
उत्पलवंश की रानी दिद्दा ने कश्मीर पर 980 ई. से 1003 ई. तक शासन किया। जन्म से ही विकलांग रानी दिद्दा एक अत्यन्त महत्वाकांक्षी शासिका थी जिसने तकरीबन 23 वर्षों तक कश्मीर पर राज किया। रानी दिद्दा को भारतीय इतिहासकारों ने ‘लंगड़ी रानी’ ‘कश्मीर की चुड़ैल’ और ‘कैथरीन ऑफ कश्मीर’ आदि कई नामों से सम्बोधित किया है। दरअसल इन नामों के पीछे भी महारानी दिद्दा के व्यक्तित्व के कई पहलू छुपे हुए हैं, जिसका खुलासा हम इस स्टोरी में करने का प्रयत्न करेंगे।-
परन्तु इन सबसे इतर महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि विभिन्न डिजिटल वेबसाइटों अथवा सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर कई लेखकों ने आशीष कौल की किताब ‘दिद्दाः द वारियर क्वीन ऑफ कश्मीर’ को आधार बनाकर यह बताने का प्रयास किया है कि कश्मीर की रानी दिद्दा ने अफगान आक्रमणकारी महमूद गजनवी को युद्ध में एक बार नहीं अपितु दो बार शिकस्त दी थी। ऐसे में इस स्टोरी में हम इस तथ्य पर रोशनी डालने का प्रयास करेंगे कि क्या सच में रानी दिद्दा ने आक्रमणकारी महमूद गजनवी को युद्ध में पराजित किया था?
कल्हण कृत 'राजतरंगिणी' है रानी दिद्दा के इतिहास का प्रमुख स्रोत
कश्मीर के हिन्दू राज्य का सम्पूर्ण इतिहास हमें कल्हण की ऐतिहासिक कृति ‘राजतरंगिणी’ से ज्ञात होता है। कल्हण की इस कृति में हमें निष्पक्षता देखने को मिलती है क्योंकि उसने शासकों के गुणों के साथ-साथ अवगुणों का भी स्पष्ट उल्लेख किया है।
कश्मीर की रानी दिद्दा के व्यक्तित्व का निचोड़ कल्हण कुछ इस तरह लिखता है- “वो लंगड़ी रानी जिससे किसी को एक कदम पार करने की उम्मीद नहीं थी, उसने तमाम विरोधों को ऐसे लांघ डाला जैसे कभी हनुमान ने समुद्र लांघा था।” कल्हण कृत राजतरंगिणी के मुताबिक, रानी दिद्दा का जन्म 924 ई. के आस-पास हुआ था। दिद्दा के पिता का नाम सिंहराज था जो लोहार वंश के थे। दिद्दा के नाना भीमदेव काबुल में हिन्दू शाही कबीले के शासक थे।
प्रख्यात इतिहासकार डॉ.कृष्ण चन्द्र श्रीवास्तव लिखते हैं कि “980 ई. में रानी दिद्दा कश्मीर की एक महत्वाकांक्षी शासिका हुई। उसने राज्य में शांति-व्यवस्था स्थापित की तथा विद्रोहियों का दमन किया। किन्तु वह एक दुराचारिणी महिला थी जिसके जीवन का नैतिक स्तर अत्यन्त गिरा हुआ था।”
रानी दिद्दा के समय में निरन्तर विद्रोह होते रहे। साल 1003 में रानी दिद्दा की मृत्यु के बाद उसका भतीजा संग्रामराज शासक बना। संग्रामराज ने कश्मीर में लोहारवंश की स्थापना की।
कश्मीर के शासक क्षेमेन्द्रगुप्त से रानी दिद्दा का विवाह
पर्वगुप्त का पुत्र क्षेमेन्द्रगुप्त 950 ई. में कश्मीर की गद्दी पर बैठा। कल्हण कृत राजतंरगिणी के अनुसार, क्षेमेन्द्रगुप्त एक ऐसा राजा था जो केवल खूबसूरत स्त्रियों में दिलचस्पी रखता था। इसके अलावा जुआ और शिकार में उसका मन ज्यादा लगता था। इतिहासकार डॉ. दानपाल लिखते हैं कि क्षेमेन्द्रगुप्त ज्यादातर सियार का शिकार करता था।
वह आगे लिखते हैं कि “क्षेमेन्द्रगुप्त चाहता था कि वह एक ऐसी महिला से शादी करे जो बुद्धि-कौशल में प्रवीण हो। अत: जब उसने दिद्दा के बारे में सुना तो यह जानने के बाद भी कि वह विकलांग हैं, क्षेमेन्द्रगुप्त ने दिद्दा के समक्ष शादी का प्रस्ताव रखा। इस प्रकार 26 वर्षीय दिद्दा की शादी क्षेमेन्द्रगुप्त से सम्पन्न हुई।
कश्मीर की ‘लंगड़ी’ रानी
विवाह के पश्चात खूबसूरत औरतों, जुएं तथा शिकार के शौकीन क्षेमेन्द्रगुप्त का राजकाज अब रानी दिद्दा सम्भालने लगी थी। रानी दिद्दा ने राज्य के भ्रष्ट मंत्रियों तथा सरदारों को बर्खास्त कर सत्ता का उपभोग करना शुरू किया। धीरे-धीरे वह इतना ताकतवर हो गई कि उसने अपने नाम से शाही सिक्के ढलवाने शुरू किए। अब कश्मीर के शाही सिक्कों पर ‘दिद्दा क्षेम’ नाम उत्कीर्ण किए जाने लगे। हांलाकि कश्मीर की ताकतवर महारानी दिद्दा की इस कार्रवाई ने अन्य सरदारों को उसका दुश्मन बना दिया।
कल्हण लिखता है कि “सिंहराज की खूबसूरत पुत्री दिद्दा जन्म से ही विकलांग थी। उसका एक पैर खराब था जिससे वह लंगड़ाकर चलती थी।” कल्हण के अनुसार, रानी दिद्दा अपने साथ वाल्गा नाम की एक लड़की रखती थी जो उसे चलने-फिरने में मदद करती थी। बाद में रानी दिद्दा ने उसी लड़की के नाम पर वाल्गा मठ का निर्माण करवाया। रानी दिद्दा के लंगड़ाकर चलने के कारण कल्हण ने उसे ‘लंगड़ी रानी’ नाम से सम्बोधित किया है।
कश्मीर की ‘चुड़ैल’ रानी
भयंकर बुखार से ग्रसित होने के कारण कश्मीर के राजा क्षेमेन्द्रगुप्त की 958 ई. में मौत हो गई। रानी दिद्दा पर सती होने के लिए दबाव डाला गया लेकिन उसने ऐसा करने से इनकार कर दिया। तत्पश्चात रानी दिद्दा ने अपने पुत्र अभिमन्यु को कश्मीर का शासक घोषित कर, बतौर संरक्षिका राजकाज चलाना शुरू किया। संयोगवश 972 ई. में अभिमन्यु की भी मृत्यु हो गई, इसके बाद उसने अपने पोते भीमगुप्त को गद्दी पर बैठाकर शासनकार्य जारी रखा।
रानी दिद्दा का कश्मीर पर शासन करना स्थानीय सरदारों को कत्तई पसन्द नहीं था। ऐसे में कश्मीर के ताकतवर जमींदारों ने विद्रोह करने की कोशिश की जिन्हें रानी दिद्दा ने क्रूरतापूर्वक दबा दिया। इतना ही नहीं, रानी दिद्दा ने ताकतवर मंत्री नंदिगुप्त को भी नहीं बख्शा और उसकी हत्या करवा दी। जब उसके तीन अन्य पोतों ने रानी दिद्दा को राजगद्दी से पदच्युत कर खुद शासन करना चाहा तो उनकी भी हत्या करवा दी। इस प्रकार कश्मीर के इतिहास में रानी दिद्दा को ‘चुड़ैल’ रानी कहा गया।
‘कैथरीन’ ऑफ कश्मीर
बेटे और पति की याद में 64 मंदिरों का निर्माण कराने वाली तथा राज्य की जनता को सुख-समृद्धि प्रदान करने वाली रानी दिद्दा पर वासना की भूखी होने के भी आरोप लगे। जिस प्रकार से रूस की महान रानी कैथरीन ने आजीवन अविवाहित रहते हुए तमाम प्रेमी बनाए, इसलिए उसे बदचलन आदि न जाने क्या-क्या कहा गया, ठीक उसी प्रकार से प्रेम सम्बन्ध के आरोप के चलते रानी दिद्दा को ‘कैथरीन’ ऑफ कश्मीर कहा गया।
दरअसल साल 975 में रानी दिद्दा ने जब अपने तीसरे पोते भीमगुप्त को कश्मीर के राजसिंहासन पर बैठाया तभी पुंछ का एक ग्वाला जिसका नाम तुंगा था, रानी दिद्दा की जिन्दगी में दाखिल हुआ। कल्हण लिखता है कि “रानी दिद्दा ने जवान तुंगा के साथ सम्बन्ध बनाए तथा उसे न केवल राज्य का प्रधानमंत्री बनाया बल्कि सेना का कमाण्डर भी नियुक्त कर दिया।”
तुंगा की नियुक्ति से स्थानीय सरदार और राज्य के अन्य पदाधिकारी बेहद नाराज हुए लेकिन रानी दिद्दा ने किसी की नहीं सुनी। ऐसा कहा जाने लगा कि ग्वाले तुंगा से सम्बन्ध के चलते ही रानी दिद्दा ने उसे सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाया, इस प्रकार रानी दिद्दा को बदचलनी के इल्जाम झेलने पड़े।
महमूद गजनवी के साथ युद्ध का सच
दिद्दा एक योद्धा रानी थी, इसमें कोई दो राय नहीं है। बतौर उदाहरण- रानी दिद्दा ने राज्य के विद्रोही सरदारों तथा सामंतों का न केवल क्रूरतापूर्वक दमन किया बल्कि अफगानिस्तान के राजा वुशमेगीर के 38000 सैनिकों को रानी दिद्दा ने महज 45 मिनट में ही शिकस्त दे दी थी। इतना ही नहीं, रानी दिद्दा ने राजा वुशमेगीर के सेनापति को हाथी के पैरों तले कुचलवा दिया था।
जहां तक अफगान आक्रमणकारी महमूद गजनवी की बात है, नि:सन्देह उसने हिन्दुस्तान पर 17 बार आक्रमण किए, इन आक्रमणों में कश्मीर भी शामिल है। परन्तु कल्हण ने अपनी कृति राजतरंगिणी में इस बात का कहीं भी उल्लेख नहीं किया है कि रानी दिद्दा ने महमूद गजनवी के आक्रमण को विफल कर दिया था।
हांलाकि आशीष कौल की किताब ‘दिद्दाः द वारियर क्वीन ऑफ कश्मीर’ में इस बात का दावा किया गया है कि रानी दिद्दा ने महमूद गजनवी को एक बार नहीं बल्कि दो बार युद्ध में पराजित किया था। ध्यान देने योग्य बात यह है कि ‘दिद्दाः द वारियर क्वीन ऑफ कश्मीर’ एकमात्र ऐसी पुस्तक है, जिसमें इस तरह का दावा किया गया है।
हैरानी की बात तो यह है कि कुछ एक लेखकों ने यह भी लिखा है कि 1025 ई. में सोमनाथ मंदिर को लूटने के पश्चात महमूद गजनवी ने कश्मीर पर आक्रमण किया था तब रानी दिद्दा ने उसे करारी शिकस्त दी।
यदि ऐतिहासिक साक्ष्यों पर ध्यान दिया जाए तो रानी दिद्दा की मृत्यु 1003 ई.में ही हो गई थी। हकीकत यह है कि महमूद गजनवी ने रानी दिद्दा की मौत के 12 साल बाद यानि 1015 ई. में कश्मीर पर आक्रमण किया था। उन दिनों कश्मीर के राजसिंहासन पर रानी दिद्दा का भतीजा संग्रामराज शासन कर रहा था।
ऐसा उल्लेख मिलता है कि रानी दिद्दा के भतीजे राजा संग्रामराज ने अपने मंत्री एवं सेनापति तुंगा को भटिण्डा के शाही शासक त्रिलोचनपाल की ओर से महमूद गजनवी से लड़ने के लिए भेजा परन्तु उसे सफलता नहीं मिली। कश्मीर वापस आने पर तुंगा की हत्या कर दी गई।
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