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famous Sufi saint Mian Mir who laid the first brick of the Golden Temple

स्वर्ण मंदिर की पहली ईंट रखने वाला विख्यात सूफी संत कौन था?

पंजाब राज्य के अमृतसर शहर स्थित स्वर्ण मंदिर सिख धर्मावलंबियों का सबसे ​पवित्र स्थल है, जो श्री हरमंदिर साहिब या दरबार साहिब के नाम से विख्यात है। सिखों के चौथे गुरु रामदास जी द्वारा स्थापित पवित्र जलाशय अमृत सरोवर के नाम पर शहर का नाम अमृतसर पड़ा।

स्वर्ण मंदिर का नक्शा सिखों के पांचवें गुरु अर्जुन देव जी ने स्वयं तैयार किया था। स्वर्ण मंदिर के चारों दिशाओं (पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण) के चार दरवाजे सभी समुदायों के लिए खुले होने का इशारा करते हैं।

हैरानी की बात है कि गुरु अर्जन देव के अनुरोध पर अमृतसर स्थित पवित्र स्वर्ण मंदिर की पहली ईंट (नींव) एक विख्यात सूफी संत ने रखी थी। जाहिर है अब आप उस सूफी संत के बारे में जानने का उत्सुक हो चुके होंगे। इसके लिए अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर की नींव रखने वाले उस सूफी संत से जुड़ी यह रोचक स्टोरी जरूर पढ़ें।

किसने रखी थी स्वर्ण मंदिर की नींव

मशहूर पत्रकार पतवन्त सिंह की किताब द सिक्ख के अनुसार, “सिखों के तीसरे गुरु अमर दास जी के समय स्वर्ण मंदिर की जगह मिट्टी की एक झोपड़ी हुआ करती थी, जहां वह ध्यान-साधना किया करते थे। सिखों के चौथे चौथे गुरु रामदास जी ने अमृत सरोवर और उसके आस-पास की जमीन 700 रुपयों में खरीदी थी। हरमंदिर साहिब विकिपीडिया के मुताबिक, गुरु रामदास जी ने स्वर्ण मंदिर की नींव रखी थी।

किन्तु यूरो​पीय स्रोत द पंजाब नोट्स एंड क्वेरीज के अतिरिक्त गुलाम मुहय्युद्दीन बूट शाह द्वारा लिखित ग्रन्थ तवारीख-ए-पंजाब (1848) तथा हरमंदिर साहिब के अधिकारियों द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट श्री दरबार साहिब (1929) के अनुसार सिखों के पांचवें गुरु अर्जन देव के अनुरोध पर लाहौर के विख्यात सूफी संत हज़रत मियां मीर ने दिसम्बर, 1588 में पवित्र तीर्थस्थल स्वर्ण मंदिर (हरमंदिर साहिब) की नींव रखी थी।

वहीं 19वीं सदी के लेखक सोहन लाल सूरी अपनी फारसी किताब उमाद्-उत-तवारीख में लिखते हैं कि हरमंदिर साहिब की नींव मियां मीर ने रखी थी। मशहूर इतिहासकार ज्ञानी ज्ञान सिंह अपनी किताब पंत प्रकाश में लिखते हैं कि मियां मीर ते नींव रखाई कारीगर ने पलटकर लगाई। इस बारे में एक चर्चित कथा है कि हजरत मियां मीर ने जब स्वर्ण मंदिर की ईंट रखी तब राजमिस्त्री ने उसे सीधा करने के लिए उठाया। गुरु अर्जन देव जी ने राजमिस्त्री को जब ऐसा करते देखा तब फटकार लगाते हुए कहा कि तुम उस निर्णय को कैसे बदल सकते हों, जिसे एक सच्चे दरवेश ने लिया है। तुमने जो किया है, इसके चलते इस पवित्र स्थान की नींव हमेशा डगमगाती रहेगी। प्रत्यक्ष है, स्वर्ण मंदिर को कई बार विध्वंस का सामना करना पड़ा। 

गुरु अर्जुन देव ने स्वर्ण मंदिर निर्माण के लिए सिखों से उनकी आमदनी का दसवां हिस्सा दान में देने के लिए कहा। इसी के साथ स्वर्ण मंदिर निर्माण कार्य शुरू हुआ। ध्यान रहें, मियां मीर के प्रति असीम श्रद्धा रखने वाले दारा शिकोह ने अपनी कृति सकीनत-उल-औलियामें कादिरी परम्परा के सूफियों का जीवन वृत्तांत लिखा है, किन्तु इस घटना का वर्णन नहीं किया है।

विख्यात सूफी संत मियां मीर

कादरिया सिलसिले के मियां मीर ( 1550- 1635) उत्तर भारत के सबसे विख्यात सूफी संत थे। सूफी संत हजरत मियां मीर लाहौर के जिस इलाके में रहते थे, अब उसे धरमपुरा (अब पाकिस्तान में) कहा जाता है। हजरत मियां मीर का पूरा नाम शेख मुहम्मद मीर था। आजीवन अविवाहित रहने वाले मियां मीर सदा ईश्वर की इबादत में डूबे रहते थे। मुगल बादशाह जहांगीर ने भी दक्कन विजय की कामना लिए मियां मीर से लाहौर में मुलाकात की थी।

इसके अतिरिक्त कादरिया सलसिले के संरक्षक कहे जाने वाले राजकुमार दारा शिकोह ने भी लाहौर में मियां मीर से मुलाकात की थी। मियां मीर की फातिहा (अंतिम संस्कार का पहला भाषण) राजकुमार दाराशिकोह ने ही पढ़ी थी। मियां मीर की मृत्यु के पश्चात दारा शिकोह ने मियां मीर के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी मुल्ला शाह बदख्शी को अपना गुरु बनाया और कादिरी सिलसिले का अनुयायी बन गया। दारा शिकोह की बहन जहांआरा बेगम भी मुल्ला शाह की शिष्य थी।

गुरु अर्जुन देव जी अपने लाहौर प्रवास के दौरान मियां मीर से मुलाकात की थी। कुछ विद्वानों के अनुसार, मियां मीर और गुरु अर्जुन देव जी एक दूसरे का बहुत सम्मान करते थे और करीबी मित्र भी थे। हजरत मियां मीर उम्र में गुरु अर्जुन देव जी से तेरह वर्ष बड़े थे। खैर जो कुछ भी हो, सच यह है कि गुरु अर्जुन देव सूफी संत मियां मीर से काफी प्रभावित थे, यही वजह है कि उन्होंने मियां मीर से दिसम्बर, 1588 में स्वर्ण मंदिर की पहली ईंट रखवाई।

स्वर्ण मंदिर की पहली ईंट रखने वाले मियां मीर सिखों के पांचवें गुरु अर्जुन देव जी के आमंत्रण पर जब लाहौर से अमृतसर आए तब वह मोटे ऊन के टुकड़ों से बना एक लम्बा चोगा और गुलाब के फूल से सजी शंकु के आकार की टोपी पहने हुए थे। अमृतसर पहुंचने के बाद हज़रत मियां मीर तकरीबन दो सप्ताह तक गुरु अर्जुन देव जी के साथ रहे। स्वर्ण मंदिर का निर्माण इसी विचार के साथ शुरू किया गया था ताकि सभी धर्मों के लोग यहां आ सकें।

गुरु अर्जुन देव की शहादत पर मियां मीर ने शोक व्यक्त किया था। इतना ही नहीं, मियां मीर ने मुगल बादशाह जहांगीर तत्पश्चात शाहजहाँ द्वारा भेजे गए किसी भी उपहार को कभी स्वीकार नहीं किया। गुरु अर्जुन देव की मृत्यु के कुछ वर्षों बाद उनके पुत्र गुरु हरगोबिंद सिंह जब 13 वर्ष के थे, तब वे भी मियां मीर से मिलने लाहौर गए। आं​तरिक शुद्धि, सदाचार और धर्मपरायणता के प्रतीक मियां मीर का निधन 85 वर्ष की उम्र में 11 अगस्त 1635 ई. को हुआ था।

मियां मीर का मकबरा लाहौर शहर से एक मील दूर दक्षिण-पूर्व में आलमगंज के पास मौजूद है, जिसका निर्माण राजकुमार दारा शिकोह ने करवाया था। लाहौर स्थित मियां मीर के मकबरे पर प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालु दर्शन करते हैं तथा प्रतिवर्ष मियां मीर का उर्स धूमधाम से मनाते हैं।

स्वर्ण मंदिर, अमृतसर से जुड़ी 25 रोचक बातें

पंजाब के अमृतसर शहर स्थित स्वर्ण मंदिर को हरमंदिर साहिब अथवा दरबार साहिब भी कहा जाता है।

स्वर्ण मंदिर का नक्शा गुरु अर्जुन देव जी स्वयं तैयार किया था।

स्वर्ण मंदिर​ चारों के ओर स्थित पवित्र तालाब अमृत सरोवर का निर्माण सिखों के चौथे गुरु राम दास ने स्वयं अपने हाथों से किया था।

गुरु अर्जुन देव जी ने पवित्र तालाब अमृत सरोवर का विस्तार और सौन्दर्यीकरण करवाया। 

स्वर्ण मंदिर के निर्माण से पूर्व ही अमृत सरोवर में स्नान की परम्परा शुरू हो चुकी थी।

मान्यता है कि अमृत सरोवर में स्नान करने से रोगों से मुक्ति मिलती है।

स्वर्ण मंदिर के चारों दिशाओं में चार दरवाजें हैं, जो सभी जातियों के लिए खुले रहते हैं।

स्वर्ण मंदिर का लंगर (मुफ्त भोजन की व्यवस्था) श्रद्धालुओं के लिए 24 घंटे खुला रहता है। सम्भवत: यह दुनिया की सबसे बड़ी सामुदायिक रसोई है।

अफगान आक्रमणकारी अहमदशाह अब्दाली ने स्वर्ण मंदिर को दो बार (1757 और 1764 ई.) नष्ट करवाया था।

अहमदशाह अब्दाली के विध्वंस के पश्चात स्वर्ण मंदिर वर्षों तक विखण्डित अवस्था में पड़ा रहा।

सरदार जस्सा सिंह आहलूवालिया ने सरहिन्द विजय के पश्चात अप्रैल 1765 में स्वर्ण मंदिर का नए सिरे से निर्माण करवाया।

स्वर्ण मंदिर की वास्तुकला हिन्दू-मुस्लिम शैली का अद्भुत मिश्रण है।

स्वर्ण मंदिर के बाहरी हिस्से पर सोने की परत महाराजा रणजीत सिंह एवं उनके सेनापति हरि सिंह नलवा ने चढ़वाई थी।

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