उत्तर भारत में 1857 की महाक्रांति का नेतृत्व मेरठ में मंगल पांडे, झांसी में रानी लक्ष्मीबाई तथा कानपुर में नाना साहब एवं तात्या टोपे के हाथों में था। जबकि बिहार के भोजपुर जिले (अब आरा) में महाक्रांति की अगुवाई बाबू कुंवर सिंह कर रहे थे। 26 अप्रैल 1858 ई. को इस महायोद्धा के महाप्रस्थान के बाद महाक्रांति की कमान उनके छोटे भाई बाबू अमर सिंह ने अपने हाथों में ले ली।
इसी दौरान बिहार सीमा से सटे गाजीपुर जनपद का गहमर गांव भी महाक्रांति की लपटों से अछूता नहीं रहा। गहमर के जमींदार मेघर सिंह सकरवार (वीर मैगर सिंह) ने गहमर स्थित नील फैक्ट्री के अंग्रेज अफसर राबर्ट स्मिथ के खिलाफ बागी अभियान चलाया। इसके अतिरिक्त मेघर सिंह के अनुरोध पर महाक्रांति का नेतृत्व कर रहे बाबू अमर सिंह का विद्रोही सिपाहियों संग गहमर आगमन हुआ था। गहमर के जमींदार मेघर सिंह ने तकरीबन 5 दिन तक बाबू अमर सिंह का आतिथ्य-सत्कार किया। तत्पश्चात सैन्य एवं आर्थिक मदद देकर भोजपुर के लिए रवाना किया।
हैरानी की बात है कि गहमर के जमींदार मेघर सिंह सकरवार के इस मदद की बदौलत बाबू अमर सिंह ने अंग्रेज सेनापति लुगार्ड को बार- बार करारी शिकस्त दी जिससे अपमानित होकर वह इंग्लैण्ड भाग गया। इतना कुछ जानने के बाद आप गहमर के वीर योद्धा मेघर सिंह सकरवार (मैगर सिंह) के बारे में जानने को उत्सुक हो चुके होंगे। इसके अलावा आप यह भी सोच रहे होंगे कि आखिर में मेघर सिंह सकरवार ने बाबू अमर सिंह को किस तरह की सैन्य एवं आर्थिक मदद दी थी? यह सब जानने के लिए इस रोचक स्टोरी को जरूर पढ़ें।
वीर योद्धा मेघर सिंह सकरवार
1857 की महाक्रांति के गुमनाम योद्धा मेघर सिंह सकरवार को ज्यादातर लोग वीर मैगर सिंह के नाम से जानते हैं। वीर मेघर सिंह सकरवार का जन्म साल 1820 में पूर्वांचल स्थित गाजीपुर जिले के सबसे बड़े गांव गहमर में हुआ था। मेघर सिंह के पिता का नाम भंजन सिंह तथा माता का नाम धनेशा था।
मेघर सिंह सकरवार गाजीपुर जनपद के सबसे बड़ी बड़ी आबादी वाले राजपूतों के गांव गहमर के जमींदार थे। मेघर सिंह ने गहमर की नील फैक्ट्री के अफसर राबर्ट स्मिथ के खिलाफ बागी अभियान चलाया। इसके अतिरिक्त आप ने 1857 के महाविद्रोह में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के विरूद्ध भोजपुर के राजा कुंवर सिंह के छोटे भाई बाबू अमर सिंह का भरपूर साथ दिया था।
अंग्रेज अफसर रॉबर्ट स्मिथ के खिलाफ बागी अभियान
महाक्रांति के दिनों में अंग्रेजों ने गाजीपुर जनपद के गहमर, भदौरा तथा दिलदारनगर में नील फैक्ट्रियां स्थापित कर रखी थीं। गहमर नील फैक्ट्री के अंग्रेज अफसर रॉबर्ट स्मिथ के उत्पीड़न से आस-पास के किसान काफी परेशान थे। उन्हीं दिनों जब चौसा स्थित राजपुर गांव के नील फैक्ट्री मालिक की हत्या कर दी गई तब मेघर सिंह सकरवार की अगुवाई में तकरीबन 300 विद्रोही सैनिकों ने रॉबर्ट स्मिथ को सबक सिखाने का निर्णय लिया।
लिहाजा 3 जून 1858 ई. को तकरीबन 300 विद्रोही सैनिकों की टुकड़ी गहमर पहुंची, इससे पूर्व ही अंग्रेज अफसर रॉबर्ट स्मिथ अपनी जान बचाकर बक्सर भाग चुका था। इस घटना के ठीक तीन दिन बाद ही यानि 6 जून 1858 ई. को मेघर सिंह सकरवार के अनुरोध पर महाक्रांति के नायक बाबू अमर सिंह का गहमर आगमन हुआ।
बाबू अमर सिंह का गहमर आगमन
1857 की महाक्रांति के महायोद्धा बाबू कुंवर सिंह के निधन के पश्चात इतिहास के रंगमंच एक देशभक्त वीर ने पदार्पण किया। जी हां, वह वीर योद्धा कोई और नहीं अपितु बाबू कुंवर सिंह के छोटे भाई बाबू अमर सिंह थे। बाबू अमर सिंह का कद लम्बा, रंग गोरा और नाक के दाहिनी तरफ एक तिल था।
बाबू अमर सिंह ने अपने बड़े भाई राजा कुंवर सिंह के निधन के ठीक चार दिन बाद यानि 30 अप्रैल 1858 ई. को आरा पर धावा बोल दिया और अंग्रेजी सेना को करारी शिकस्त दी। अंग्रेज सैनिकों की इस हार में विद्रोही सैनिकों के कमांडर इन चीफ हरेकृष्ण सिंह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अंग्रेजों की पराजय का समाचार मिलते ही ब्रिगेडियर डगलस और जनरल लुगार्ड ने गंगा नदी पारकर अमर सिंह का सामना किया। अंग्रेजों ने जब विद्रोही सैनिकों की घेराबंदी शुरू की तब बाबू अमर सिंह ने बड़ी चालाकी से काम लिया, वह अपनी सेना को अलग-अलग टुकड़ियों में बांटकर एक निश्चित स्थान एवं समय बताकर एकत्र होने का आदेश देते थे। बाबू अमर सिंह की इस तरकीब से अंग्रेजी सेना के पसीने छूट गए। अंग्रेजों को लगता था कि वे विजयी हो रहे हैं लेकिन बाबू अमर सिंह की सेना पूरे जोश एवं पराक्रम के साथ एक नए स्थान पर दिखाई देती थी।
इसी दौरान गहमर के जमींदार मेघर सिंह के नेतृत्व में सकारवार राजपूतों ने बाबू अमर सिंह को मदद देने का निर्णय लिया, तत्पश्चात मेघर सिंह ने एक पत्र लिखा। फिर क्या था, 6 जून 1858 ई. को बाबू अमर सिंह ने अपने 2000 विद्रोही सैनिकों तथा 500 घुड़सवारों के साथ गहमर में पदार्पण किया। स्थानीय विद्वानों के अनुसार, इस गठबन्धन का एक कारण सकरवार एवं उज्जैनिया राजपूतों के बीच पुराने वैवाहिक सम्बन्ध भी थे।
गहमर के जमींदार मेघर सिंह सकरवार ने बाबू अमर सिंह तथा उनकी सैन्य टुकड़ी का चार दिनों तक अतिथ्य-सत्कार किया। मेघर सिंह ने बाबू अमर सिंह को 20,000 रुपए नकद तथा भारी मात्रा में हथियार एवं रसद देकर मदद की। तत्पश्चात बाबू अमर सिंह अपनी सैन्य टुकड़ी के साथ 10 जून 1858 ई. को गहमर से रवाना हुए।

इंग्लैण्ड भाग गया अंग्रेज सेनापति लुगार्ड
मेघर सिंह एवं बाबू अमर सिंह की संयुक्त शक्ति ने गंगा-कर्मनाशा नदी के तटीय इलाकों में ब्रिटिश सेना को खूब छकाया। इन क्षेत्रों में अंग्रेज़ी सेना लंबे समय तक विद्रोहियों से जूझती रही।
अंग्रेजी सेना जंगल के किसी एक छोर से क्रांतिकारियों का पीछा करती तो दूसरे छोर पर उनका उत्पात मचा होता और वहां से भागकर विद्रोही पहली जगह पर फिर से कब्जा कर लेते थे।
विद्रोहियों की इस सैन्य कार्रवाई से परेशान, निराश और अपमानित होकर अंग्रेज सेनापति लुगार्ड ने अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और इंग्लैण्ड चला गया। इसी के साथ लुगार्ड की सैन्य टुकड़ी भी अपनी छावनी में लौट आई।
मेघर सिंह को मिली फांसी की सजा
जून, जुलाई, अगस्त और सितम्बर का महीना भी बीत गया, जगदीशपुर में क्रांतिकारियों का ध्वज लहरा रहा था। ब्रिटिश सरकार ने ऐलान किया कि जो भी शख्स अमर सिंह को पकड़वाएगा उसे 6000 रुपए का नकद ईनाम दिया जाएगा। उन दिनों पुरस्कार की यह धनराशि बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी।
आखिरकार 19 अक्टूबर 1858 को अग्रेंजी सेना ने नोनदी गांव में क्रांतिकारियों को चारों तरफ से घेर लिया। क्रांतिकारियों के 400 सैनिकों में 300 सैनिक मारे गए जबकि 100 सैनिकों ने खुले मैदान में शेर की तरह ब्रिटिश सैनिकों से युद्ध किया, अंत में सिर्फ तीन सैनिक जीवित बचे, इनमें से एक बाबू अमर सिंह थे।
युद्ध के दौरान बाबू अमर सिंह जिस हाथी पर सवार थे, उससे कूदकर वह युद्धस्थल से अचानक गायब हो गए और वहां से कैमूर की पहाड़ियों में चले गए। ऐसा कहा जाता है कि बाबू अमर सिंह अक्टूबर 1858 में नेपाल चल गए। जबकि 24 नवम्बर 1859 ई. को बाबू अमर सिंह पलामू जिले के करौंदा गांव में देखे गए। बाबू अमर सिंह का निधन कैसे हुआ, यह शोध का विषय है।
वहीं दूसरी तरफ मेघर सिंह सकरवार भी अंग्रेजी सरकार ने 6000 रुपए का ईनाम घोषित कर दिया लिहाजा वह भी दिसम्बर 1858 के अंत तक नेपाल चले गए किन्तु वहाँ के शासकों ने उन्हें शरण देने से इंकार कर दिया। इसी बीच अंग्रेजों ने मेघर सिंह के दोनों पुत्रों भिरगुन और संग्राम सिंह को अपने कब्जे लेकर उनकी हत्या कर दी।
आखिरकार 27 दिसम्बर 1860 ई. को मेघर सिंह सकरवार को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया। बनारस की कोर्ट में मुकदमा चला और उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। इसके बाद गाजीपुर जेल में मेघर सिंह को पीपल के पेड़ से लटका कर फांसी दे दी गई। मेघर सिंह सकरवार के नाम गहमर में एक टोला (पट्टी) भी है जिसे लोग ‘मैगर राय पट्टी’ के नाम से जानते हैं।
साल 1961 में तत्कालीन रेल मंत्री बाबू जगजीवन राम ने गहमर ग्राम पंचायत परिसर में 16 जनवरी को मेघर सिंह स्मारक का उद्घाटन किया था। जबकि गहमर के पूरब तरफ एक क्रीड़ा स्थल पर सिंहासन सिंह (पूर्व विधायक) ने अपने कार्यकाल में बाबू मेघर सिंह की एक आदमकद प्रतिमा भी लगवाई। इस प्रतिमा पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पुष्पांजलि भी अर्पित कर चुके हैं।
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