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Do you know anything about the mysterious Graves outside ‘Bibi ka Maqbara’?

‘बीबी के मकबरे’ के बाहर बनी रहस्यमयी कब्रों के बारे में जानकर दंग रह जाएंगे आप

पश्चिमी राज्य महाराष्ट्र का एक ऐतिहासिक महानगर औरंगाबाद (वर्तमान में संभाजीनगर) मध्यकाल में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता था। मुगल बादशाह औरंगजेब के आखिरी दिन इसी महानगर में बीते थे और यहीं उसकी मौत भी हुई थी। औरंगजेब की मुख्य बीबी रबिया दुर्रानी (दिलरस बानो बेगम) का मकबरा भी औरंगाबाद में ही मौजूद है। रबिया दुर्रानी (रबिया-उल-दौरानी) का यह मकबरा पूरे भारत में बीबी का मकबरा/पश्चिम का ताजमहल/ गरीबों का ताजमहल/दक्कन का ताजमहल आदि कई नामों से विख्यात है। इस स्टोरी में हम आपको ‘बीबी के मकबरे’ से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों के अतिरिक्त उन रहस्यमयी कब्रों के बारे में भी बताने की कोशिश करेंगे जो मकबरे की बाहर स्थित हैं।

दिलरस बानो बेगम की मृत्यु

ईरान के सफवी राजवंश में जन्मी दिलरस बानो बेगम की शादी 8 मई, 1637 को शहजादा मुहिउद्दीन (बादशाह बनने के बाद औरंगजेब) से हुई थी। इन दोनों का निकाह आगरा में बड़ी धूमधाम से हुआ था, मेहर की रकम 4 लाख रुपए तय थी। दिलरस बानो बेगम के पिता का नाम मिर्ज़ा बदीउद्दीन ज़मान सफ़वी (शाहनवाज खान के नाम से मशहूर जो गुजरात का वायसराय था) और मां का नाम नौरस बानो बेगम था। औरंगजेब की पहली पत्नी दिलरस बानो बेगम की पांच संतानें हुई- मुहम्मद आज़म शाह, ज़ेबुन्निसा, शहज़ादी ज़ीनतुन्निसा और मुहम्मद अकबर। मुहम्मद अकबर के जन्म एक महीने बाद जच्चा संक्रमण से ग्रसित होने के कारण 8 अक्टूबर 1657 को दिलरास बानो बेगम की मौत हो गई।

मुगल शासन की ताकतवर और एक धर्मनिष्ठ शिया महिला दिलरस बानो बेगम को ‘राबिया’ भी कहा जाता था। इसीलिए दिलरस बानो बेगम को ‘राबिया दुर्रानी’ की उपाधि से नवाजा गया था। औरंगजेब की मुख्य पत्नी राबिया दुर्रानी को जहां दफनाया गया था वह स्थल ;बीबी का मकबरा’ नाम से विख्यात है। बीबी के मकबरे में मौजूद दिलरस बानो बेग़म की कब्र को आगरा के ताजमहल में स्थित मुमताज़ महल की कब्र की तरह ही बनाया गया है। 

‘बीबी के मकबरे’ से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें

- मुगल बादशाह औरंगजेब की पत्नी दिलरास बानो बेगम (रबिया दुर्रानी) के मकबरे का निर्माण 1651 से 1661 के बीच करवाया गया था।

- औरंगजेब के बेटे आजम शाह ने अपनी मां दिलरास बानो बेगम की स्मृति में इस मकबरे का निर्माण करवाया था जो ‘बीबी का मकबरा’ नाम से विख्यात है।

. -आगरा के ताजमहल से प्रेरित होकर ‘बीबी के मकबरे’ का निर्माण करवाया गया था। इसीलिए बीबी का मकबरा ‘दक्कन के ताज’ के नाम से जाना जाता है।

- बीबी का मकबरा बनाने वाले वास्तुकारों का नाम हंसपत राय और अतउल्लाह रशीदी था। अतउल्लाह ताजमहल के वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी का बेटा था।

- गुलाम मुस्तफा के ‘तवारीखनामा’ के मुताबिक, बीबी का मकबरा बनाने में छह लाख अड़सठ हजार दो सौ तीन रुपए और सात आने की लागत आई थी।

- जबकि आगरा के ताज महल को बनवाने में तकरीबन 3.20 करोड़ रुपए खर्च हुए थे, इसीलिए ताजमहल के मुकाबले हुए खर्चे को देखकर लोग इसे ‘गरीबों का ताजमहल’ भी कहते हैं।

- बाबी का मकबरा बनवाने के लिए जयपुर से संगमरमर मंगवाया गया था। संगमरमर को जयपुर से औरंगाबाद तक लाने में 150 से भी ज़्यादा वाहनों को इस्तेमाल में लाया गया था।

‘बीबी के मकबरे’ की डिजाइन

- आर्किटेक्चर अताउल्लाह रसीदी और हंसपत राय ने इस मकबरे को ताजमहल की तरह बनाने की भरपूर कोशिश की है लेकिन आजमशाह को औरंगजेब ने जितनी रकम दी थी उसमें यह सम्भव नहीं था। इसीलिए बीबी के मकबरे को ‘ताजमहल की फूहड़ नकल’ भी कहा जाता है।

- इस मकबरे का सिर्फ गुम्बद ही संगमरमर से बनवाया गया है बाकी हिस्से को प्लास्टर से तैयार किया गया है ताकि यह दिखने में संगमरमर जैसा लगे।

-यह मकबरा एक विशाल अहाते के केंद्र में स्थित है जो उत्तर-दक्षिण में 458 मीटर और पूर्व-पश्चिम में 275 मीटर है।

- आगरा के ताजमहल की तरह बीबी के मकबरे की चारों कोनों पर चार मीनारें खड़ी हैं, जिनमें प्रत्येक मीनार की ऊंचाई तकरीबन 275 मीटर है।

- विशिष्ट मुगल चारबाग पैटर्न पर आधारित बीबी के मकबरे के चारों तरफ खूबसूरत रास्ते, गार्डन, पॉड्स, फव्वारे और वाटर कैनाल हैं।

- दक्षिण दिशा में स्थित मकबरे का प्रवेश द्वारा लकड़ी से निर्मित है जिस पर बाहर से बेलबूटे से डिजाइन युक्त पीतल की प्लेट लगी है। मकबरे में तीन ओर से सीढ़ियों द्वारा पहुंचा जा सकता है।

‘बीबी के मकबरे’ के बाहर मौजूद हैं रहस्यमयी कब्रें

औरंगाबाद रेलवे स्टेशन से तकरीबन साढ़े पाच किलोमीटर की दूरी पर मौजूद बीबी का मकबरा स्वयं एक इतिहास है लेकिन इस प्रसिद्ध मकबरे के दक्षिणी द्वार से कुछ मीटर की दूरी पर कुछ रहस्यमी कब्रें मौजूद हैं। लोहे के ग्रिल से घिरी हुई ये रहस्यमी कब्रें एक साथ कई सवाल खड़ी करती हैं। 

‘बीबी के मकबरे’ के बाहर कुछ गज की दूरी पर मौजूद पूर्वी दिशा की कब्रें स्पष्टतया मुस्लिम कब्रें हैं जबकि पश्चिमी तरफ ईसाई कब्रें हैं जो कलकत्ता के साउथ पार्क स्ट्रीट कब्रिस्तान की कब्रों से कुछ समानता रखती हैं। अब सवाल यह उठता है कि इन कब्रों में दफनाए गए लोग कौन हैं और इन्हें बीच सड़क पर ही क्यों दफनाया गया है?

हांलाकि सैयद हुसैन और सी. विलमॉट द्वारा लिखित पुस्तक ‘हिस्टोरिकल एंड डिस्क्रिप्टिव स्केच ऑफ हिज हाइनेस द निजाम डोमिनियन्स’ में इन कब्रों का थोड़ा बहुत उल्लेख मिलता है जो इस प्रकार है- ‘मकबरे से थोड़ी दूरी पर एक पुराना यूरोपीय कब्रिस्तान है जो तकरीबन आधी सदी से भी अधिक समय से बंद है और इसके अस्तित्व से बहुत कम लोग परिचित हैं।‘ बता दें कि औरंगाबाद में एक अन्य ईसाई कब्रिस्तान भी है जो छावनी क्षेत्र में स्थित है।

साल 1884 में प्रकाशित पुस्तक ‘हिस्टोरिकल एंड डिस्क्रिप्टिव स्केच ऑफ हिज हाइनेस द निजाम डोमिनियन्स’ में यह लिखा गया है कि बीबी के मकबरे के बाहर मौजूद इन कब्रों में से एक कब्र कैप्टन जॉन साइक्स की है जिनकी मृत्यु 20 अगस्त 1815 को हुई थी। परन्तु मुस्लिम कब्रों के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं मिलती है और फिर ईसाइयों और मुसलमानों को एक ही कब्रिस्तान में दफनाया गया है जो निश्चित रूप से पहली बार देखने को मिल रहा है।

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