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Did Gautam Buddha really eat pork?

क्या गौतम बुद्ध ने सच में खाया था सूअर का मांस?

कपिलवस्तु के शाक्यगण के प्रधान शुद्धोधन के इकलौते पुत्र सिद्धार्थ बचपन से ही अत्यधिक चिन्तनशील स्वभाव के थे। प्राय: एकान्त में बैठकर सिद्धार्थ जीवन-मरण, सुख-दु:ख आदि समस्याओं के विषय में गम्भीरतापूर्वक विचार किया करते थे। ऐसे में शाक्य राजकुमार सिद्धार्थ को सांसारिक जीवन से विरक्त होते देख उनके पिता शुद्धोधन को गहरी चिन्ता हुई। उन्होंने सिद्धार्थ को सांसारिक विषयभोगों में फंसाने की भरपूर कोशिश की। इसके लिए उन्हें​ विलासिता की सामग्रियां प्रदान की गईं।

इसी उद्देश्य से उनके पिता शुद्धोधन ने सिद्धार्थ का विवाह 16 वर्ष की उम्र में ही शाक्यकुल की अत्यंत रूपवती कन्या यशोधरा से कर दिया। उत्तरकालीन बौद्ध ग्रन्थों में यशोधरा को बिम्बा, गोपा, भद्कच्छना आदि नाम दिया गया है। हांलाकि कालान्तर में यशोधरा नाम ही सर्वप्रचलित हुआ। यशोधरा और सिद्धार्थ से एक पुत्र भी उत्पन्न हुआ जिसका नाम ‘राहुल’ पड़ा।

‘सिद्धार्थ’ से ‘बुद्ध’ बनने तक का सफर

तीनों ऋतुओं में आराम के लिए अलग-अलग महल बनवाए गए थे तथा इस बात की पूरी व्यवस्था की गई थी कि शाक्य राजकुमार सिद्धार्थ सांसारिक दु:खों का दर्शन न कर सकें। बावजूद इसके सिद्धा​र्थ सांसारिक विषयभोगों में वास्तविक संतोष नहीं पा सके। विहार के लिए जाते हुए उन्होंने प्रथम बार वृद्ध, द्वितीय बार एक रोगी मनुष्य, तृतीय बार एक मृतक तथा अन्तत: एक प्रसन्नचित संन्यासी को देखा। ऐसे में बुढ़ापा, व्याधि तथा मृत्यु जैसी गम्भीर समस्याओं ने उनके जीवन का मार्ग बदल लिया तथा इन समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए सिद्धा​र्थ ने अपनी पत्नी तथा पुत्र को सोते हुए छोड़कर गृह त्याग दिया। उस समय सिद्धार्थ महज 29 साल के थे। सिद्धा​र्थ के गृह त्याग को बौद्ध ग्रन्थों में ‘महाभिनिष्क्रमण’ की संज्ञा दी गई है।

इसके पश्चात ज्ञान की खोज में सिद्धार्थ एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करने लगे। इस प्रक्रिया में वे सर्वप्रथम वैशाली के नजदीक अलारकालाम नामक संन्यासी के आश्रम में तपस्या की, सांख्य दर्शन का आचार्य अलारकालाम साधना-शक्ति के लिए विख्यात था। परन्तु यहां भी उन्हें शान्ति नहीं मिली। इसके बाद सिद्धा​र्थ रूद्रकरामपुत्त नामक एक दूसरे धर्माचार्य के पास पहुंचे जो राजगृह के समीप एक आश्रम में निवास करता था। इस आश्रम में भी उनके अशान्त मन को संतोष नहीं मिला तो उन्होंने उरूवेला (बोधगया) नामक स्थान को प्रस्थान किया, यहां उनके साथ पांच ब्राह्मण संन्यासी भी आए थे। अब सिद्धार्थ ने अकेले तपस्या करने का निश्चय किया। 6 वर्ष की कठोर तपश्चर्या के पश्चात 35 वर्ष की आयु में वैशाख पूर्णिमा की रात को एक पीपल वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। अब उन्होंने दुख और उसके कारणों का पता लगा लिया था। तपस्वी सिद्धार्थ इस समय से ‘बुद्ध’ के नाम से विख्यात हुए।

गौतम बुद्ध ने किया अपने मत का प्रचार

ज्ञान प्राप्ति करने के पश्चात गौतम बुद्ध ने अपने मत का प्रचार करने का निश्चय किया। इसलिए उरूवेला से वे सबसे पहले ऋषिपत्तन (सारनाथ) आए। यहां उन्होंने पांच ब्राह्मण संन्यासियों को अपना पहला उपदेश दिया। बौद्ध धर्म में इस प्रथम उपदेश को ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ की संज्ञा दी जाती है।

सारनाथ से बुद्ध वाराणसी गए जहां यस नामक एक धनी श्रेष्ठिपुत्र को उन्होंने अपना शिष्य बनाया। गौतम बुद्ध वर्षा ऋतु में विभिन्न नगरों में विश्राम करते तथा शेष ऋतुओं में अपने मत का प्रचार-प्रसार करते ​थे। इस क्रम में उन्होंने राजगृह में द्वितीय, तृतीय तथा चतुर्थ वर्षाकाल व्यतीत किया। अत: मगध के राजा बिम्बिसार ने उनके लिए वेलुवन नामक विहार बनवाया। इस दौरान सारिपुत्र, मौद्गल्यान उपालि, अभय आदि उनके प्रमुख शिष्य बन गए।

बुद्ध ने गया, नालन्दा, पाटलिपुत्र आदि की यात्रा की तथा अनेक लोगों को अपना शिष्य बनाया। राजगृह में रहते हुए बुद्ध ने अपने गृहनगर कपिलवस्तु की भी यात्रा की जहां परिजनों को अपने मत में दीक्षित किया। राजगृह से चलकर बुद्ध लिच्छवियों की राजधानी वैशाली पहुंचे। वैशाली में बुद्ध ने अपना पांचवा वर्षाकाल बिताया। लिच्छवियों ने उनके निवास के लिए महावन में प्रसिद्ध कूटाग्रशाला का निर्माण करवाया। वैशाली की प्रसिद्ध नगरवधू आम्रपाली उनकी शिष्या बनी तथा उसने भिक्षु संघ के निवास के लिए अपनी आम्रवाटिका प्रदान कर दिया। वैशाली में ही बुद्ध ने पहली बार महिलाओं को भी अपने संघ में प्रवेश करने की अनुमति प्रदान की। 

संघ में प्रवेश पाने वाली बुद्ध की सौतेली माता प्रजापति गौतमी थी जो शुद्धोधन की मृत्यु के पश्चात कपिलवस्तु से चलकर वहां पहुंची थी। कहा जाता है कि प्रारम्भ में बुद्ध तो महिलाओं को संघ में लेने के विरोधी थे लेकिन प्रजापति गौतमी और प्रिय शिष्य आनन्द के अनुनय-विनय करने पर उन्होंने इसकी अनुमति प्रदान कर दी। 

कपिलवस्तु से राजगृह जाते समय बुद्ध ने अनुपिय नामक स्थान पर कुछ काल तक विश्राम किया। यहीं पर शाक्य राजा भद्रिक, अनुरूद्ध, उपालि, आनन्द, देवदत्त के साथ बुद्ध से मिला था। बुद्ध ने इन सभी को अपने मत में दीक्षित किया तथा आनन्द को अपना व्यक्तिगत सेवक बना लिया। वैशाली से बुद्ध भग्गों की राजधानी सुमसमारगिरि गए और वहां आठवां वर्षाकाल व्यतीत किया। यहां बोधिकुमार उनका शिष्य बना। यहां से वे वत्सराज उदयन की राजधानी कौशाम्बी गए तथा वहां नवां विश्राम लिया। उदयन पहले बौद्धमत में रूचि नहीं रखता लेकिन बौद्ध भिक्षु पिन्डोला भारद्वाज के प्रभाव से बौद्ध बन गया। उदयन ने घोषितराम विहार भिक्षु संघ को प्रदान किया।

इसके बाद बुद्ध ने मथुरा के समीप वेरन्जा में अपना 12वां वास किया। अवन्ति के राजा प्रद्योत ने उन्हें आमंत्रित किया लेकिन अपनी वृद्धावस्था के चलते उन्होंने अपने शिष्य महाकच्चायन को भेजा। ऐसे में अवन्ति में भी बुद्ध के कुछ अनुयायी बन गए। बुद्ध ने चम्पा तथा कजगल की यात्रा की तथा इन स्थानों में रहकर अनेक लोगों को दीक्षित किया।

गौतम बुद्ध ने अपने जीवन का सबसे ज्यादा समय कौशल राज्य में व्यतीत किए। यहां बुद्ध ने इक्कीस वास किए। कौशल के एक धनी व्यापारी अनाथपिण्डक ने उनकी शिष्यता ग्रहण की। अनाथपिण्डक ने 18 करोड़ स्वर्ण मुद्राएं देकर राजकुमार जेत से संघ के लिए जेतवन विहार खरीदा था। भरहुत से प्राप्त एक शिल्प के उपर इस दान का अंकन मिलता है। 

कोशल नरेश प्रसेनजित ने भी सपरिवार बुद्ध की शिष्यता ग्रहण की तथा संघ के पुब्बाराम (पूर्वाराम) नामक विहार बनवाया। गौतम बुद्ध कौशल में वास करने के दौरान जेतवन तथा पूर्वाराम नामक विहारों में बारी-बारी विश्राम करते थे। श्रीवास्ती में रहने के दौरान बुद्ध ने अंगुलिमाल नामक खूंखार डाकू (जो मनुष्यों की अंगुलियों को काटकर उनकी माला पहनता था)  को अपने मत में दी​क्षित किया। इस प्रकार कोशल राज्य में बुद्ध के सबसे ज्यादा अनुयायी बन गए।

गौतम बुद्ध की मृत्यु (महापरिनिर्वाण)

विभिन्न स्थानों का भ्रमण करते हुए तथा लोगों को अपने मत में ​दीक्षित करते हुए बुद्ध मल्लों की राजधानी पावा पहुंचे। जहां चुन्द कम्मारपुत्त नामक एक लोहार के आम्रवाटिका (आम का बगीचा) में ठहरे। कम्मारपुत्त शब्द से तात्पर्य ‘लोहार का पुत्र’ है। चीनी भाषा में चुंद का नाम झेंतुओ के रूप में वर्णित किया गया है। जहां उनके शिष्य चुन्द ने गौतम बुद्ध को ‘सूकरमद्दव’ खाने के लिए दिया। चुन्द द्वारा दिए गए इस भोज्य पदार्थ को खाने के बाद ही गौतम बुद्ध घातक पेचिश (रक्त ​अतिसार) से ग्रसित हो गए। भयंकर पीड़ा सहन करते हुए वे कुशीनारा पहुंचे, यहीं 80 वर्ष की आयु में उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया। बौद्ध ग्रन्थों में इसे महापरिनिर्वाण कहा गया है।

गौतम बुद्ध के भोज्य पदार्थ ‘सूकरमद्दव’ पर विवाद

पालि धर्म ग्रंथ सुत्त पिटक के दीघनिकाय का 16वां सूत्र महापरिनिब्बाण सुत्त (महापरिनिर्वाण सूत्र) में गौतम बुद्ध की मृत्यु के बारे में विस्तृत विवरण मिलता है। महापरिनिब्बाण सुत्त को बुद्ध की मृत्यु से जुड़ी जानकारी का प्राथमिक स्रोत भी माना जाता है।

महापरिनिब्बाण सुत्त के मुताबिक, गौतम बुद्ध आम्रवाटिका में अपने भिक्षुओं के एक समूह के साथ रूके थे। वह चुन्द कम्मारपुत्त से भिक्षुओं को चावल और केक (टिक्की ​अथवा मालपुआ) परोसने के लिए कहते हैं। जबकि खुद के लिए ‘सूकरमद्दव’ परोसने की बात करते हैं साथ ही वह चुंद से यह भी कहते हैं खाने के बाद बचे हुए सूकरमद्दव को एक गड्ढे में दबा देना चाहिए। इसके बाद चुंद कम्मारपुत्त ठीक वैसा ही करता है।

इसके अतिरिक्त पालि साहित्य के एक महान भारतीय बौद्धाचार्य और विद्वान बुद्धघोष द्वारा संस्कृत भाषा में लिखी गई पुस्तक ‘सुमंगलविलासिनी’ में सूकरमद्दव का अर्थ सूअर का मांस बताया गया है। इसके बाद से ही इस विवाद को अत्यधिक बल मिला कि बुद्ध ने अपने अंतिम भोजन में सूअर का मांस खाया था।

चूंकि ‘सूकरमद्दव’ शब्द- सूकर और मद्दव से मिलकर बना है, ऐसे में ‘सूकर’ का अर्थ होता है-सूअर और ‘मद्दव’ का अर्थ कोमल मांस। हांलाकि यह तर्कसंगत नहीं है क्योंकि अपने मृत्यु से पहले गौतम बुद्ध ने अपने प्रिय शिष्य आनंद से कहा कि पावा जाकर चुंद को यह बताएं कि उसके द्वारा दिए गए भोजन से उनके बीमार होने से कोई भी लेना-देना नहीं है, अत: चुंद को कोई दोष या पछतावा महसूस नहीं करना चाहिए।

गौरतलब है कि गौतम बुद्ध की मत्यु से जुड़ा यह विवाद बुद्धघोष की किताब ‘सुमंगलवासिनी’ से ही उपजा। इससे पूर्व किसी भी बौद्धग्रन्थ में सूकरमद्दव का तात्पर्य ‘सूअर के मांस’ से नहीं जोड़ा गया है। जबकि दूसरे अर्थों में सूकरमद्दव वस्तुत: कोई वनस्पति थी, जो सूअर के मांद के पास उगती थी जैसे-मशरूम, कुकुरमुत्ता या ट्रफल, रतालू अथवा कंद जिसके खाने से गौतम बुद्ध रक्तातिसार से पीड़ित हो गए।

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