूची में उस वक्त शामिल हो गईं जब ब्रिटीश पुलिस अधिकारियों ने उन्हें 13 जून 1932 को सूर्यसेन के ठिकाने पर घेर लिया था। हांलाकि ब्रिटिश सैनिकों के इस हमले में प्रीतिलता वहां से फरार होने में कामयाब हो गईं थीं लेकिन मास्टर सूर्यसेन ने पहाड़तली (चटगांव) में रेलवे इंस्टीट्यूट पर हमला करने की जिम्मेदारी प्रीतिलता वाडेदार को सौंपी जिनके साथ कुल 40 अन्य क्रांतिकारी भी शामिल थे। 23 सितम्बर 1932 को रात में पौने ग्यारह बजे क्रांतिकारियों ने रेलवे इंस्टीट्यूट को आग के हवाले कर दिया। इस दौरान पुलिस अधिकारियों के जवाबी हमले में गोली लगने से प्रीतिलता वाडेदार की मौत हो गई। हांलाकि कुछ इतिहासकारों का कहना है कि गोली लगने से घायल अवस्था में पड़ी प्रीतिलता वाडेदार ने अंग्रेजों की गिरफ्त से बचने के लिए पोटैशियम सायनाइड की गोली खा ली। इस प्रकार प्रीतिलता वाडेदार जब शहीद हुईं तब वह महज 21 साल की थीं।
2- शान्ति घोष और सुनीति चौधरी
बंगाल का जिला मुख्यालय कोमिल्ला (अब त्रिपुरा में) जिलाधिकारी स्टीवेन्स के अत्याचारों से पीड़ित था। जिलाधिकारी स्टीवेंस क्रांतिकारियों को चुन-चुनकर सजा देता था। ऐसे में कोमिल्ला के फैजन्नुसा गर्ल्स हाई स्कूल की प्रधानाचार्या कल्याणी देवी (सुभाषचंद्र बोस के गुरु वेणीमाधव दास की पुत्री) अपनी छात्राओं के मन में सर्वदा स्वाधीनता के प्रति उत्साहित करती रहती थीं।
कल्याणी देवी ने अपनी दो मेधावी छात्राओं शांति घोष तथा सुनीति चौधरी के साथ मिलकर जिलाधिकारी स्टीवेंस को मारने की योजना बनाई। योजनानुसार 14 दिसम्बर 1931 को शांति घोष और सुनीति चौधरी स्कूली ड्रेस में ही जिलाधिकारी स्टीवेंस के घर पहुंच गईं और इन दोनों ने अपने कपड़ों के अन्दर पिस्तौल छुपा रखी थी। गेट पर तैनात संतरी के पूछताछ करने पर उन्होंने जिलाधिकारी स्टीवेन्स के नाम एक प्रार्थना पत्र थमा दिया जिसमें कोमिल्ला के फैजन्नुसा गर्ल्स हाई स्कूल में होने वाली तैराकी प्रतियोगिता के नाम पर सहयोग की अपील की गई थी।
अतः शांति घोष तथा सुनीति चौधरी को जिलाधिकारी स्टीवेंस से मिलने की अनुमति मिल गई। स्टीवेंस ने प्रार्थना पत्र देखकर कहा कि इस पर तुम्हारे विद्यालय की प्रधानाचार्या जी के हस्ताक्षर नहीं हैं। पहले उनसे अग्रसारित करा लाओ, फिर मैं अनुमति दे दूंगा। मौके की तलाश में खड़ी शांति और सुनीति ने कहा कि यह बातें इस प्रार्थना पत्र पर लिख दें। इस प्रकार जैसे ही स्टीवेंस अपनी कलम उठाकर लिखने लगा त्यौ हीं इन दोनों ने अपनी पिस्तौल निकाली और स्टीवेंस को गोलियों से भून दिया। मौके पर ही स्टीवेंस मारा गया लेकिन बाहर खड़े संतरी और कार्यालय में बैठे क्लर्क ने मिलकर इन दोनों क्रांतिकारी छात्राओं को पकड़ लिया। नाबालिग होने के चलते फांसी न देकर ब्रिटिश सरकार ने आजीवन कालापानी की सजा देकर इन्हें अंडमान भेज दिया।
3- बीना दास
बीना दास का जन्म बंगाल के कृष्णानगर में 24 अगस्त 1911 को हुआ था। इनके पिता का नाम बेनी माधव दास और माता का नाम सरला देवी था। सुभाष चंद्र बोस जैसे नेता भी प्रख्यात शिक्षक बेनी माधव दास के छात्र रहे थे। स्कूली दिनों से ही बीना दास और उनकी बड़ी बहन कल्याणी दास ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ होने वाली रैलियों में भाग लेना शुरू कर दिया था।
बीना दास साल 1928 में उस महिला छात्र संघ में शामिल हो गईं जिसमें विक्टोरिया स्कूल, डायोकेसन कॉलेज, ब्राह्मो गर्ल्स स्कूल, बेथ्यून कॉलेज तथा स्कॉटिश चर्च कॉलेज की तकरीबन 100 छात्राओं को लाठी, तलवार, चलाने के साथ-साथ साइकिल और गाड़ी चलाने की ट्रेनिंग दी जाती थी। ताकि इन छात्राओं को भविष्य में क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए तैयार किया जा सके।
बेथ्युन कॉलेज, कलकत्ता में पढ़ते समय बीना दास ने वर्ष 1928 में साइमन कमीशन के बहिष्कार के समय अपनी सहपाठी छात्राओं के साथ मिलकर कॉलेज गेट पर धरना दिया था। इसके बाद वह ‘युगान्तर गुट’ के क्रांतिकारियों के सम्पर्क में आईं, इस दल का मुख्य लक्ष्य अंग्रेज अधिकारियों को अपनी गोलियों का निशाना बनाना था।
ऐसे में बीना दास ने 6 फ़रवरी 1932 को आयोजित कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में बंगाल के गवर्नर स्टेनले जैक्सन को अपनी गोलियों का निशाना बनाने का निर्णय लिया। बीना दास को भी अपनी बीए की डिग्री लेनी थी। दीक्षांत समारोह में स्टेनले जैक्सन ने जैसे ही भाषण देना शुरू किया, बीना दास ने अपनी उपाधि ग्रहण करते समय बहुत नजदीक से गर्वनर पर गोली चलाई लेकिन बीना का निशाना चूक गया।
हांलाकि लेफ्टिनेन्ट कर्नल सुहरावर्दी द्वारा दबोचे जाने के बाद भी बीना दास ने एक के बाद एक कुल पांच गोलियां चलाई। बीना दास को मौके पर ही ब्रिटिश पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। बंगाल के गर्वनर को मारने के प्रयास के आरोप में बीना दास पर मुकदमा चला और उन्हें नौ साल की कठोर कारावास की सजा दी गई।
4- कल्पना दत्त
बंगाल के क्रांतिकारी आन्दोलन में मास्टर सूर्यसेन के नेतृत्व में जिन क्रांतिकारी महिलाओं ने बड़े पैमाने पर शिरकत की उनमें एक नाम कल्पना दत्त का भी है। 27 जुलाई 1913 को चटगांव के श्रीपुर गांव (अब बांग्लादेश में) में जन्मी कल्पना दत्त ने महज 14 वर्ष की उम्र में ही चटगांव के एक विद्यार्थी सम्मेलन में इन्कलाबी भाषण देकर अपनी निडरता और देश को आजाद कराने के प्रति सोच का परिचय दे दिया था।
कल्पना दत्त ने अपने भाषण में कहा था कि “यदि संसार में सिर उठाकर जीना है तो अपने माथे पर लगे गुलामी का यह कलंक मिटाना ही होगा। साथियों, अंग्रेजों के चंगुल से आजादी पाने के लिए शक्ति का संचय करो और क्रांतिकारियों का साथ दो, ब्रिटिशर्स से लड़ो।”
कल्पना दत्त ने 1929 में हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद कलकत्ता के बेथ्यून कॉलेज में प्रवेश लिया और स्नातक की पढ़ाई के दौरान कल्पना दत्त बंगाल के मशहूर क्रांतिकारी मास्टर सूर्यसेन और उनके साथ काम करने वाली बीना दास और प्रीतिलता वाडेदार के सम्पर्क में आईं।
चटगांव शस्त्रागार लूट के बाद कल्पना दत्त कोलकाता से चटगांव लौट आईं और सूर्यसेन की ‘इंडियन रिपब्लिकन आर्मी’ की सदस्य बन गईं। कल्पना दत्त क्रांतिकारियों को गोला-बारूद पहुंचाती थीं। इसके साथ ही वह बूंदक चलाने में बेहद निपुण हो चुकी थीं, उनका निशाना अचूक था। कल्पना दत्त ने कई बार सूर्यसेन तथा अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिलकर अंग्रेजों का मुकाबला भी किया था।
कल्पना दत्त ने प्रीतिलता वाडेदार और अन्य क्रांतिकारी साथियों के साथ मिलकर अदालत को बम से उड़ाने की योजना बनाई थी लेकिन इससे पूर्व ही अंग्रेजों ने कल्पना दत्त को गिरफ्तार कर लिया। हांलाकि साक्ष्य के अभाव में कल्पना दत्त को रिहा कर दिया गया। अंग्रेजों को कई बार चकमा दे चुकी कल्पना दत्त के घर अब ब्रिटीश प्रशासन ने पुलिस का पहरा लगा था। बावजूद इसके भेष बदलने में माहिर कल्पना घर से भागने में कामयाब हो गईं और सूर्यसेन के साथ मिलकर क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम देने लगी। ठीक दो साल बाद यानि 16 फरवरी 1933 को पुलिस ने जब सूर्यसेन को गिरफ्तार किया तब कल्पना दत्त सूर्यसेन के ठिकाने से फरार होने में कामयाब रहीं।
उसी साल मई के महीने में कल्पना दत्त को ब्रिटिश पुलिस ने एक मुठभेड़ में चारों तरफ से घेर लिया आखिरकार उन्हें आत्मसमर्पण करना पड़ा। कल्पना दत्त ने अपनी किताब ‘चटगांव शस्त्रागार हमला’ में लिखा है कि “जेल में गांधी मुझसे मिलने आए। वे मेरी क्रांतिकारी गतिविधियों से नाराज थे लेकिन उन्होंने कहा कि मैं फिर भी तुम्हारी रिहाई की कोशिश करूंगा।” साल 1939 में कल्पना दत्त को रिहा कर दिया गया। इसके बाद कल्पना दत्त ने सियासत में कदम रखा।
5- दुर्गा भाभी
क्रांतिकारियों के इतिहास में दुर्गा भाभी का नाम बड़ी शिद्दत से लिया जाता है। दरअसल दुर्गा भाभी उस वक्त पूरे देश में सुर्खियों में आईं जब उन्होंने जॉन सॉन्डर्स की हत्या के बादभगत सिंह को लाहौर से भागने में मदद की थी। बता दें कि दुर्गा देवी वोहरा ने सान्डर्स की हत्या के बाद भगत सिंह की पत्नी बनकर उन्हें लाहौर से कलकत्ता पहुंचाया था।
दुर्गा देवी का विवाह लाहौर में रहने वाले गुजराती भगवती चरण वोहरा के साथ हुआ। भगवती चरण वोहरा वह नाम है जिसके घर भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु जैसे कई क्रांतिकारियों का आना-जाना था। ऐसे में समाज की परवाह किए बगैर अपने पति के संग दुर्गा देवी ने क्रांतिकारियों का हमेशा साथ दिया। दुर्गा देवी ने संदेश वाहक का काम करने के साथ ही बम बनाने वाली फै़क्ट्री चलाने में भी सहायता की।
भगत सिंह को जेल से छुड़ाने के लिए भगवती चरण वोहरा बम की टेस्टिंग कर रहे थे, इस दौरान बम धमाके में उनकी मौत हो गई बावजूद इसके दुर्गा देवी ने गदर पार्टी के पृथ्वी सिंह और सुखदेव के साथ मिलकर मुम्बई में पंजाब के गर्वनर विलियम हैली पर गोलियां चलाईं। 8 अक्तूबर 1930 की रात को लैमिंग्टन रोड पर हुए मुठभेड़ में दुर्गा देवी ने तीन-चार गोलियां चलाई थीं।
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