
मेवाड़ का यशस्वी शासक महाराणा सांगा एक मात्र हिन्दू राजा था जिसके सेनापतित्व में तकरीबन सभी राजपूत राजा इकट्ठे हुए ताकि विदेशियों को भारत से बाहर खदेड़ा जा सके। इसीलिए महाराणा सांगा को ‘हिन्दूपथ’ के नाम से भी जाना जाता है।
महाराणा सांगा के शरीर पर 80 घाव थे। राणा सांगा के बड़े भाई ने उसकी एक आंख भी फोड़ दी थी। जबकि इब्राहिम लोदी के साथ हुए युद्ध में राणा सांगा ने एक पैर और एक हाथ भी गंवा दिया था। यही वजह है कि राजपूताना इतिहास में महाराणा सांगा को ‘सैनिकों का भग्नावशेष’ भी कहा जाता है। महाराणा सांगा के शासनकाल में मेवाड़ उत्तरी भारत का सबसे शक्तिशाली और समृद्धि राज्य बन गया था।
दरअसल एक बार महाराणा सांगा के बड़े भाई पृथ्वीराज ने उस पर तलवार से प्रहार कर दिया जिससे उसकी एक आंख फूंट गई। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर में पृथ्वीराज ने अपने छोटे भाई महाराणा सांगा के साथ ऐसा क्यों किया? इस रोचक को प्रश्न जानने के लिए यह स्टोरी जरूर पढ़ें।
राणा रायमल का तीसरा पुत्र था महाराणा सांगा
अपने पिता महाराणा कुम्भा की हत्या करके ऊदा (उदयकरण) मेवाड़ का शासक बना। परन्तु मेवाड़ी सरदारों को पितृहन्ता ऊदा का गद्दी पर बैठना बिल्कुल पसन्द नहीं आया अत: उन्होंने कुम्भा के छोटे पुत्र रायमल को मेवाड़ का शासक बनाने का निर्णय लिया। मेवाड़ के सामन्तों ने रायमल को चित्तौड़ आने का निमंत्रण भेजा, इस समय वह अपने ससुराल ईडर में था। मेवाड़ी सामन्तों का निमंत्रण मिलते ही रायमल ससैन्य मेवाड़ की तरफ रवाना हुआ।
ऐसे में ऊदा डरकर कुम्भलगढ़ होते हुए अपने पुत्रों सहित मालवा के सुल्तान गयासुद्दीन खलजी की शरण में मांडू आ गया। ऊदा ने सुल्तान को अपने पक्ष में करने के लिए अपनी पुत्री का विवाह भी गयासुद्दीन से करने के लिए कहा। परन्तु एक दिन अचानक बिजली गिरने से ऊदा की मृत्यु हो गई।
ऊदा की मृत्यु के बाद रायमल मेवाड़ का शासक बना। राणा रायमल ने तकरीबन 36 वर्षों तक शासन किया। राणा रायमल की 11 रानियां थीं जिनसे 13 पुत्र तथा 2 पुत्रियां हुईं। पृथ्वीराज ज्येष्ठपुत्र, जयमल दूसरा पुत्र तथा सांगा तीसरा पुत्र था। पृथ्वीराज और सांगा सगे भाई थे जो राणा रायमल की रानी रतन कुंवर के गर्भ से पैदा हुए थे। राणा रायमल अपने जीवनकाल में अपना उत्तराधिकारी निश्चित नहीं कर पाया था, जिससे उसके महत्वाकांक्षी पुत्र और चचेरे भाई एक-दूसरे के प्रति वैमनस्य रखने लगे।
मेवाड़ की गद्दी के प्रमुख दावेदार
राणा रायमल के ज्येष्ठ पुत्रों में पृथ्वीराज और जयमल का दावा ज्यादा मजबूत था। जबकि रायमल का तीसरा पुत्र सांगा भी मेवाड़ की गद्दी पर बैठने का स्वप्न देख रहा था। वहीं राणा रायमल का चाचा सारंगदेव भी मेवाड़ की गद्दी का प्रबल दावेदार था।
कुम्भा का भाई खेमकरण का पुत्र सूरजमल तो रायमल को भी मेवाड़ का शासक स्वीकार करना आपत्तिजनक समझता था। ऐसी स्थिति में सांगा को सिंहासन प्राप्त होना दूर की कल्पना थी। उपरोक्त परिस्थितियों में राणा रायमल के उत्तराधिकार के प्रश्न को लेकर इन सभी उम्मीदवारों में रायमल के जीवनकाल में ही तनाव उत्पन्न हो गया था।
ज्योतिषी की भविष्यवाणी और पृथ्वीराज का सांगा पर प्रहार
एक जनश्रुति को आधार मानकर इतिहासकार डॉ. ओझा और हरविलास शारदा लिखते हैं कि एक दिन पृथ्वीराज, जयमल औरर सांगा अपने चाचा सारंगदेव के साथ एक ज्योतिषी के यहां पहुंचे और अपना भविष्यफल जानने की इच्छा व्यक्त की।
उस ज्योतिषी ने उन सभी की जन्मपत्रियों के आधार पर सांगा का राजयोग प्रबल बताया। अति महात्वाकांक्षी पृथ्वीराज इस भविष्यवाणी को बरदाश्त नहीं कर सका और आवेश में आकर अपनी तलवार से सांगा पर प्रहार कर बैठा। इस हमले में सांगा तो बच गया लेकिन तलवार की हूल से उसकी एक आंख फूट गई।
इस दौरान सारंगदेव ने बीच में आकर दोनों को समझाया। उसने सांगा की आंख का इलाज भी करवाया परन्तु उसकी एक आंख हमेशा के लिए चली गई। सारंगदेव ने तीनों भाईयों में मेल कराने का प्रयास किया और कहा कि ज्योतिषी के कथन पर विश्वास करके आपस में मनमुटाव करना अच्छी बात नहीं है।
भीमल गांव के पुजारिन की भविष्यवाणी
सारंगदेव ने कहा कि ज्योतिष से अच्छा भीमल गांव की चारण जाति की पुजारिन है, जो चमत्कारिक है और भविष्य जानती है। ऐसे में सारंगदेव के साथ तीनों भाई भीमल गांव की उस पुजारिन के पास पहुंचे। पुजारिन उस समय कहीं गई हुई थी, अत: सभी वहां बैठकर उसका इन्तजार करने लगे। जब पुजारिन आई तो सभी ने अपना भविष्य जानने की इच्छा प्रकट की। इसके बाद पुजारिन ने भी ज्योतिष की ही बात दोहराई। इतना सुनते ही तीनों भाईयों में वहीं युद्ध आरम्भ हो गया।
पृथ्वीराज अपनी तलवार की जोर से कहा करता था कि “मुझको मेवाड़ राज्य का शासन करने के निमित्त पैदा किया गया है।” ऐसे में वह सांगा पर टूट पड़ा। सारंगदेव ने किसी तरह सांगा को बचाया और फिर सांगा वहां से भाग खड़ा हुआ। जयमल भी उसका पीछा करता हुआ सेवन्त्री गांव आया। सेवन्त्री के बीदा राठौड़ ने सांगा को शरण दी थी, लेकिन बीदा राठौड़ जयमल के हाथों मारा गया। इसके बाद सांगा ने भागकर अजमेर में कर्मचन्द पंवार के यहां शरण ली।
डकैत कर्मचन्द के शरण में रहा राणा सांगा
परमारवंशी कर्मचन्द एक डकैत था, जो डकैती करके अपना जीवन निर्वाह करता था। सांगा को भी अपने अज्ञातवास के दौरान कर्मचन्द का साथ देने के लिए विवश होना पड़ा। एक दिन दोपहर में बरगद के पेड़ के नीचे सांगा विश्राम कर रहा था तभी सूर्य की किरणें सांगा के मुख पर पड़ने लगीं। जिसे देखकर एक नागराज अपने बिल से निकलकर सांगा के मुखमण्डल पर अपना फण फैलाकर बैठ गया।
उसी समय एक शकुन पक्षी भी जोर-जोर से बोलने लगा। उसी रास्ते जा रहे एक शकुन पक्षी विशेषज्ञ ने यह दृश्य देखा और पक्षी की आवाज सुनकर उसे विश्वास हो गया कि सोया हुआ शख्स एक दिन महान राजा बनेगा। उस शकुन विशेषज्ञ का नाम ‘मारू’ था। मारू ने सारा वृत्तान्त कर्मचन्द को सुनाया। इसके बाद कर्मचन्द अपने सहयोगी सांगा से इस कदर प्रभावित हुआ कि उसने अपनी लड़की की शादी सांगा से कर दी। कहते हैं जब तक सांगा को मेवाड़ का सिंहासन प्राप्त नहीं हुआ तब तक वह कर्मचन्द के पास ही रहा।
मेवाड़ की गद्दी पर बैठा राणा सांगा
बता दें कि राणा रायमल का दूसरा बेटा जयमल टोडा के राव सुरतान के हाथों मारा गया। जबकि डॉ. गोपीनाथ शर्मा के अनुसार, सोलंकियों के विरूद्ध एक युद्ध में जयमल वीरगति को प्राप्त हुआ था। वहीं पृथ्वीराज की एक बहन आनन्दा बाई की शादी सिरोही के शासक राव जगमाल के साथ हुई। लेकिन वह पृथ्वीराज की बहन को अत्यधिक कष्ट दे रहा था। ऐसे में पृथ्वीराज अपने बहनोई को समझाने सिरोही आया।
ऐसा कहा जाता है कि लौटते समय राव जगमाल ने विषयुक्त लड्डू पृथ्वीराज के साथ बंधवा दिए, जिनको खाने से रास्ते में ही पृथ्वीराज की मृत्यु हो गई। हांलाकि अपनी मृत्यु से पूर्व पृथ्वीराज ने सांरगदेव की भी हत्या कर दी थी। सूरजमल भी नए राज्य की स्थापना हेतु कांठल की ओर चला गया था। ऐसे में मेवाड़ में कोई उचित उत्तराधिकारी नहीं बचा था अत: रायमल जब मृत्युशैय्या पर था तब उसने राणा सांगा (राणा संग्राम सिंह) को बुलाकर ‘महाराजकुमार’ का पद दिया। इस प्रकार रायमल की मृत्यु के पश्चात 24 मई 1509 ई. को राणा सांगा मेवाड़ का शासक बना।
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