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Did Porus won the Battle of Jhelum and rebellion of Alexander's soldiers

भारत के इस महायोद्धा से लड़ने के पश्चात सिकन्दर के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया था, ऐसा क्यों?

यूनानी विजेता सिकन्दर (अलेक्जेंडर द ग्रेट) इरान, सीरिया, मिस्र, मसोपोटेमिया, फिनीशिया, जुदेआ, गाझा, बॅक्ट्रिया और काबुल को रौंदता हुआ सिन्धु नदी पार कर 326 ​ईसा पूर्व के बसन्त में भारत भूमि पर कदम रखा। सिकन्दर के सिन्धु नदी पार करते ही तक्षशिला के शासक आम्भी ने अपनी पूरी प्रजा तथा सेना के साथ उसके समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। इतना ही नहीं आम्भी ने अपनी राजधानी में सिकन्दर का भव्य स्वागत भी किया। राजा आम्भी पर मिली सफलता के बाद उत्साहित सिकन्दर ने झेलम तथा चिनाब के बीच फैले प्रदेश के शासक पोरस से भी आत्मसमर्पण करने की मांग की। भारत के इस स्वाभिमानी महायोद्धा के लिए यह शर्त उसके गौरव और मर्यादा के विरूद्ध लगी। ऐसे में पोरस ने संदेश भिजवाया कि वह यूनानी विजेता सिकन्दर के दर्शन रणक्षेत्र में ही करेगा। इसके बाद सिकन्दर और पोरस के बीच झेलम का युद्ध हुआ। इस युद्ध को लेकर भी बड़ी विसंगतियां हैं, कुछ इतिहासकारों का मानना है कि झेलम का युद्ध सिकन्दर ने नहीं बल्कि पोरस ने जीता था। दरअसल इस घमासान युद्ध के पश्चात के सिकन्दर की सेना में विद्रोह हो गया और उसके सैनिकों ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया था। इस स्टोरी में हम आपको यह बताने का प्रयास करेंगे कि आखिर में ऐसा क्या हुआ कि सिकन्दर को विवश होकर स्वदेश लौटना पड़ा। 

सिकन्दर और पोरस के बीच युद्ध

यूनानी विजेता सिकन्दर और भारतीय राजा पोरस के बीच लड़ा गया युद्ध प्राचीन भारत के इतिहास में झेलम युद्ध के नाम से जाना जाता है। बरसात का महीना था, झेलम नदी अपने उफान थी। ऐसे में पोरस अपनी विशाल सेना के साथ झेलम के पूर्वी तट पर आ डटा। ऐरियन लिखता है कि “पोरस की सेना में चार हजार ​बलिष्ठ घुड़सवार, तीन सौ रथ, दो सौ हाथी तथा तीस हजार पैदल सैनिक थे।” वहीं दूसरी तरफ यूनानी विजेता सिकन्दर भी अपनी सेना के साथ उफनती झेलम के पश्चिमी तट पर मौजूद था लेकिन उसके लिए नदी पार करना अत्यंत कठिन था। अत: दोनों पक्ष कुछ दिनों तक एक-दूसरे की प्रतिक्षा करते रहे। आखिरकार एक रात बहुत भीषण बारिश हुई और साहसी सिकन्दर ने धोखे से अपनी सेना को झेलम नदी के पार उतार दिया। सिकन्दर के इस कार्य से पोरस और उसकी सेना स्तम्भित रह गई।

सर्वप्रथम पोरस के बड़े बेटे ने 2000 सैनिकों के साथ आगे बढ़कर सिकन्दर का सामना किया और उसकी व्यूह रचना में घुसकर सिकन्दर को घायल कर दिया तथा उसके प्रिय घोड़े ‘बउकेफला’ को भी मार डाला। हांलाकि पोरस का यह वीर पुत्र युद्धस्थल पर ही मारा गया। कर्तियास के मुताबिक, “पोरस के हा​थियों ने आतंक मचा रखा था। इन हाथियों के भीषण चीत्कार से सिकन्दर के घोड़े इधर-उधर भाग रहे थे। सिकन्दर के सैनिकों ने जब छोटे शस्त्रों से आक्रमण करना शुरू किया तब पोरस के हाथियों ने सिकंदर की सेना को अपने पावों में कुचलना शुरू कर दिया। ऐसे में असंख्य यूनानी सैनिक बेमौत मारे गए।”

इसके बाद साढ़े छह फुट का लम्बा जवान पोरस विशालकाय हाथी पर सवार होकर युद्ध भूमि में उतरा। पोरस के सैनिक विशाल धनुषों से युक्त थे परन्तु यह उनका दुर्भाग्य था बरसात के कारण भूमि दल-दल हो चुकी थी जिससे उनकी धनुष को जमीन पर टेकना असम्भव सा था। घमासान युद्ध के पश्चात तीव्रगामी यूनानी घुड़सवारों ने पोरस की सेना को तितर-बितर कर दिया। चूंकि जेहलम के युद्ध में सिकंदर की अश्व सेना का अधिकांश भाग नष्ट हो चुका था ऐसे में उसने महसूस किया कि यदि पोरस के खिलाफ लड़ाई जारी रखी तो उसकी सम्पूर्ण सेना का विनाश हो सकता है इसलिए सिकन्दर ने तक्षशिला के राजा आम्भी को आत्मसमर्पण के संदेश के साथ पोरस के पास भेजा।

कायर आम्भी को देखते ही घायल पोरस की भुजाएं फड़क उठीं। पोरस ने आम्भी का वध करने के लिए उस पर भाले का प्रहार किया लेकिन भाग्यवश आम्भी बच गया। इसके बाद पोरस को मनाने के लिए सिकन्दर ने अपने मित्र मेरूस को भेजा। ऐसा कहा जाता है कि पोरस आत्मसमर्पण के लिए तैयार हो गया और उसे यूनानी सेना ने बन्दी बना लिया। जब पोरस को घायल अवस्था में सिकन्दर के सामने लाया गया तब उसके शरीर पर नौ घाव थे।

सिकन्दर ने पोरस की वीरता की प्रशंसा की और पूछा कि ‘तुम्हारे साथ कैसा बर्ताव किया जाए’? तब पोरस ने बड़ी निर्भिकता से जवाब दिया- ‘जैसा एक राजा दूसरे राजा के साथ करता है’। यह उत्तर सु​नकर सिकन्दर इतना प्रभावित हुआ कि उसने न केवल पोरस का राज्य वापस कर दिया बल्कि उसके राज्य का और अधिक विस्तार कर दिया। प्लूटार्क के मुताबिक, “सिकन्दर ने पोरस को उसके राज्य के अतिरिक्त 15 संघ राज्य प्रदान कर दिए जिसमें पांच हजार बड़े नगर और अनेक ग्राम ​शामिल थे।” इस प्रकार पोरस की पराजय भी विजय में ​परिवर्तित हो गई।

हांलाकि यह एक विचारणीय प्रश्न है कि अपने सौतेले व चचेरे भाइयों को कत्ल करने के बाद मेसेडोनिया की गद्दी पर बैठने वाले शासक सिकन्दर के द्वारा एक हारे हुए दुश्मन राजा पोरस को आत्मसमर्पण के लिए दो बार अपना प्रतिनिधि भेजना और उसके राज्य के अ​तिरिक्त उसे अन्य15 संघ राज्य तथा कठ गणजातीय प्रदेशों को सौंपना किस हद तक सम्भव है। जाहिर है यूनानी इतिहासकारों ने सिकन्दर को विजयी घोषित करने के लिए कुछ इस तरह का इतिहास लिखा।

सिकन्दर की सेना में विद्रोह और स्वदेश वापसी

पोरस से युद्ध के पश्चात सिकन्दर ने रावी नदी पारकर कठ गणराज्य पर आक्रमण किया। कठ गणराज्य की राजधानी संगल में थी। एरियन लिखता है कि “कठ गण​जाति के लोग पंजाब के सबसे लड़ाकू योद्धाओं में से एक और बड़े साहसी थे।” इन लोगों ने सिकन्दर का कड़ा प्रतिरोध किया लेकिन पोरस की मदद से सिकन्दर ने इन पर विजय प्राप्त कर ली। इसके बाद सिकन्दर ने इन गणजातीय प्रदेशों को भी सिकन्दर ने पोरस के अधीन कर दिया। इसके बाद सिकन्दर की सेना जब व्यास नदी तक पहुंची तब एक विचित्र घटना घटी। सिकन्दर की सेना में विद्रोह हो गया और उसके सैनिकों ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया।

अपने सैनिकों को उत्साहित करने के लिए यूनानी विजेता सिकन्दर ने सेना के बीच जाकर एक जोशीला भाषण दिया तथा कई प्रकार के प्रलोभन भी दिए लेकिन उसके सभी प्रयास निष्फल रहे। अपने सैनिकों के घुटने टेकने से सिकन्दर इतना लज्जित हुआ कि वह अपने शिविर में तीन दिन तक पड़ा रहा। अंत में उसने अपनी सेना को स्वदेश लौटने का आदेश दे दिया।

इसके पीछे की असली वजह यह थी कि पोरस के साथ हुए झेलम के युद्ध में भारतीय वीरों ने यूनानी सेना के छक्के छुड़ा दिए थे। इतना ही नहीं, वीर कठ गणजातियों के विरूद्ध युद्ध जीतने के लिए सिकन्दर को पोरस की मदद लेनी पड़ी थी। गर्मी, वर्षा तथा बीमारियों से थके-मांदे सिकन्दर के सैनिकों को जब यह पता चला कि व्यास नदी के पूर्व में नन्दों के शक्तिशाली साम्राज्य से युद्ध करना है जो अपनी वीरता, सम्पत्ति तथा समृद्धि के लिए विख्यात हैं। अत: सिकन्दर के सैनिकों का उत्साह भंग हो गया और उन्होंने युद्ध लड़ने से इनकार कर दिया। 

अन्त में विवश होकर सिकन्दर ने अपने सेनापति नियार्कस को जहाजी बेड़े के साथ समुद्र मार्ग से वापस लौटने के आदेश देकर 325 ई.पू. के सितम्बर महीने में वह स्वयं मकरान के किनारे-किनारे स्थल मार्ग से अपने देश यूनान की ओर चल पड़ा। जेड्रोसिया के रेगिस्तानी भागों से होते हुए सिकन्दर बेबीलोन पहुंचा जहां 323 ई. पू. में उसकी मृत्यु हो गई।

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