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Five famous courtesans of Indian history: A journey from dancer to ruler

भारतीय इतिहास की पांच मशहूर तवायफें : नर्तकी से हुकूमत तक का सफर

यह सच है कि भारतीय इतिहास के कई ऐसे राजा हुए जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन सुरा-सुन्दरी में बर्बाद कर दिया, सिर्फ भोग-विलास ही उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा था। किन्तु इस स्टोरी में हम आपको भारतीय इतिहास की उन पांच मशहूर तवायफों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्होंने अपनी खूबसूरती और बेहतरीन नृत्य कला की बदौलत तवायफ की जिन्दगी से उपर उठकर राजशाही ​​शासन में भी अपना प्रभाव स्थापित किया। ऐसे में अब आपका सोचना लाजिमी है कि आखिर में कौन सी वे पांच मशहूर तवायफें थी जिन्होंने राजवंशीय शासन में अपना पूर्ण प्रभाव दिखाया।

1. लाल कुंवर

औरंगजेब का बड़ा बेटा बहादुरशाह 63 वर्ष की उम्र में मुगल तख्त पर आसीन हुआ, जो जनता के बीच शाह--बेखर के नाम से मशहूर था। हांलाकि इतिहासकार विलियम इरविन लिखता है कि साल 1712 में बहादुरशाह जब लाहौर में था, तब स्वास्थ्य बिगड़ने की वजह से 27 फरवरी की रात उसकी मृत्यु हो गई।

इसके बाद मुगल सत्ता की कमान बहादुरशाह के पुत्र जहांदरशाह को मिली। अय्याशी के मामले में जहांदरशाह ने अपने पूर्वजों को भी मात दे दी। अजीबो-गरीब हरकतों की वजह से वह लम्पट मूर्ख बादशाह के नाम से जाना जाता था। दिन-रात शराब और शबाब के नशे में डूबे रहने वाले बादशाह जहांदरशाह ​की जिन्दगी में एक खूबसूरत तवायफ लाल कुंवर ने शिरकत की।

कहते हैं, जहांदरशाह ने जब तवायफ लाल कुंवर को पहली बार गाते हुए सुना तो उसे अपनी गोंद में ​उठा लिया और एक कमरे में ले जाकर बार-बार गाने की फरमाइश की। सच है, मुगल बादशाह जहांदरशाह पर तवायफ लाल कुंवर का जादू चल चुका था। इश्क का यह जादू इस कदर परवान चढ़ा कि जहांदरशाह ने अपनी दोगुनी उम्र की तवायफ लाल कुंवर से निकाह कर लिया और उसे इम्तियाज महल नाम से उपपत्नी का दर्जा दिया। इम्तियाज महल बनने के बाद लाल कुंवर ने भी अपनी रसूख का भरपूर फायदा उठाया।

राजगोपाल सिंह वर्मा अपनी किताब किन्गमेकर में लिखते हैं कि लाल कुंवर को खुश करने के लिए जहांदरशाह उसके भाईयों, करीबियों तथा दूर के रिश्तेदारों तक को सौगातें बांटने लगा। जहांदरशाह ने हाथी-घोड़े, हीरे-जवाहररात तथा जागीरें देने में भी कोताही नहीं की। 

लाल कुंवर के कहने पर जहांदरशाह ने उसके भाई को मुल्तान की जागीर देने में तनिक भी देरी नहीं की। इतना ही नहीं, लाल कुंवर के कहने पर मुगल दरबार से सुयोग्य पदाधिकारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। जहांदरशाह अपनी माशूका लाल कुंवर को 2 करोड़ रुपए गुजारा भत्ता देता था। लाल कुंवर बग्गी पर बैठकर जब कहीं बाहर निकलती थी तो बादशाह की तरह सैनिक उसके पीछे-पीछे नगाड़े बजाते हुए चलते और तकरीबन 500 लोगों का काफिला उसके साथ चलता था।

लाल कुंवर जहांदरशाह के पुत्रों से इस कदर नफरत करती थी कि उन्हें अपने रास्ते से हटाने का निर्णय लिया। इसके लिए लाल कुंवर ने जहांदरशाह से कहा कि वह पहले अपने बेटों को कैद करे ​और फिर उनकी आंखें फोड़ दे, बादशाह ने ठीक वैसा ही किया।

किताब किन्गमेकर के अनुसार, “एक बार लाल कुंवर ने जहांदरशाह से कहा कि उसने कभी नदी में लोगों से भरी नाव डूबते हुए नहीं देखी है। फिर क्या था, लाल कुंवर की फरमाइश पूरी करने के लिए जहांदरशाह ने यमुना नदी में मुसाफिरों से भरी एक नाव डुबवा दी, जिसमें 25 लोगों की मौत हो गई। जैसे- जैसे मुसाफिर यमुना नदी में डूबते जा रहे थे, किले पर बैठी लाल कुंवर तालियां बजा रही थी।

अजीम-उस-शान के पुत्र फर्रूखसियर ने सैयद बन्धुओं की सहायता से 11 फरवरी 1713 ई. को जहांदरशाह को पराजित कर मार डाला। इसके बाद फर्रूखसियर ने लाल कुंवर को काल कोठरी में डाल दिया। दिल्ली के गोल्फ क्लब मैदान स्थित लाल बंगले में दो कब्रें हैं -पहली लाल कुंवर की तथा दूसरी उसकी बेटी बेगम जान की है।

2. रसकपूर

जयपुर राजपरिवार से जुड़े एक विद्वान पं. शिवनारायण मिश्र और तवायफ नूरी बेगम की खूबसूरत बेटी रसकपूर और महाराजा सवाई जगत सिंह द्वितीय के इश्क के चर्चे आज भी जयपुर की गलियों में सुनने को मिल ही जाते हैं। नर्तकी रसकपूर इतनी खूबसूरत थी कि इसे जयपुर का नूरजहां भी कहा जाता है।

इतिहासकार राजेन्द्र सिंह खांगरोत लिखते हैं कि गुणीजन खजाने की नर्तकी पारो बेगम ने रसकपूर को नृत्य-संगीत में पारंगत किया था। सवाई जगत सिंह ने जब पहली बार बेहद खूबसूरत रसकपूर को नृत्यु करते हुए देखा तो उसके रूप-लावण्य पर मोहित हो गए।

सुन्दर तवायफ पारो बेगम अलसुबह सिटी पैलेस के चन्द्रमहल में भैरवी गाकर प्रतिदिन जगत सिंह द्वितीय को नींद से जगाती थी। ऐसे में पारो बेगम ही रसकपूर को अपने साथ सिटी पैलेस के चन्द्रमहल ले गई थी,​ जहां बसन्त पंचमी के दिन रसकपूर और जगत सिंह द्वितीय की मुलाकात हुई।

हुस्न की मलिका रसकपूर की दीवानगी जगत सिंह द्वितीय पर इस कदर हावी हो चुकी थी कि उन्होंने आदेश दिया कि उनकी मुलाकात रसकपूर से आमेर महल में करवाई जाए। फिर क्या था, जगत सिंह द्वितीय रसकपूर का साथ एक पल के लिए छोड़ने को तैयार नहीं थे।

कुछ दिनों बाद जयपुर राजदरबार के प्रधानमंत्री और सलाहकार अपने राजा को शासन की सुध लेने की गुजारिश करने हेतु आमेर महल गए। किन्तु जगत सिंह द्वितीय ने यह कहा कि वह चन्द्रमहल तभी जाएंगे जब रसकपूर भी उनके साथ जाएगी। काफी विरोध के बावजूद राजा के करीबियों की मदद से रसकपूर को चन्द्रमहल ले जाया गया।

जयपुर के प्रशासनिक भवन चन्द्रमहल पहुंचते ही रसकपूर की तूती बोलने लगी। रसकपूर जयपुर के महाराजा जगत सिंह द्वितीय के साथ राजदरबार में बैठने लगी। यहां तक जागीरदारों के प्रशानिक मामलों में हस्तक्षेप करने लगी। अब सामन्तों को भी महाराजा के साथ रसकपूर का भी अभिवादन करना पड़ता था। हांलाकि इस बात का जयपुर के जागीरदारों ने कड़ा विरोध किया।

बावजूद इसके, जगत सिंह द्वितीय अपनी प्रेयसी रसकपूर के प्रति इतना मोहित हो चुके थे, उसे आधा राजपाट दे दिया। यही वजह है कि, जयपुर के इतिहास में रसकपूर को अर्द्धराजेश्वरी कहा जाने लगा।  इतना ही नहीं, रसकपूर के नाम के सिक्के भी ढलवाए गए। पोथीखाना और सूरतखाना उसके नाम कर दिया गया। महाराजा जगत सिंह द्वितीय ने शाही सवारी के समय रसकपूर को हाथी पर बैठाकर रानी के समकक्ष स्थान दिया। रसकपूर के चलते जयपुर का खजाना भी खाली हो गया। इसी वजह से जगत सिंह द्वितीय को जयपुर के बदनाम शासक के रूप में जाना जाता है। 

कहते हैं कि महाराजा जगत सिंह द्वितीय जब गिंगोली युद्ध में चले गए थे, तब उनकी गैर मौजूदगी का लाभ उठाकर पटरानी और अन्य रानियों समेत सामन्तों ने रसकपूर को चरित्रहीन बताकर नाहरगढ़ किले में कैद कर लिया। राजा को जब इस सच्चाई का पता चला तो वह रसकपूर को कैद से मुक्त कराने के लिए गए, किन्तु वह उनके साथ नहीं आई। इसके बाद 21 दिसम्बर 1818 ई. को जगत सिंह द्वितीय की हत्या हो गई। तत्पश्चात गैटोर की छतरी में जब जगत सिंह द्वितीय का अंतिम संस्कार किया जा रहा था, तब रसकपूर ने किसी तरह तरकीब लगाकर खुद को कैद से मुक्त कर लिया और राजा की जलती चिता में कूदकर अपने प्राण दे दिए।

3. नन्ही जान

आधुनिक भारत के इतिहास में जोधपुर के महाराजा जसवन्त सिंह द्वितीय और नन्ही जान नामक वेश्या का प्रेम प्रसंग बहुत ज्यादा चर्चित है। दरअसल जोधपुर के प्रधानमंत्री सर प्रताप सिंह और महाराजा जसवन्त सिंह के आग्रह पर स्वामी दयानन्द सरस्वती मार्च 1883 ई. में जोधपुर पहुंचे थे।

एक दिन स्वामी दयानन्द सरस्वती निश्चित समय पर राजदरबार में पहुंचे, संयोगवश नन्ही जान महाराजा के पास आई हुई थी। उसी समय अपने सम्मुख स्वामी दयानन्द सरस्वती को देखकर महाराजा जसवन्त सिंह एकदम से घबरा गए और उन्होंने नन्ही जान की पालकी को स्वयं ही कन्धा देकर उठवा दिया। स्वामी दयानन्द सरस्वती इस दृश्य को देखकर बहुत दुखी भी हुए और क्रोधित भी।

उस दिन स्वामीजी ने राजदरबार में अपने उपदेश में वेश्यागमन और वेश्याएं रखने की बुराईयों का खुलकर विवेचन किया। इस घटना के बाद महाराजा जसवन्त सिंह कई दिनों तक स्वामी दयानन्द सरस्वती से मिलने नहीं आए। इसके बाद स्वामी दयानन्द सरस्वती ने एक पत्र में महाराजा के अवगुणों का खुलकर वर्णन किया और फिर दूसरे पत्र में लिखा कि एक वेश्या जो नन्ही कहलाती है, उससे प्रेम, उससे अधिक संग तथा पत्नियों ने न्यून प्रेम रखना आप जैसे महाराजा के लिए सर्वथा अशोभनीय है।

जोधपुर के महाराजा जसवन्त सिंह 17 दिन बाद स्वामी दयानन्द सरस्वती से मिलने आए, जिसका कारण अपनी अस्वस्थ्यता बताया। 2 घंटे की गहन वार्ता के बाद महाराजा जसवन्त सिंह ने नन्ही जान से अपने सम्बन्ध तोड़ लिए।  साल 1895 में महाराजा जसवन्त सिंह की मृत्यु के पश्चात नन्ही जान तकरीबन 14 वर्षों तक जीवित रही। हांलाकि खूनी बवासीर होने के कारण 61 वर्ष की उम्र में नन्ही जान की भी मौत हो गई।

एक प्रसंग के अनुसार, नागौर उन दिनों जोधपुर रियासत के अर्न्तगत आता था। ऐसे में नागौर का गोलीगढ़ गांव जो वर्तमान में सोमणा गांव के नाम से जाना जाता है, जोधपुर राजदरबार को सबसे ज्यादा कर देता था। हैरानी की बात है कि खालसा गांव गोलीगढ़ से कर वसूलने का कार्यभार नन्ही जान के अधीन था। ग्रामीणों के अनुसार, गोलीगढ़ के एक किसान गुमानराम चौधरी बराबर कर देते थे, बावजूद इसके नन्ही जान अपनी मनमानी करने लगी। लिहाजा गुमानराम चौधरी को कैद कर लिया गया।

इतना ही नहीं, नन्ही जान और गुमानराम चौधरी के पुत्रों के बीच जंग छिड़ गई। हांलाकि जसवन्त सिंह के प्रभाव से यह संघर्ष समाप्त हो गया किन्तु नन्ही जान के प्रभाव को देखते हुए गुमानराम चौधरी ने अपना गांव छोड़ दिया और नजदीक के एक गांव सोनली में जाकर रहने लगे। हांलाकि जसवन्त सिंह को जब इस बात की जानकारी मिली तो उन्होंने गोलीगढ़ से नन्ही जान के प्रभाव को समाप्त कर दिया और गुमानराम चौधरी को ससम्मान गोलीगढ़ गांव ले आए।

एक अन्य तथ्य के मुताबिक, महाराजा जसवन्त सिंह द्वारा बनवाए गए जिस आवास में नन्ही जान रहती थी, उसके मरने के बाद वहां से छह सौ जोड़ी जड़ाऊं जूतियां, आठ सौ रेशमी घाघरे तथा लाखों रुपए के कीमती सामान मिले जिन्हें शिक्षण संस्थाओं को दान कर दिया गया। आप समझ सकते जोधपुर राजदरबार में नन्ही जान का कितना प्रभाव रहा होगा।

4. मोरन सरकार

शेर--पंजाब महाराजा रणजीत सिंह और उनकी मुस्लिम पत्नी मोरन सरकार की अनूठी प्रेम कहानी बेहद चर्चित है। महाराजा रणजीत सिंह जिस मुस्लिम नर्तकी मोरन सरकार से बेहद प्यार करते थे, उसका नाम मोरन, मोरन सरकार, मोरन माई के नाम से इतिहास के पन्नों में दर्ज है।

अमृतसर स्थित माखन विन्डी के एक मुस्लिम परिवार में जन्मी मोरन बेहद ही खूबसूरत थी और महाराजा रणजीत सिंह की बारादरी में नृत्य किया करती थी। खूबसूरत नर्तकी मोरन की नृत्यकला से प्रभावित रणजीत सिंह को पहली नजर में ही उससे प्यार हो गया। रणजीत सिंह ने उस मुस्लिम युवती का उपनाम मोरन रखा।

आखिरकार महाराजा रणजीत सिंह ने मुस्लिम नर्तकी मोरन से विवाह करने का निर्णय लिया। किन्तु मोरन के पिता ने एक शर्त रख दी कि यदि रणजीत सिंह अपने ससुराल में चूल्हा जलाएंगे तभी उनका विवाह मोरन से हो सकता है। इस शर्त को महाराजा रणजीत सिंह ने पूरा किया, तत्पश्चात मोरन के साथ विवाह सम्पन्न किया। विवाह के पश्चात मोरन महाराजा रणजीत सिंह के साथ लाहौर चली आई। लाहौर स्थित शाह आलमी गेट के अन्दर मोरन सरकार की हवेली थी।

इस घटना से सिख समाज में आक्रोश व्याप्त हो गया। फिर क्या था, अकाली तख्त के जत्थेदार अकाली फूला सिंह ने महाराजा रणजीत सिंह के साथ मोरन के सम्बन्धों को अवैध करार देते हुए रणजीत सिंह को कोड़े मारने की सजा सुनाई। मोरन सरकार के लिए महाराजा रणजीत सिंह ने अकाल तख्त की सजा बड़ी विनम्रता से स्वीकार की।

महाराजा रणजीत सिंह से विवाह के पश्चात मोरन सरकार ने अपनी प्रशासनिक क्षमता साबित की। कला-साहित्य की जानकार मोरन ने अपनी हवेली में दरबार स्थापित किया और लोगों की समस्याओं और शिकायतों का निवारण करने लगी। ऐसे में ही जल्द ही वह आमजन के बीच मोरन सरकार अथवा मोरन माई के नाम विख्यात हो गई।

बतौर उदाहरण- महाराजा रणजीत सिंह ने कभी खुद के नाम के सिक्के नहीं चलवाए किन्तु उन्होंने साल 1802 और साल 1827 के बीच मोरन शाही सिक्के चलवाए। इन सिक्कों पर मोर अंकित था। महाराजा रणजीत सिंह ने विवाह से पूर्व रावी नदी से जुड़ी एक छोटी सी नहर पर मोरन के लिए एक पुल बनवाया था, जो लोगों के बीच पहले पुल कंजरी के नाम से विख्यात था, जिसका नाम बाद में पुल मोरन कर दिया गया। इसके अतिरिक्त महाराजा रणजीत सिंह ने मोरन सरकार के कहने पर लाहौर में एक मस्जिद का निर्माण भी करवाया था जो आज भी मौजूद है, जिसे लोग माई मोरन मस्जिद के नाम से जानते हैं।  

ऐसे में आप स्वत: अन्दाजा लगा सकते हैं कि महाराजा रणजीत सिंह पर मोरन सरकार का कितना अधिक प्रभाव था। इस प्रकार कंजरी और तवायफ आदि कई नामों से पुकारी जाने वाली मोरन को लोग एक दयालु रानी अथवा मोरन सरकार व मोरन माई के रूप में देखने लगे।

5. बेगम हजरत महल

अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह की दूसरी पत्नी बेगम हजरत महल का वास्तविक नाम मुहम्मदी खानुम था। अवध के फैजाबाद में जन्मी मुहम्मदी खानुम पेशे से तवायफ थीं जिन्हें उनके माता-पिता ने बेच दिया था। इसके बाद मुहम्मदी खानुम को अवध के शाही हरम में शामिल कर लिया गया।

शाही हरम में शामिल होने के पश्चात मुहम्मदी खानुम को महक परी के नाम से जाना जाता था। अवध के नवाब वाजिद अली शाह का रखैल बनने के बाद मुहम्मदी खानुम को बेगम के खिताब से नवाजा गया। जबकि बेटे बिरजिस कादिर के जन्म के बाद उन्हें बेगम हजरत महल का खिताब दिया गया।

बेगम हजरत महल को 1857 की महाक्रांति में ब्रिटिश हुकूमत के विरूद्ध सफल नेतृत्व के लिए याद किया जाता है। ब्रिटिश हुकूमत द्वारा अवध के नवाब वाजिद अली शाह को कलकत्ता निर्वासित किए जाने के बाद बेगम हजरत महल ने अपने बेटे बिरजिस कादिर को अवध का वारिस नियुक्त करने की पुरजोर कोशिश की किन्तु कामयाब नहीं हुईं।

नवाब वाजिद अली शाह की अनुपस्थिति में बेगम हजरत महल प्रतिदिन दरबार लगाती थीं, जहां राजनीतिक प्रश्नों पर विचार-विमर्श होता था। 1857 की महाक्रांति के समय बेगम हजरत महल ने विद्रोहियों का नेतृत्व किया, जिसके चलते अंग्रेजों को लखनऊ रेजीडेंसी में छिपने के लिए मजबूर होना पड़ा था। किन्तु बाद में ब्रिटिश सेना की क्रूर कार्रवाई के चलते बेगम हजरत महल को अवध से भागकर नेपाल में शरण लेनी पड़ी जहां साल 1897 में उनकी मृत्यु हो गई। काठमांडू के जामा मस्जिद में बेगम हजरत महल के शव को दफना दिया गया।

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