
1857 की महाक्रांति में जो नाम महत्वपूर्ण हैं, उनमें अजीमुल्ला खां का नाम भी चिरस्मरणीय है। बिल्कुल सामान्य परिवार में जन्में अजीमुल्ला खां ने अपनी बुद्धिमता के बल पर ही उन्नति की और अन्तत: नाना साहेब के विश्वासपात्र मंत्रियों में से एक हो गए।
अजीमुल्लाह खां पहले एक अंग्रेज परिवार में नौकरी किया करते थे। साधारण परिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षाओं का परित्याग नहीं किया था। अजीमुल्लाह खां ने अपने स्वाध्याय से इंगलिश और फ्रेंच भाषा का ज्ञान प्राप्त कर लिया और इन दोनों भाषाओं में धाराप्रवाह बोलने की क्षमता भी प्राप्त कर ली।
इन दोनों भाषाओं में पारंगत होने के बाद अजीमुल्लाह खान उस अंग्रेज की नौकरी छोड़कर कानपुर के एक स्कूल में पढ़ाने लगे। यहीं से उनकी ख्याति चतुर्दिक व्याप्त होने लगी और एक दिन उनकी प्रशंसा नाना साहेब के कानों तक भी पहुंची।
इस प्रकार अजीमुल्लाह खां का बिठुर के राजदरबार में प्रथम आगमन हुआ। अजीमुल्लाह खां द्वारा दिया गया पहला परामर्श ही नाना साहेब के मन को भा गया और नाना साहेब ने अजीमुल्लाह खान की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। इसके बाद तो स्थिति यह हो गई कि प्रत्येक महत्वपूर्ण कार्य से पहले नाना साहेब के लिए अजीमुल्लाह खां से परामर्श करना अनिवार्य हो गया।
नाना साहेब ने अजीमुल्ला खां को इंग्लैण्ड भेजा
जनवरी 1851 ई. में पेशवा बाजीराव द्वितीय की मृत्यु हो गई परन्तु अपनी मृत्यु से पूर्व ही बाजीराव द्वितीय ने अपना मृत्युपत्र लिख दिया था और उसमें अपने पुत्र नाना साहेब को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर पेशवाई के सम्पूर्ण अधिकार भी उन्हें समर्पित कर दिए थे।
बावजूद इसके साम्राज्यवादी अंग्रेज गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी को ज्यों ही बाजीराव द्वितीय के निधन का समाचार प्राप्त हुआ उसने तुरन्त यह घोषणा कर दी कि आठ लाख रुपए के वार्षिक पेन्शन पर नाना साहेब को कोई भी अधिकार प्राप्त नहीं है।
ब्रिटिश हुकूमत की इस कार्रवाई से व्यथित होकर नाना साहेब ने एक पत्र लिखा जो इस प्रकार है— “हमारे इस विख्यात राजवंश के साथ तुमने जो साधारणजनों का व्यवहार किया है, वह अन्यायपूर्ण है। हमारा विस्तृत राज्य और राज्यसिंहासन जिस दिन तुम्हे श्रीमंत बाजीराव से प्राप्त हुआ था, उस करार में यह स्पष्टरूप से निर्धारित हुआ था कि उस राज्य के मूल्य स्वरूप तुम आठ लाख रुपए वार्षिक चुकाते रहोगे।
यदि वह पेन्शन सैदव के लिए टिकने वाली नहीं है तो फिर इस पेन्शन के बदले दिया गया राज्य भी सदैव के लिए तुम्हारे पास किस प्रकार रह सकता है? यदि सन्धि की पहली शर्त भंग कर दी गई हो तो दूसरी का रहना भी एक असम्बद्ध बात ही है।” इस प्रकार नाना साहेब ने अपने पहले पत्र में ही ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विद्रोह का शंखनाद कर दिया। हांलाकि नाना साहेब ने एक अन्य तर्क सम्मत पत्र लिखकर अपने विश्वासपात्र मंत्रियों में से एक अजीमुल्ला खां को 1854 ई. में इंग्लैण्ड भेजा।
अजीमुल्ला खां का लन्दन प्रवास
इंगलिश एवं फ्रेंच भाषा में माहिर अजीमुल्ला खां को खुदा ने जितना सौन्दर्य प्रदान किया था, उतना ही मधुर वाणी भी दी थी और गम्भीरता भी। अजीमुल्लाह खान को अंग्रेजों की तत्कालीन परम्पराओं और व्यवहारों आदि की भलीभांति जानकारी थी। अत: वे लन्दन में शीघ्र ही लोकप्रिय हो गए।
अजीमुल्लाह खां के सौन्दर्य, मोहक-मधुर वाणी और तेजस्वी शरीर तथा उदारता के फलस्वरूप अनेक अंग्रेज युवतियां उन्हें अपना तन-मन दे बैठीं। उन दिनों लन्दन के सार्वजनिक उद्यानों तथा ब्रायरन के सागर तट पर यह हिन्दी राजा ही चर्चा का विषय रहता था जो सुन्दर परिधानों और आभूषणों से लदा रहता था। लन्दन का प्रचण्ड जनसमूह आकर्षक व्यक्तित्व के धनी अजीमुल्लाह खां की एक झलक पाने के लिए बादल सा उमड़ पड़ता था।
अजीमुल्ला खां से प्रेम करने लगी थीं अंग्रेज युवतियां
अजीमुल्लाह खान लन्दन में एक अंग्रेज महिला लेडी डफ-गॉर्डन के यहां रूके थे। इस अंग्रेज महिला के पति एक सिविल सर्वेन्ट और तत्कालीन प्रधानमंत्री के चचेरे भाई थे। महान स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर अपनी चर्चित किताब ‘1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर’ में लिखते हैं कि “अनेक सम्भ्रान्त और प्रतिष्ठित अंग्रेज परिवारों की युवतियां तो अजीमुल्लाह खान के प्रेम में अपना सुध-बुध खो बैठी थीं और उनके हिन्दुस्तान वापस लौट आने के बाद भी अपने हृदय की पीड़ा की अभिव्यक्ति के लिए उन्हें प्रेम पत्र लिखती रहती थीं।”
इस तथ्य की साक्षी अंग्रेज जनरल हैवलाक को भी उस समय मिली जब उसकी सेनाओं ने कानपुर पर अधिकार कर लिया था। इस दौरान हैवलाक को ऐसे अनेक पत्र मिले थे, जो अंग्रेज युवतियों ने बतौर प्रेमी अजीमुल्लाह खान को लिखे थे।
इंग्लैण्ड मिशन में असफल रहे अजीमुल्लाह खां
विनायक दामोदर सावरकर अपनी किताब ‘1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर’ में लिखते हैं कि “अजीमुल्लाह खां ने अनेक अंग्रेज युवतियों का मन आकर्षित कर लिया था किन्तु ईस्ट इंडिया कम्पनी रूपी सुन्दरी को रिझाने में इस तेजस्वी पुरूष को सफलता नहीं मिल पाई।”
ब्रिटिश हुकूमत कुछ दिनों तक इधर-उधर के उत्तर देती रही और आखिरकार एक दिन स्पष्ट शब्दों में ही लिख दिया कि “गवर्नर जनरल द्वारा प्रदत्त यह निर्णय हमारे मत में पूर्णतया ठीक ही है कि दत्तक पुत्र नाना साहेब को अपने पिता की पेन्शन प्राप्त करने का कोई अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता।”
कहते हैं, लन्दन में अजीमुल्लाह खां की मुलाकात रंगोजी बापू से हुई जो सतारा राज्य का दावा पेश करने के लिए वहां पहुंचे थे। अपने मिशन में नाकाम रहे, इन दोनों हस्तियों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह की अनिवार्यता जाहिर की और इसी उद्देश्य के साथ भारत लौटने का निश्चय किया।
इस प्रकार अपने उद्देश्य में विफल अजीमुल्ला खां हिन्दुस्तान वापस आने के लिए फ्रांस के मार्ग से चल पड़े। वापस लौटते समय अजीमुल्लाह खान कुस्तुतूनिया में भी रुके। ऐसा कहा जाता है कि अजीमुल्लाह खान ने तुर्की और रूस के जासूसों से भी सम्पर्क किया। अजीमुल्लाह खान जब हिन्दुस्तान आए तो उनके साथ एक फ्रेंच प्रिंटिंग मशीन थी, जिसके जरिए उन्होंने अंग्रेजी सरकार के खिलाफ खूब साहित्य प्रकाशित किए।
अजीमुल्लाह खां का निधन
1857 की महाक्रांति में असफल होने के बाद नाना साहेब अचानक कहां गायब हो गए, इस पर अभी भी मतभेद है। सर्वाधिक विद्वानों का मानना है कि नाना साहेब नेपाल चले गए और वहीं 35 वर्ष की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई। ठीक उसी प्रकार क्रांतिदूत अजीमुल्लाह खां के बारे में भी अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया है कि उनकी की मृत्यु कैसे हुई थी। कुछ लोग कहते हैं कि वेष बदलकर कलकत्ता जाते समय चेचक से पीड़ित होने के कारण उनकी मृत्यु हो गई।
जबकि कुछ इतिहासकारों के अनुसार, कानपुर पर अंग्रेजों के अधिकार के बाद अजीमुल्ला खां नेपाल की तराई के दुर्गम सीमावर्ती इलाके में पलायन कर गए जहां 1859 ई. के आखिर में बुखार से उनकी मौत हो गई। वहीं कुछ विद्वानों के मुताबिक, अजीमुल्लाह खां हिन्दुस्तान से बाहर निकलने में सफल रहे किन्तु कुस्तुतूनिया में उनकी हत्या कर दी गई। खैर जो भी हो, 1857 के क्रांतिदूत अजीमुल्लाह खान को अंग्रेजी सरकार ने सबसे ‘शातिर नेता’ कहा था।
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