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India was a silver sea during the Mughal period, know what Edward Terry has written?

मुगलों के समय चांदी का समन्दर था हिन्दुस्तान, जानिए एडवर्ड टैरी ने क्या लिखा है?

एशिया के सबसे ताकतवर साम्राज्यों में से एक था मुगल साम्राज्य। इसी के समानान्तर मिंग (चीन), सफ़विद (ईरान) और ओटोमन साम्राज्य भी थे जिसके चलते चीन से भूमध्य सागर तक फैले स्थलीय व्यापार को बढ़ावा मिला। यही वजह है कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के मामले में भारत अधिक समृद्ध हो गया। इस दौरान भारत में खरीदी गई सामग्री के बदले बड़ी मात्रा में चांदी के सिक्के यहां लाए गए। चूंकि भारत में चांदी के प्राकृतिक संसाधनों की कमी थी, इसलिए यह सुनिश्चित किया गया कि इस देश में धातु मुद्रा के रूप में चांदी हमेशा उपलब्ध रहे। इस स्टोरी में ब्रिटिश यात्री एडवर्ड टैरी के उस विवरण का उल्लेख करेंगे जो उसने हिन्दुस्तान में चांदी की आमद के बारे में लिखा है।

जानकारी के लिए बता दें कि ब्रिटिश यात्री सर टामस रो मुगल दरबार में साल 1616 में आया था। ध्यान देने वाली बात यह है कि सर टामस रो के साथ ही एक अन्य ब्रिटिश पादरी एडवर्ड टैरी भी हिन्दुस्तान आया था। सन् 1617 में एडवर्ड टैरी को पादशाह जहांगीर को देखने का अवसर मिला। इसके बाद वहां से वह अहमदाबाद चला गया। एडवर्ड टैरी ने 1622 ई. में प्रिंस आफ वेल्स (चार्ल्स प्रथम) को एक विवरण प्रस्तुत किया था जिसमें मुगलिया हुकूमत से जुड़ी अनेक चौंकाने वाली लिखी हैं।

एडवर्ड टैरी इस देश में चांदी की आमद के बारे में लिखता है कि, “जैसे सारी नदियां पानी ले जाकर सागर में उड़ेल देती हैं, ठीक उसी तरह से चांदी के अनेक स्रोत चांदी लाकर शाही खजाने में डाल देते हैं, जो बाद में वहीं ठहर जाती थी।दुनिया के प्रत्येक देशों के व्यापारी यहां आकर अपने सोने-चांदी के बदले में मन चाही सामग्री खरीद कर ले जाते थे। ऐसे व्यापारियों का इस देश में खूब स्वागत किया जाता था। किन्तु यह बात समझ में नहीं आती कि चांदी इस देश के बाहर ले जाना अपराध क्यों माना जाता था? किसी भी देश के अनजान से अनजान शख्स को हिन्दुस्तान में व्यापार करने के लिए प्रोत्साहन मिलता था किन्तु उन्हें इस देश से बाहर चांदी ले जाने की अनुमति नहीं थी।

वस्तुत: हिन्दुस्तान ही एक मात्र ऐसा देश था जहां पर व्यापार सोने-चांदी के बदले किया जाता था। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इस लाभांश को उद्योगों में नहीं लगाया जाता था, बल्कि यह गहनों यानि आभूषण की शक्ल में रहता था या फिर इसे गाड़ दिया जाता था। एडवर्ड टैरी आगे लिखता है कि जो भी सोना-चांदी बाहर से आता था, उसे गलाकर और साफ करके उस पर शाही मोहर लगा दी जाती थी। इसीलिए यहां के सिक्के दुनिया के किसी भी देश के सिक्कों से अधिक शुद्ध होते थे।इतिहासकार इरफान हबीब के अनुसार,  “मुगल टकसालों में कोई भी व्यक्ति चांदी ले जाकर सिक्के ढलवा सकता था। सिक्के ढलवाने का शुल्क ढाले हुए सिक्कों का लगभग 5 से 6 फीसदी था।

पादशाह जहांगीर के शासनकाल में एक अन्य ब्रिटिश व्यापारी विलियम हाकिन्स भी भारत आया था जो ईस्ट इंडिया कम्पनी का कर्मचारी था। वह भारत में 1608 से 1613 ई. तक ठहरा। वह फारसी भाषा का जानकार था। जहांगीर उससे इतना प्रभावित था कि वह पादशाह की शराब पार्टियों में आमंत्रित किया जाता था। विलियम हाकिन्स ने जहांगीर के ​व्यक्तित्व तथा दिनचर्या के बारे में अनेक चौंकाने वाली बातों का खुलासा किया है। विलियम हाकिन्स का चांदी से जुड़ा कथन ध्यान देने योग्य है- “भारत चांदी के मामले में बहुत ही समृद्ध है क्योंकि सभी देशों के व्यापारी अपने सिक्कों के बदले में यहां से माल ले जाते हैं। चांदी यहां आती है, यहां से जाती नहीं है।”  यही वजह है कि चांदी का सिक्का मुगल अर्थव्यवस्था का आधार था।

ब्रिटिश यात्री विलियम हाकिन्स के इस कथन से यह साबित होता है कि मुगल भारत में व्यापार और वाणिज्य उन्नत ​स्थिति में था। दुनियाभर के व्यापारी यहां से माल खरीदने खुद ही आते थे, भारतीय व्यापारियों को अपना माल बेचने या उसका प्रचार-प्रसार करने के लिए कहीं भी नहीं जाना पड़ता था। यह सुविधा केवल भारतीय व्यापारियों को ही थी।

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