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Guru Ravidas Jayanti 2024: How did Sant Ravidas reached Mirabai's wedding?

Guru Ravidas Jayanti 2024 : मीराबाई की शादी में आखिर कैसे पहुंचे थे संत रविदास?

मध्यकालीन भारत के समाज में दलितों की स्थिति वैश्यों तथा शूद्रों से भी निम्न थी। जातिप्रथा के कारण भारत का समाज ऊँच-नीच की भावनाओं से विषाक्त हो चुका था। जातिगत बन्धन इतना कठोर था कि जाति परिवर्तन और अन्तर्जातीय खानपान तथा वैवाहिक सम्बन्ध सम्भव नहीं थे। धर्म की मूल भावना समाप्त हो चुकी थी, उसका स्थान कर्मकाण्ड और बाह्यडम्बर ने ले लिया था। इन परिस्थितियों में दलितों का मंदिरों में प्रवेश तथा पूजा-पाठ करना निषेध था। अतः समाज में व्याप्त जातिगत और धार्मिक विषमता से व्यथित होकर दलित जाति से ही कुछ ऐसे संतों का जन्म हुआ जिन्होंने अपने विचारों और सुकर्मों से भारतीय समाज की तस्वीर बदल दी। इस स्टोरी में हम आपको एक ऐसे ही दलित संत रविदास (रैदास) के बारे में बताने जा रहे हैं जो आज की तारीख में केवल दलित समाज ही नहीं बल्कि हर वर्ग में पूजनीय माने जाते हैं।

संत रविदास (रैदास)

एक महान दलित संत जिसकी जयंती प्रत्येक वर्ष माघी पूर्णिमा के दिन पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है। ऐसा कहा जाता है कि संत रविदास का जन्म रविवार के दिन (संवत 1433) हुआ था इसलिए उनका नाम रविदास रखा गया। संत रविदास को कबीर का समकालीन माना जाता है। स्वयं कबीरदास ने ‘संतन में रविदास’ कहकर इन्हें विभूषित किया है। संत रविदास की दैवीय शक्तियों से प्रभावित होकर सुल्तान सिकन्दर लोदी ने उन्हें दिल्ली आने का न्यौता भेजा था, जिसे उन्होंने बड़ी विनम्रता से ठुकरा दिया।

संत रविदास की रचनाओं में खड़ी बोली, अवधी, राजस्थानी, उर्दू-फारसी आदि भाषाओें का सम्मिश्रण देखने को मिलता है। संत रविदास और गुरु नानक देव जी के बीच सत्संग के अनेक विवरण पाए जाते हैं। ऐसे में अनेक विद्वानों का मानना है कि सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक की मुलाकात संत रविदास से काशी में हुई थी, उस वक्त संत रविदास 102 वर्ष के हो चुके थे। मुलाकात के दौरान गुरु नानक ने संत रविदास से कहा था कि “आपका नाम संसार में अमर रहेगा और मेरी वाणी के साथ आपकी वाणी भी शोभा प्राप्त करेगी।” संत रविदास की रचनाओं से तकरीबन 40 पद सिख धर्मग्रन्थ ‘गुरूग्रन्थ साहिब’ में भी सम्मिलित किए गए हैं। ‘गुरूग्रन्थ साहिब’ में संत रविदास के 40 पदों का सम्पादन 16वीं सदी में गुरु अर्जुन साहिब द्वारा किया गया था। संत रविदास की काव्य रचनाएं ‘रैदासी’ के नाम से जानी जाती हैं।

उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी बनारस के सीर गोवर्धन में जन्मे संत रविदास के पिता का नाम रग्घु और माता का नाम कलसा था। संत रविदास के पत्नी का नाम लोनाजी और बेटे का नाम श्रीविजयदासजी है। चर्मकार (चमार) जाति में जन्म लेने के कारण संत रविदास जूते (स्थानीय भाषा में ‘पनही’ जो चमड़े से तैयार की जाती थी) बनाने का काम करते थे। संत रविदास के इस दोहे से उनकी जाति की पुष्टि होती है-

जाति भी ओछि, करम भी ओछा, ओछा कसब हमारा। नीचे से प्रभु ऊँच कियो है, कह रविदास चमारा।।

संत रविदास के कुछ अमृत तुल्य दोहे-

जनम जात मत पूछिए, का जात अरू पात। रैदास पूत सब प्रभु के, कोए नहीं जात कुजात ।।

अर्थ- संत रविदास कहते हैं किसी की जात नहीं पूछनी चाहिए क्योंकि संसार में कोई जाति-पांति नहीं है, सभी मनुष्य एक ही ईश्वर की संतान है। यहां कोई जाति बुरी जाति नहीं है।

एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय। रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय।।

अर्थ- संत रविदास जी कहते हैं कि सभी कामों को यदि हम एक साथ शुरू करते हैं तो हमें कभी सफलता नहीं मिलती है और एक लक्ष्य साधने पर सफलता स्वतः प्राप्त हो जाती है। ठीक उसी प्रकार यदि किसी पेड़ के जड़ को सींचने पर फूल-फल स्वतः ही प्राप्त हो जाते हैं।

रैदास प्रेम नहिं छिप सकई, लाख छिपाए कोय। प्रेम न मुख खोलै कभऊँ, नैन देत हैं रोय॥

अर्थ- रैदास कहते हैं कि प्रेम कोशिश करने पर भी छिप नहीं पाता, वह प्रकट हो ही जाता है। प्रेम का बखान वाणी द्वारा नहीं हो सकता। प्रेम को तो आँखों से निकले हुए आँसू ही व्यक्त करते हैं।

ब्राह्मण मत पूजिए जो होवे गुणहीन। पूजिए चरण चंडाल के जो होवे गुण प्रवीन।।

अर्थ- इस दोहे के जरिए संत रविदास जी का कहना है कि किसी भी व्यक्ति की पूजा उसकी जाति, पद और धन देखकर नहीं करनी चाहिए बल्कि गुणवान व्यक्ति की पूजा करनी चाहिए चाहे वह किसी भी जाति अथवा धर्म से क्यों न हो।

पराधीनता पाप है, जान लेहु रे मीत। रैदास दास पराधीन सौं, कौन करैहैं प्रीत।।

अर्थ- हे! मित्र जान लो कि पराधीनता एक बड़ा पाप है। रैदास कहते हैं कि पराधीन व्यक्ति से कोई भी प्रेम नहीं करता है, उससे सभी घृणा करते हैं।

हरि सा हीरा छांड़ कै, करै आन की आस । ते नर जमपुर जाहिंगे, सत भाखै रविदास।।

अर्थ- संत रविदास जी कहते हैं कि जो लोग हीरे जैसे बहुमूल्य हरि (ईश्वर) को छोड़कर दूसरी चीज़ों की आशा रखते हैं, ऐसे लोगों को अवश्य ही नर्क में जाना पड़ता है। अर्थात् ईश्वर भक्ति छोड़कर इधर-उधर भटकना बिल्कुल व्यर्थ है।

संत रविदास की एक कहावत आमजन में आज भी बेहद प्रचलित है- मन चंगा तो कठौती में गंगा’। इसका तात्पर्य है कि मन जो काम करने के लिए अन्तकरण से तैयार हो वही काम करना उचित है। यदि मन सही है तो इसे कठौते के जल में ही गंगास्नान का पुण्य प्राप्त हो सकता है। संत रैदास ने अपनी आध्यात्मिक उपलब्धियों से यह साबित कर दिया कि कोई भी मनुष्य अपने जन्म तथा व्यवसाय के आधार पर महान नहीं होता है बल्कि उसके विचार, व्यवहार और कर्म उसको महान बनाते हैं।

संत रविदास से मीराबाई की पहली मुलाकात

कहानी की शुरूआत होती है मेवाड़ की झाली रानी से जिन्होंने संवत 1567-68 में स्वयं काशी जाकर संत रविदास को अपना गुरू स्वीकार किया था। इतना ही नहीं, मेवाड़ की झाली रानी के विनम्र निवेदन करने पर संत रविदास मेवाड़ आए थे। इसके बाद संत रैदास की उपस्थिति में ही मेवाड़ के शक्तिशाली शासक महाराणा सांगा और रानी झाली के पुत्र भोजराज का विवाह चित्तौड़गढ़ के किले में सम्पन्न हुआ था।

मीराबाई और भोजराज के विवाह के दौरान चित्तौड़ के किले में एक अजीबोगरीब घटना देखने को मिली अर्थात् संत रविदास ने जैसे ही चित्तौड़ के किले में प्रवेश किया, निमंत्रण पर आए समस्त ब्राह्मणों ने इनका विरोध किया। वहीं रानी झाली ने संत रविदास का स्वागत पालकी पर किया।

संत रविदास ने बतौर अतिथि जैसे ही चित्तौड़ के महल में प्रवेश किया तब वहां मौजूद ब्राह्मणों ने रानी झाली से कहा कि यदि तुम्हारे गुरु में शक्ति है तो वह अपनी शक्ति का प्रमाण दें। इसके बाद दरबार में भोजन ग्रहण करने बैठे प्रत्येक ब्राह्मण को अपने बगल में संत रविदास ही दिखने लगे। ब्राह्मण यह दृश्य देखकर आश्चर्यचकित थे और सभी ने एक मत से  स्वीकार किया कि संत रविदास कोई मामूली संत नहीं हैं।

ब्राह्मणों को संत रविदास के साथ किए गए दुर्व्यवहार को लेकर पश्चाताप हुआ और उन सभी ने संत रविदास से क्षमा प्रार्थना की। कहते हैं कि संत रविदास ने उन ब्राह्मणों को माफ कर दिया और वे सभी उनके शिष्य बन गए। कहा जाता है कि इस घटना की साक्षी मीराबाई ने मन ही मन संत रविदास को अपना गुरू स्वीकार कर लिया जिसका उल्लेख मीराबाई के एक पद में मिलता है- ‘गुरु मिलिआ संत गुरु रविदास जी, दीन्ही ज्ञान की गुटकी।’

इसमें कोई दो राय नहीं है कि चित्तौड़ के किले में कुम्भ श्याम के नजदीक मीरा मंदिर के ठीक बगल में संत रविदास की छतरी का निर्माण रानी झाली और मीराबाई के द्वारा ही सम्भव हुआ होगा। इस छतरी के नीचे संत रविदास की चरण पादुका बनी हुई है तथा छत के निचले भाग में संत रविदास द्वारा बताए गए पंच विकारों की प्रतिमा एक प्रस्तर शिला पर उत्कीर्ण है। जहां प्रत्येक वर्ष संत रविदास के भक्त श्रद्धापूर्वक उनकी पूजा करने एकत्र होते हैं।

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