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maharana kumbha with 22 titles was also the builder of 32 forts

22 उपाधियों वाला यह महायोद्धा 32 दुर्गों का निर्माता भी था, इसे जानते हैं आप?

महाराणा कुंभा का जन्म 1423 ई. को महाराणा मोकल की परमार रानी सौभाग्य देवी के गर्भ से हुआ था। मोकल की हत्या के समय जिलवाड़ा के उसी शिविर में कुंभा भी उ​पस्थित था, उन हत्यारों ने कुंभा पर भी हमला किया किन्तु उसके शुभ चिंतक उसे वहां से बचाकर सकुशल चित्तौड़ ले आए। चित्तौड़गढ़ दुर्ग में कुंभा को मात्र 10 वर्ष की आयु में 1433 ई. में मेवाड़ का महाराणा बनाया गया।

जीवन के आखिरी दिनों में महाराणा कुंभा को उन्माद नामक रोग हो गया था जिसके चलते वह अपना अधिकांश समय कुंभलगढ़ दुर्ग में स्थित मामादेव मंदिर के निकट जलाशय पर बिताने लगा। 1468 ई. में एक दिन कुंभा उसी जलाशय के तट पर भगवान की भक्ति में लीन था, ऐसे में उसके बड़े पुत्र उदयकरण उर्फ उदा ने राज्य के लालच में उसकी हत्या कर दी।

कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति, कुम्भलगढ़ प्रशस्ति एवं गीत गोविन्द नामक पुस्तक पर लिखी टीका रसिक प्रिया में तकरीबन 22 उपाधियों का वर्णन मिलता है। इतना ही नहीं, वीर विनोद पुस्तक के रचयिता श्यामलदास के अनुसार मेवाड़ के 84 दुर्गों में से 32 दुर्ग कुंभा ने बनवाए थे। इसलिए महाराणा कुंभा के शासनकाल को राजस्थान के ‘स्थापत्य कला का स्वर्ण युग’ भी कहा जाता है। ध्यान रहे कि महाराणा कुंभा को ‘राजस्थान की स्थापत्य कला का जनक’ भी कहते हैं।

कुंभा एक अच्छा शासक ही नहीं अपितु श्रेष्ठ राजनीतिज्ञ भी था। वह परम विद्वान, साहित्यकार एवं स्थापत्य कला का मर्मज्ञ भी था। इस स्टोरी में हम आपको महाराणा कुंभा की उन सभी उपाधियों तथा उसके द्वारा निर्मित सर्वश्रेष्ठ दुर्गों के बारे में बताएंगे।

प्रसिद्ध पुस्तक ‘गीत गोविन्द’ पर लिखी टीका ‘रसिक प्रिया’ में महाराणा कुम्भा की निम्न उपाधियों का वर्णन मिलता है-

नरपति- सामान्य मानव से श्रेष्ठ होने के कारण। अश्वपति- कुशल घुड़सवार होने के कारण।

गणपति- राज्य का राजा होने के कारण। छापगुरु - छापामार युद्ध प​द्धति में निपुण होने के कारण।

हिन्दू सुरताण- समकालीन मुस्लिम शासकों द्वारा विभूषित किया गया है। नंदिकेश्वर अवतार- नंदिकेश्वर के मत का अनुसरण करने के कारण। नाटकराज कर्ता- नृत्यशास्त्र का ज्ञाता होने के कारण। शैलगुरु- युद्ध में निपुण होने के कारण।

चापगुरु- धनुर्विद्या का ज्ञाता होने के कारण। धीमान- बुद्धिमतापूर्वक निर्माण कार्य करवाने के कारण।

अभिनव भारताचार्य- श्रेष्ठ वीणा वादक एवं संगीत के क्षेत्र में विपुल ज्ञान के कारण। प्रजापालक- जनता का हितैषी होने के कारण।

इसके अतिरिक्त ‘कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति’ तथा ‘कुंभलगढ़ प्रशस्ति’ से भी हमें महाराणा कुंभा की उपाधियों की जानकारी मिलती है, जो निम्नलिखित हैं-

महाराजाधिराज- राजाओं का राजा होने के कारण। महाराणा- अनेक राज्यों को अपने अधिकार में रखने के कारण।

राणा रासो-  विद्वानों का आश्रयदाता होने के कारण। राजगुरु- राजनीतिक सिद्धान्तों में दक्ष होने तथा विभिन्न राजाओं, सामन्तों व जागीरदारों का हितैषी होने के कारण। दानगुरु - विद्वानों, कलाकारों तथा निर्धनों को दान देने के कारण।

हालगुरु - गिरि दुर्गों का स्वामी होने के कारण। परमगुरु - विभिन्न विद्याओं का ज्ञाता होने कारण। राजस्थान के अन्य साहित्यिक ग्रन्थों में कुंभा को रावराय, राय रायन व राणेराय जैसी उपाधियों से भी विभूषित किया गया है।

मेवाड़ का शासक महाराणा कुंभा एक विजेता ही नहीं अपितु एक महान निर्माता भी था। श्यामलदास की प्रख्यात कृति वीर विनोद के मुताबिक मेवाड़ के 84 दुर्गों में से 32 दुर्ग महाराणा कुंभा ने बनवाए थे। कुंभा के शासनकाल में कुछ महत्वपूर्ण निर्माणकार्य हुए, जो इस प्रकार हैं-

कुम्भलगढ़ दुर्ग- इस विख्यात दुर्ग को कुंभलमेरू/कुंभपुर/कमलपीर/मच्छेन्द्र आदि नामों से भी जाना जाता है। कुम्भलगढ़ दुर्ग का निर्माण 1443 ई. से 1456 ई. के बीच राजसमंद के सादड़ी गांव के निकट अरावली की जरगा पहाड़ी पर महाराणा कुंभा ने करवाया था। इस दुर्ग का मुख्य शिल्पकार व वास्तुकार मंडन था।

कुम्भलगढ़ दुर्ग तकरीबन 36 किमी. लम्बे परकोटे से सुरक्षित घिरा हुआ है जो अंतरराष्ट्रीय रिकार्ड में दर्ज है। इस दुर्ग की दीवार इतनी चौड़ी है कि उस पर चार घुड़सवार एकसाथ चल सकते हैं, इसलिए इसकी प्राचीर को भारत की महान दीवार कहते हैं। ब्रिटिश इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने कुंभलगढ़ दुर्ग की सुदृढ़ को देखकर इसे ‘एट्रास्कॉन’ की उपमा दी है।

कटारगढ़ दुर्ग- कुम्भलगढ़ में ही एक और दुर्ग बना हुआ है, जिसे कटारगढ़ दुर्ग कहा जाता है। कटारगढ़ दुर्ग में ही रहकर महाराणा कुंभा मेवाड़ की देखरेख करता था, अत: इस दुर्ग को मेवाड़ की आंख कहते हैं। कटारगढ़ दुर्ग के बारे में अबुल फजल लिखता है कि “यह दुर्ग इतनी बुलंदी पर बना हुआ है कि नीचे से ऊपर की तरफ देखने पर सिर पर रखी पगड़ी गिर जाती है।”

बसंती दुर्ग- महाराणा कुंभा ने सिरोही में पिंडवाड़ा गांव के समीप बसंतपुर कस्बे को पुन: बसाकर वहां बसंती दुर्ग का निर्माण करवाया और यही पर भगवान विष्णु के निमित्त 7 जलाशय भी बनवाए।

अचलगढ़ दुर्ग- इसका निर्माण परमार शासकों ने करवाया था तथा पुन: निर्माण 1452 ई. में महाराणा कुम्भा ने करवाया। इसमें ओखा रानी का महल, अचलेश्वर महादेव का मंदिर, कपूर सागर तालाब, सावन भादो झील स्थित है।

बैराठ का दुर्ग - मेरों के बढ़ते हुए प्रभाव को रोकने के लिए बदनौर में 1457 ई. के आसपास बैराठ नामक पहाड़ी पर इस दुर्ग का निर्माण कुंभा ने करवाया।

भोमठ का दुर्ग- भीलों की शक्तियों पर नियंत्रण रखने के लिए भोमठ के दुर्ग का निर्माण कुंभा ने बाड़मेर में करवाया।

विजय स्तम्भ- इसे कीर्ति स्तम्भ/विष्णु ध्वज/मूर्तियों का अजायबघर/ भारतीय मूर्ति कला का विश्वकोष तथा विक्ट्री स्तम्भ आदि नामों से जाना जाता है। इसका निर्माण 1440 ई. में कुम्भा ने मालवा विजय 1437 ई. की स्मृति में करवाया था। यह स्तम्भ नौ मंजिला है जो 120 फीट ऊंचा है, इसमें 157 सीढ़ियां है। विजय स्तम्भ का आधार 30 फीट है। विजय स्तम्भ की तीसरी मंजिल पर नौ बार अल्लाह लिखा हुआ है। कर्नल जेम्स टॉड ने इसके बारे में लिखा है कि “यह कुतुबमीनार से बेहतरीन इमारत है।” फर्ग्युसन ने इसे देखकर विजय स्तम्भ की तुलना रोम के टार्जन से की। मेवाड़ के महाराणा स्वरूपसिंह के शासनकाल में विजय स्तम्भ पर बिजली गिरनी से यह क्षतिग्रस्त हो गया था। अत: महाराणा स्वरूपसिंह ने उसे पुनर्निर्मित करवाया। यह राजस्थान की पहली इमारत है जिस पर 15 अगस्त 1949 को एक रुपए का डाक टिकट जारी किया गया। विजय स्तम्भ राजस्थान पुलिस का प्रतीक चिह्न भी है।

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