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Mahabharata war Shri ram descendant who was the commander of the Kauravas

महाभारत युद्ध में कौरवों का सेनापति बना था श्रीराम का यह वंशज

द्वापर युग में महाभारत युद्ध 18 दिनों तक चला था। कुरुक्षेत्र के मैदान में पांडवों और कौरवों के बीच लड़े गए इस महायुद्ध में बृहद पैमाने पर नरसंहार हुआ था। इस महायुद्ध में भारतवर्ष के तकरीबन सभी शक्तिशाली राजाओं ने हिस्सा लिया था।

महाभारत कथा के अनुसार, भगवान श्रीराम के पुत्र कुश के वंशज ने महाभारत युद्ध में कौरवों की तरफ से युद्ध किया था। जी हां, श्रीराम के पुत्र कुश के वंशज का नाम राजा शल्य था, जो मद्र देश के राजा थे। महारथी कर्ण की मृत्यु के पश्चात महाभारत युद्ध के अंतिम दिन मद्र नरेश शल्य कौरव सेना के प्रधान सेनापति बने। 

अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर में श्रीराम के पुत्र कुश के वंशज  मद्र नरेश शल्य ने कौरवों की तरफ से युद्ध क्यों किया था? और फिर मद्र नरेश शल्य का वध युधिष्ठिर के हाथों कैसे हुआ था? इन सभी प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए यह रोचक स्टोरी अवश्य पढ़ें।

श्रीराम पुत्र कुश के वंशज थे राजा शल्य

कोशल नरेश भगवान श्रीराम के पुत्र लव और कुश थे। लव और कुश का वंश ही आगे बढ़ा। ऐसा कहा जाता है कि लव और कुश की 50वीं पीढ़ी में शल्य हुए, जिन्होंने महाभारत में कौरवों की ओर से युद्ध लड़ा। राजा शल्य के बाद बहत्क्षय, ऊरुक्षय, बत्सद्रोह, प्रतिव्योम, दिवाकर... आदि का नाम मिलता है।

मद्र नरेश शल्य की बहन का नाम माद्री था, जो हस्तिनापुर नरेश पांडु की दूसरी पत्नी थीं। रानी माद्री अपने पति पाण्डु के शव के साथ चिता पर जीवित सती हो गई थीं। महाभारत के आदि पर्व के अनुसार, युद्ध कौशल और बुद्धिमत्ता के लिए विख्यात मद्र नरेश शल्य ने द्रौपदी स्वयंवर में हिस्सा लिया था। किन्तु राजा शल्य धनुष पर प्रत्यंचा न चढ़ा पाने के कारण प्रतियोगिता से बाहर हो गए थे।  

महाकाव्य महाभारत के सभापर्व के अनुसार, नकुल की पश्चिमी विजयों के दौरान शल्य ने अपने भांजे का स्वागत किया था। सभा पर्व में यह भी उल्लेख मिलता है कि मद्र नरेश शल्य ने युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में भी भाग लिया था और युधिष्ठिर के राज्याभिषेक पर तलवार और स्वर्ण कलश भेंट किया था।

कुशल योद्धा थे राजा शल्य

नकुल और सहदेव के मामा शल्य महाभारत युद्ध के दौरान पांडवों की तरफ से लड़ने आए थे किन्तु दुर्योधन ने शराब पीलाकर उनका आतिथ्य-स्वागत किया और छलपूर्वक उन्हें अपने पक्ष में कर लिया था। य​द्यपि मद्र नरेश शल्य ने कौरवों के प्रति निष्ठा रखने के बावजूद सदैव पांडवों का समर्थन किया और उनकी जीत की कामना की।

बुद्धिमत्ता के लिए विख्यात मद्र नरेश शल्य भाला और गदा युद्ध में प्रवीण थे। 18 दिनों तक चले महाभारत युद्ध के दौरान राजा शल्य ने विराट राजकुमार उत्तर का वध किया था तथा विराट के एक अन्य राजकुमार शंख को पराजित किया था।

इसके अतिरिक्त राजा शल्य ने धृष्टद्युम्न, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, शिखंडी और अर्जुन जैसे योद्धाओं से युद्ध किया था। राजा शल्य अपने भांजे विकोदर भीम द्वारा पराजित हुए थे तथा धर्मराज युधिष्ठिर के हाथों मारे गए थे।

महारथी कर्ण के सारथी बने थे राजा शल्य

महारथी कर्ण ने अपने मित्र दुर्योधन से यह कहा कि अर्जुन के सारथी श्रीकृष्ण हैं, किन्तु उसके पास कोई योग्य सारथी नहीं है, ऐसे में वह स्वयं को अधूरा महसूस करता है। चूंकि मद्र नरेश शल्य एक कुशल योद्धा के अतिरिक्त रथ चलाने की कला में निपुण थे, ऐसे में दुर्योधन ने उनसे कर्ण का सारथी बनने के लिए अनुनय-विनय किया।

हांलाकि कर्ण का सारथी बनने के प्रस्ताव से शल्य स्वयं को अपमानित महसूस कर रहे थे, बावजूद उन्होंने कर्ण का सारथी बनना स्वीकार कर लिया। किन्तु इस शर्त के साथ कि उन्हें कर्ण को कुछ भी बोलने की छूट होगी। ऐसा कहते हैं कि युधिष्ठिर ने अपने मामा शल्य से कर्ण को हतोत्साहित करने के लिए कहा था, ताकि उसे युद्ध में कमजोर किया जा सके। अत: दम्भी कर्ण जब भी आत्मप्रशंसा शुरू करता था तब मद्र नरेश शल्य उसका उपहास कर उसे हतोत्साहित करने का प्रयास करते थे।

कौरव सेना के प्रधान सेनापति राजा शल्य

महाभारत युद्ध 18 दिनों तक चला था। महारथी कर्ण की मृत्यु के पश्चात युद्ध के अंतिम दिन दुर्योधन ने मद्र नरेश शल्य को कौरव सेना का प्रधान सेनापति नियुक्त किया। युद्ध के अंतिम दिन कौरव सेनापति शल्य ने प्रचंड वेग से आक्रमण किया, जिससे पांडवों की सेना में भगदड़ मच गई। तत्पश्चात पांडव सेनापति युधिष्ठिर ने शल्य को पराजित करने की प्रतिज्ञा ली।

शल्य और युधिष्ठिर के बीच भीषण युद्ध हुआ, जिसमें दोनों ने अद्भुत कौशल और पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए एक-दूसरे पर बाणों की वर्षा की। देखते ही देखते युधिष्ठिर ने शल्य का धनुष काट डाला, उसके घोड़ों को मार डाला और उसके सारथी को घायल कर दिया।

इसके बाद शल्य और युधिष्ठिर के मध्य भाला युद्ध हुआ। फिर क्या था, भाला युद्ध में महाप्रवीण धर्मराज युधिष्ठिर ने शल्य की छाती में भाला घुसेड़कर उसकी हत्या कर दी। शल्य के मरते ही कौरवा सेना का मनोबल टूट गया और पांडव सेना की विजय हुई।

पांडु पुत्रों नकुल और सहदेव के मामा शल्य को कौरवों की तरफ से युद्ध करने के बावजूद उन्हें एक वीर योद्धा के रूप में याद किया जाता है, जिसने धृतराष्ट्र पुत्र दुर्योधन को दिए अपने वचनों का दृढ़तापूर्वक पालन किया।

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