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Did Maharana Pratap loot Malpura a wealthy town of Amer state

क्या महाराणा प्रताप ने आमेर राज्य के धनाढ्य कस्बे मालपुरा को लूटा था?

मुगल बादशाह अकबर ने अपने प्रमुख प्रतिद्वंदी महाराणा प्रताप को किसी भी तरह कैद करने अथवा पराजित करने के लिए राजपूताना के जिन राजाओं का इस्तेमाल किया था, उनमें राजा मानसिंह, भगवानदास और जगन्नाथ कछवाहा का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।

बादशाह अकबर के आदेश पर आमेर राज्य के राजा मानसिंह और जगन्नाथ कछवाहा ने मुगल सेना की मदद से महाराणा प्रताप के विरूद्ध कठोर सैन्य कार्रवाई की थी, परन्तु ये दोनों राजपूत योद्धा महाराणा प्रताप पर विजय प्राप्त करने अथवा उन्हें कैद करने में नाकाम रहे।

ऐसे में आपका यह सोचना लाजिमी है कि क्या महाराणा प्रताप ने राजपूताना के इन दो योद्धाओं मानसिंह और जगन्नाथ कछवाहा से देशद्रोह का प्रतिशोध​ लेने के लिए मालपुरा कस्बे को लूटा था? जी हां, इस रोचक प्रश्न को जानने के लिए महाराणा प्रताप से जुड़ी यह स्टोरी जरूर पढ़ें। 

हल्दीघाटी युद्ध के पश्चात महाराणा प्रताप की गिरफ्तारी के प्रयास

मुगल बादशाह अकबर की मन्शा महाराणा प्रताप को किसी भी तरह से कैद करने की थी। 18 जून 1576 ई. को हुए ऐतिहासिक हल्दीघाटी के युद्ध में मुगल सेनापति मानसिंह जब महाराणा प्रताप को बन्दी बनाने में नाकाम रहा, तब अकबर उससे काफी नाराज हुआ था।

चूंकि हल्दीघाटी के युद्ध में राजा मानसिंह न तो महाराणा प्रताप को पूरी तरह से पराजित कर पाया था और न ही उसे कैद कर मुगल दरबार में लेकर आया था, इसलिए क्रुद्ध अकबर ने मानसिंह को भरे दरबार में फटकार लगाई थी तथा उससे सात हजार की मनसबदारी छीन ली और उसके घोड़ों को शाही दाग से मुक्त कर दिया। यह अलग तथ्य है कि बाद में अकबर ने मानसिंह को मुगल दरबार में वापस बुला लिया।

हल्दीघाटी युद्ध के तकरीबन दो साल बाद अकबर ने शाहबाज खां को महाराणा प्रताप से युद्ध करने के लिए भेजा। शाहबाज खां ने 1578 ई.में कुम्भलगढ़ आक्रमण कर दिया परन्तु इस आक्रमण से पूर्व ही किले का कार्यभार मानसिंह सोनगरा को सौंपकर महाराणा प्रताप अर्द्धरात्रि में ही कुम्भलगढ़ से निकल चुके थे।

3 अप्रैल 1578 ई. को मुगल सेनापति शाहबाज खां ने कुम्भलगढ़ पर अधिकार कर लिया। ऐसा पहली बार हुआ था जब इस अजेय दुर्ग को किसी ने जीता था। कुम्भलगढ़ पर मुगल कब्जे के बाद महाराणा प्रताप मेवाड़ की सीमा पारकर ईडर चल गए।

इस सैन्य कार्रवाई के एक साल बाद यानि अक्टूबर 1579 ई. में अकबर ने शाहबाज खां को दोबारा भेजा परन्तु वह महाराणा प्रताप को कैद करने में असफल रहा। साल 1580 में अकबर ने शाहबाज खां की जगह अब्दुल रहीम खानखाना को महाराणा प्रताप के विरूद्ध युद्ध करने के लिए भेजा।

अब्दुल रहीम खानखाना अपने परिवार को शेरपुर में छोड़कर महाराणा प्रताप की खोज में निकल पड़ा परन्तु मौका पाकर प्रताप के पुत्र अमर सिंह ने शेरपुर पर आक्रमण खानखाना की बेगमों सहित उसके परिवार को बन्दी बना लिया। यद्यपि महाराणा प्रताप के आदेश पर उनके पुत्र अमर सिंह ने खानखाना के परिवार को ससम्मान वापस पहुंचा दिया। इसके बाद खानखाना ने महाराणा प्रताप के विरूद्ध युद्ध का विचार त्याग दिया और 1581 ई. के बाद फतेहपुरसीकरी में ही रहने लगा।

महाराणा प्रताप के विरूद्ध अकबर का अंतिम प्रयास

साल 1580 के बाद कुछ वर्षों तक महाराणा प्रताप के विरूद्ध शाही सेना की आक्रामक कार्रवाई तकरीबन बन्द रहीं। अत: महाराणा प्रताप ने अपनी शक्ति संगठित कर 1582 ई. में दिवेर के युद्ध में ​असंख्य मुगल चौकियों पर ​अधिकार कर लिया। इस युद्ध में प्रताप के ज्येष्ठ पुत्र अमर सिंह ने अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन किया। दिवेर युद्ध में निर्णायक विजय प्राप्त करने के बाद महाराणा प्रताप जब कुम्भलगढ़ की ओर गए तब दुर्ग में तैनात मुगल सैनिक किले को छोड़कर भाग खड़े हुए। इस प्रकार 1583 ई. में महाराणा प्रताप ने कुम्भलगढ़ पर भी अधिकार कर लिया।

महाराणा प्रताप के शक्ति प्रदर्शन से चिन्तित बादशाह अकबर ने 5 दिसम्बर 1583 ई. को आमेर के राजा भारमल के छोटे पुत्र जगन्नाथ कछवाहा को महाराणा प्रताप को बन्दी बनाने के लिए भेजा। महाराणा प्रताप एक बार फिर से दुर्गम पहाड़ियों में चले गए। जगन्नाथ कछवाहा अपनी सेना का कुछ भाग माण्डलगढ़ में छोड़कर स्वयं राणा का पीछा करने के लिए निकल पड़ा, उसके साथ उसका सहायक सैय्यद राजू भी था। लेकिन इन दोनों को ही अपने उद्देश्य में सफलता नहीं मिली।

महाराणा प्रताप ने मालपुरा को लूटा

महाराणा प्रताप ने राजा मानसिंह एवं जगन्नाथ कछवाहा के आक्रमणों तथा देशद्रोह का प्रतिशोध लेने के लिए आमेर राज्य के सम्पन्न कस्बे मालपुरा को लूटा। एक दूसरा तथ्य यह है कि उन दिनों मालपुरा नगर आमेर राज्य का बड़ा व्यापारिक केंद्र था, ऐसे में अपने राजकोष की भरपाई करने के लिए महाराणा प्रताप ने इस पर हमला किया।  झालरा तालाब के किनारे नीलकंठ महादेव का मंदिर है और इस मंदिर के सामने विशाल मैदान है। कहते हैं, महाराणा प्रताप की सेना ने इसी विशाल मैदान में पड़ाव डाला था। हांलाकि इतिहास की प्रमाणिक पुस्तकों में इस घटना का कोई सटीक साक्ष्य नहीं मिलता है।

वहीं कुछ इतिहासकारों के अनुसार, महाराणा प्रताप के ज्येष्ठ पुत्र अमरसिंह ने आमेर राज्य के सम्पन्न कस्बे मालपुरा को लूटा था। अमरसिंह को मालपुरा से अच्छी धन-सम्पदा हाथ लगी थी, हांलाकि महाराणा अमर सिंह ने मालपुरा की प्रजा अथवा जन-धन को कोई हानि नहीं पहुंचाई केवल मुगल चौकियों को लूटा था। अमरसिंह ने मालपुरा के अतिरिक्त आमेर के चाकसू और लालसोठ आदि नगरों को भी लूटा था।

चावण्ड को बनाई आपातकालीन राजधानी

दिवेर युद्ध और कुम्भलगढ़ विजय के पश्चात महाराणा प्रताप ने मेवाड़ के दक्षिणी-पश्चिमी भाग जो कि छप्पन क्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध था। वहां के राज़ा लूणा राठौड़ को पराजित कर चावण्ड से निकाल दिया और उस सारे क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। इसके बाद महाराणा प्रताप ने चावण्ड को अपनी नई राजधानी बनाई और राजमहलों का निर्माण आदि करवाने के साथ ही वहां चामुण्डा माता का मंदिर भी बनवाया।

चावण्ड क्षेत्र अगले 28 वर्षों तक मेवाड़ की राजधानी रही। चावण्ड को राजधानी बनाने के पश्चात महाराणा प्रताप ने चित्तौड़ तथा मांडलगढ़ को छोड़कर शेष मेवाड़ पर अपना अधिकार कर लिया था।

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