
गांव के पोखर-तालाबों में जलकुम्भी के पौधों पर जब बैंगनी रंग के आकर्षक पुष्प खिलते हैं, तो वहां की सुन्दरता देखते ही बनती है। परन्तु यही जलकुम्भी न केवल जलस्थानों को बर्बाद करके रख देती है बल्कि इसके चलते मछलियों आदि का जिन्दा रहना भी मुश्किल हो जाता है। कभी-कभी नदियों अथवा झीलों आदि में जलकुम्भी के कारण परिवहन सेवा भी बाधित होने लगती है।
आपको जानकारी के लिए बता दें कि भारत के अधिकांश जल निकायों में पाई जाने वाली जलकुम्भी स्वदेशी नहीं है बल्कि ब्रिटिश शासन के दौरान इसे दक्षिण अमेरिका के अमेजन घाटी से यहां लाया गया था। जलकुम्भी के भारत पहुंचने की कहानी बड़ी रोचक है, जोकि ब्रिटिश भारत के पहले गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स से जुड़ी है। एक गवर्नर जनरल की लव स्टोरी में जलकुम्भी की एन्ट्री कैसे हुई और यह जलीय पौधा आखिरकार भारत कैसे पहुंचा? यह सब जानने के लिए यह स्टोरी जरूर पढ़ें।
प्रथम गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स
वारेन हेस्टिंग्स का जन्म 6 दिसंबर 1732 को ऑक्सफोर्डशायर के चर्चिल नामक स्थान में हुआ था। गरीब परिवार में पैदा हुआ वारेन हेस्टिंग्स 18 वर्ष की उम्र में ईस्ट इंडिया कम्पनी में बतौर कलर्क भर्ती हुआ और उसकी पहली नियुक्ति कलकत्ता में हुई। कड़ी मेहनत के दम पर उसने जल्दी ही उर्दू और फारसी भी सीख लिया।
इसलिए उसे कासिम बाजार का रेजिडेन्ट बना दिया गया। इसके बाद वह कुछ वर्षों तक कलकत्ता काउंसिल और मद्रास काउंसिल का सदस्य भी रहा। आखिरकार ईस्ट इंडिया कम्पनी ने 1772 ई. में उसे बंगाल का गवर्नर बना दिया। तत्पश्चात 1773 ई. में रेग्युलेटिंग एक्ट के तहत उसे ब्रिटिश भारत का प्रथम गवर्नर जनरल बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
वारेन हेस्टिंग्स को बंगाल में द्वैध शासन की समाप्ति, सरकारी कोष को मुर्शिदाबाद से कलकत्ता स्थानान्तरित करने तथा विशेषरूप से बनारस के राजा चैत सिंह तथा अवध की बेगमों के साथ धन वसूली के दौरान किए गए दुर्व्यवहार के लिए याद किया जाता है।
प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध के दौरान सालबाई की सन्धि, द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध तथा मंगलौर की सन्धि भी वारेन हेस्टिंग्स के शासनकाल में हुई थी। वारेन हेस्टिंग्स के समय ही साल 1784 में पिट्स इंडिया एक्ट पास हुआ। वारेन हेस्टिंग्स को इसलिए भी याद किया जाता है कि क्योंकि उसने सर विलियम जोन्स के साथ मिलकर कलकत्ता में ‘एशियाटिक सोसाइटी आफ बंगाल’ की स्थापना की।
वारेन हेस्टिंग्स और मैरिएन की लव स्टोरी
ब्रिटिश भारत के पहले गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स और मैरिएन इम्हॉफ की लव स्टोरी बहुत ही रोचक है। यह प्रेम कहानी उस दौर की है जब साल 1769 में वारेन हेस्टिंग्स ‘ड्यूक ऑफ ग्राफ्टन’ नामक जहाज से भारत आ रहे थे। 37 वर्षीय वारेन हेस्टिंग्स की पत्नी मैरी कुछ साल पहले इस दुनिया से चल बसी थी। इसलिए जिन्दगी का खालीपन लिए वारेन हेस्टिंग्स समुद्री यात्रा कर रहे थे परन्तु वह उस जहाज पर सवार एक 22 वर्षीय विवाहित महिला पर फिदा हो गए जो बेहद खूबसूरत थी। उस खूबसूरत महिला का नाम था मैरिएन इम्हॉफ।
जहाज पर यात्रा के दौरान 22 वर्षीय मैरिएन इम्हॉफ तीन बच्चों की मां थी। जर्मनी के एक कुलीन परिवार में पैदा होने के बावजूद मैरिएन के पति बैरन इम्हॉफ अमीर नहीं थे। बैरन इम्हॉफ ब्रिटिश सेना में भर्ती होने के लिए मद्रास आ रहे थे। बैरन इम्हॉफ की पत्नी मैरिएन इम्हॉफ केवल रोमांचकारी अनुभवों के लिए उनके साथ भारत आ रही थी।
‘ड्यूक ऑफ ग्राफ्टन’ नामक जहाज पर ही वारेन हेस्टिंग्स और मैरिएन इम्हॉफ एक दूसरे के करीब आने लगे हांलाकि इन दोनों के रिश्ते पर मैरिएन इम्हॉफ के पति बैरन ने कोई आपत्ति नहीं जताई। के.एल.मूरे अपनी किताब ‘बीलव्ड मैरिएन’ में लिखते हैं कि छह महीने की समुद्री यात्रा के बाद जहाज मद्रास पहुंच गया। मद्रास में बैरन दम्पत्ति ने अपना जीवन-यापन शुरू किया लेकिन सालभर के अन्दर ही मैरिएन इम्हॉफ परेशान रहने लगीं।
कहते हैं कि बैरन इम्हॉफ अपने जीवन में कुछ अच्छा नहीं कर पा रहे थे इसलिए बेहतर सम्भावनाओं की तलाश में वे अपनी पत्नी के साथ बंगाल चले आए जिसमें वारेन हेस्टिंग्स ने उनकी काफी मदद की। इसके बाद 1773 ई. में वारेन हेस्टिंग्स को बंगाल का गवर्नर जनरल बनाकर कोलकाता स्थानान्तरित कर दिया गया।
मैरिएन इम्हॉफ़ कोलकाता में पहले से ही थीं, ऐसे में इन दोनों के बीच रोमांस परवान चढ़ा। मैरिएन के पति की मौन सहमति से यह रिश्ता और गहरा होता चला गया। आखिरकार बैरन इम्हॉफ़ अपनी पत्नी मैरिएन को छोड़कर जर्मनी वापस चले गए और तलाक की कार्रवाई शुरू की। आठ साल की लम्बी प्रेम कहानी के बाद 1777 ई. में वारेन हेस्टिंग्स और मैरिएन ने शादी कर ली।
जलकुम्भी की भारत में एन्ट्री
जलकुम्भी के आकर्षक बैंगनी रंग के फूलों को मंजरी कहते हैं। ऐसा कहते हैं कि एक बार मैरिएन को जलकुम्भी का सुन्दर बैंगनी रंग का फूल बहुत पसन्द आया। तब यह खूबसूरत फूल दक्षिण अमेरिका के अमेजन घाटी में एक जलीय पौधे पर खिलता था। साल 1896 में वारेन हेस्टिंग्स अपनी पत्नी मैरिएन को उपहार देने के लिए इस जलीय पौधे को दक्षिण अमेरिका से भारत लेकर आए। उसी पौधे को आज हम सभी जलकुम्भी के नाम से जानते हैं। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि यह जलीय पौधा प्रथम विश्व युद्ध की शुरूआत में जर्मन पनडुब्बियों द्वारा भारत पहुंचा था।
यदि हम मैरिएन की लव स्टोरी पर विश्वास करें तो जलकुम्भी को कोलकाता में एक फूल वाले पौधे के रूप में लाया गया था परन्तु इस जलीय पौधे से होने वाले नुकसानों के बारे में वारेन हेस्टिंग्स को तनिक भी आभास नहीं था। यह जलीय पौधा शुरूआत में बंगाल में इतना फैला कि इसे ‘बंगाल का आतंक’ कहा जाने लगा।
जलकुम्भी जलमार्गों को अवरूद्ध करने के साथ ही अपने आसपास की वनस्पतियों को भी नष्ट करने में सक्षम है। जलकुम्भी के चलते पानी के स्रोतों में आक्सीजन की कमी होने लगती है जिससे मछलियों की वृद्धि रूक जाती है, कभी-कभी मछलियां मरने भी लगती हैं। यहां तक कि अन्य वनस्पतियों और जीवों का भी दम घुटने लगता है।
जलकुम्भी को विश्व के आक्रामक पौधों में से एक माना जाता है। 6-18 दिनों के अन्दर यह दोगुना हो जाती है। जलकुम्भी मुख्यत: बाढ़ के पानी, नदियों तथा नहरों द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पर फैलती है। जलकुम्भी का एक पौधा 5000 बीज उत्पन्न कर सकता है। इसके बीज वर्षों तक पानी के नीचे मिट्टी में पड़े रहते हैं और अनुकूल परिस्थितियों में उग जाते हैं।
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