
ओरछा के राजा मधुकर शाह के छोटे बेटे वीर सिंह देव बुन्देला और मुगल बादशाह जहांगीर के बीच दोस्ती की शुरूआत अबुल फजल की हत्या से शुरू होती है। यह स्टोरी उस दौर की है जब शहजादे सलीम (बादशाह बनने के बाद जहांगीर) ने अपने पिता बादशाह अकबर के खिलाफ बगावत कर इलाहाबाद के किले में अपना दरबार लगाना शुरू कर दिया था।
जहांगीर को उसके लोगों ने भड़काया कि अकबर मुगल शहज़ादा खुसरो को बादशाह बनाना चाहता है और इस षड्यंत्र में अबुल फजल भी शामिल है। उन दिनों अकबर ने अहमदनगर के निजामशाही से चल रहे संघर्ष से निपटने के लिए अबुल फजल को दक्कन भेजा था। साल 1602 में जहांगीर को यह सूचना मिली कि अकबर ने अबुल फजल को मुगल दरबार में तुरन्त हाजिर होने का पैगाम भेजा है। ऐसे में अपनी सत्ता के लिए चिन्तित जहांगीर ने अकबर के वफादार अबुल फजल को अपने रास्ते से हटाने का निर्णय लिया।
अबुल फजल की हत्या
जहांगीर को इस बात की पुख्ता सूचना थी कि अबुल फजल का काफिला दक्कन से बुन्देलखण्ड के रास्ते आगरा के लिए प्रस्थान करेगा। ऐसे में जहांगीर ने वीर सिंह देव बुन्देला से दतिया में मुलाकात कर अबुल फजल के हत्या की साजिश रची। जहांगीर ने वीर सिंह देव बुन्देला को इस बात का पूर्ण आश्वासन दिया कि यदि वह अबुल फजल का सिर काटकर लाएगा तो वह उसे ओरछा का राजा बना देगा।
हांलाकि अबुल फजल को वापसी के समय रास्ते में ही वीर सिंह देव बुन्देला के नापाक इरादों का पता चल चुका था परन्तु अबुल फजल अपने शत्रु वीर सिंह देव बुन्देला को महज लुटेरा समझता था। अबुल फजल ने अपनी कृति ‘अकबरनामा’ में वीर सिंह देव बुन्देला को ‘डाकू’ की संज्ञा दी है। अबुल फजल को उसके सहयोगियों ने सलाह दी कि उसे मालवा के चांदी घाटी के रास्ते जाना चाहिए। परन्तु इस मशविरे को नजरअन्दाज करते हुए अबुल फजल ने कहा कि “डाकूओं की क्या मजाल कि मेरा रास्ता रोकें”।
इस प्रकार पूर्व निर्धारित योजनानुसार, 12 अगस्त 1602 ई. को नरवर से तकरीबन 6 कोस की दूरी (सरायवीर और आंतरी के बीच) पर वीर सिंह देव बुन्देला ने अबुल फजल की सैन्य टुकड़ी पर हमला कर दिया। सैनिक कवच पहले एक राजपूत वीर ने अपने बर्छे से अबुल फजल पर इतना तीव्र प्रहार किया कि यह आर-पार हो गया। अबुल फजल अभी मरा नहीं था, उसके शरीर से खून निकल रहा था, इतने में वीर सिंह बुन्देला ने अपनी तलवार से एक झटके में अबुल फजल का सिर धड़ से अलग कर दिया। इस प्रकार अबुल फजल का कटा सिर जहांगीर के पास इलाहाबाद भेज दिया गया।
वीर सिंह देव बुन्देला बने ओरछा के राजा
शहजादे सलीम यानि जहांगीर ने अकबर से बगावत कर स्वतंत्र शासक बनने का प्रयत्न अवश्य किया था परन्तु अंत में बाप-बेटे में समझौता हो गया। अकबर ने अपनी मृत्यु के अवसर पर सलीम को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। इस प्रकार 1605 ई. अकबर की मृत्यु के बाद वह ‘जहांगीर’ के नाम से बादशाह बना। मुगल बादशाह बनते ही जहांगीर ने वीर सिंह देव बुन्देला को 3000 का मनसब प्रदान किया तथा ओरछा का राजा घोषित कर दिया।
वीर सिंह देव बुंदेला ने अपने कार्यकाल में ‘जहांगीर महल’ के अतिरिक्त झांसी का किला, मथुरा में केशवराय मंदिर, ओरछा का फूल बाग निर्मित करवाया। इसके साथ ही ओरछा में वीर सागर, कुंडार में सिंह सागर और दिनारा में देव सागर जैसे जलाशयों का निर्माण भी इसी बुन्देला राजा ने करवाए थे।
जहांगीर के लिए बनवाया एक शानदार महल
ऐसा कहा जाता है कि बादशाह जहांगीर ने ओरछा आने इच्छा जताई। कहते हैं कि दतिया में जिस टीले पर बैठकर जहांगीर और वीर सिंह देव बुन्देला ने अबुल फजल के हत्या की साजिश रची थी, वहीं वीर सिंह देव ने जहांगीर के स्वागत हेतु एक शानदार सतखण्डा महल का निर्माण करवाया जो आम जनमानस में ‘जहांगीर महल’ के नाम से विख्यात है। इस महल को बनाने में 22 साल (1605 से 1627 ई.) लगे।
वीर सिंह देव बुन्देला ने जहांगीर तथा उसके शाही अमले को ठहरने के लिए चार खण्डों वाले इस महल में 236 कमरे बनवाए जिनमें से 136 कमरे भूमिगत हैं। इस महल में एक भूतल भी है जिसे अब आम जनता के लिए बन्द कर दिया गया है। आयताकार चबूतरे पर बना ओरछा का जहांगीर महल बुन्देली और मुगल वास्तुकला का अद्भुत नमूना है। चूना-पत्थरों से निर्मित इस शानदार महल में फ़िरोज़ा टाइलों, असंख्य खिड़कियों, छतों, प्याज़ के आकार के गुंबदों और विशाल बालकनियों का अद्भुत सामंजस्य देखते ही बनता है। पूरे महल में आयताकार-वर्गाकार कमरों की बनावट भूल-भुलैया की तरह है।
जहांगीर महल का प्रवेश द्वार पहले सिर्फ पूर्व दिशा में था किन्तु बाद में पश्चिम की ओर से एक प्रवेश द्वार बनवाया गया। आजकल पूर्वी प्रवेश द्वार बंद रहता है जबकि पश्चिमी प्रवेश द्वार पर्यटकों के आवागमन के लिए खोल दिया गया है। जहांगीर महल की दीवारों पर उकेरी गई नक्काशियां और आसमान छूती मीनारें, खुले गलियारे और पत्थर की जालिया बरबस ही सैलानियों का मन मोह लेती हैं। जहांगीर महल से बेतवा नदी, पहाड़ एवं ओरछा के सघन वनों के मनोहारी दृश्य नजर आते हैं।
ओेरछा के इस महल में सिर्फ एक रात ठहरा था जहांगीर
कहते हैं, 22 साल में बनकर तैयार हुए इस सतखंडा महल में बादशाह जहांगीर सिर्फ एक रात के लिए रूका था। ओरछा राज महल के ठीक बगल में बने 236 कमरों वाले इस आलीशान महल को वीर सिहं देव बुन्देला ने बादशाह जहांगीर को उपहार स्वरूप दिया था।
झाँसी शहर से सिर्फ़ 20 किलोमीटर दूर ओरछा में तकरीबन 220 वर्ग फीट क्षेत्र में फैला जहांगीर महल के ठीक सामने बेतवा नदी है। वर्तमान में जहांगीर महल भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है। ओरछा राजमहल और जहाँगीर महल देशी-विदेशी सैलानियों के वर्षभर आर्कषण का केन्द्र बने रहते हैं।
जहांगीर महल घूमने का समय सुबह 7.30 बजे से शाम 6 बजे तक है। झांसी से ओरछा पहुंचने के लिए निजी अथवा सार्वजनिक वाहन आसानी से उपलब्ध रहते हैं। वहीं ग्वालियर हवाई अड्डे से जहांगीर महल की दूरी 150 किमी. है। ओरछा किले के परिसर में मौजूद जहांगीर महल घूमने के लिए अक्टूबर से मार्च के बीच का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है। दरअसल इन दिनों यहां का मौसम सुहावना रहता है।
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