ब्लॉग

Three incarnations of Lord Vishnu rested at Vishram Ghat in Mathura

भगवान विष्णु के तीन अवतार इस पवित्र घाट पर कर चुके हैं विश्राम

सनातन धर्म में नारायण और श्री हरि के नाम से विख्यात भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनकर्ता माना जाता है। हिन्दू धर्मग्रन्थों के अनुसार, इस पृथ्वी पर जब-जब पाप और अधर्म बढ़ता है तब-तब भगवान विष्णु अवतार लेते हैं।

इसी क्रम में भगवान विष्णु के दस अवतारों की मान्यता कुछ इस प्रकार है- “मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नरसिंहोऽथ वामनः। रामो रामश्च कृष्णश्च बुद्धः कल्किश्च ते दश॥” (मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध, कल्कि) बावजूद इसके एक नाम और भी जिन्हें भगवान विष्णु का ही अवतार माना जाता है।

जी हां, मैं  चैतन्य महाप्रभु की बात कर रहा हूं। हिन्दू धर्मग्रन्थ श्रीमद्भागवत और गरुड़ पुराण में चैतन्य महाप्रभु को श्रीकृष्ण के अवतार के रूप में उल्लेखित किया गया है। अत: आज हम आपको भगवान विष्णु के अवतार भगवान वराह, भगवान श्रीकृष्ण तथा चैतन्य महाप्रभु से जुड़े उस पवित्र तीर्थस्थल के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां इन्होंने विश्राम किया था।

यदि आप यह जानने को इच्छुक हैं कि यमुना नदी का वह पवित्र घाट कौन सा है और कहां है? जहां भगवान वराह, भगवान श्रीकृष्ण और चैतन्य महाप्रभु ने विश्राम किया था, तो इस रोचक स्टोरी को जरूर पढ़ें।

मथुरा का विश्राम घाट

मोक्षदायिनी सप्त पुरियों में अयोध्या, द्वारका, माया (हरिद्वार), काशी और अवन्तिका (उज्जैन) स​हित मथुरा का नाम भी शामिल है। वायु पुराण के अनुसार, “मोक्षदायिनी मथुरा में श्रीहरि विष्णु नित्य निवास करते हैं। यह नगरी श्रीनारायण के वैकुण्ठ धाम से भी श्रेष्ठ मानी गई है।

पौराणिक मान्यता है कि मथुरा में सिर्फ एक दिन निवास करने से ही नारायण की भक्ति प्राप्त हो जाती है, जबकि यहां तीन रात्रि निवास करने से परम दुर्लभ भागवत-प्रेम की प्राप्ति होती है जो कि महान आत्माओं के लिए भी अत्यंत दुर्लभ है।

यमुना नदी के किनारे स्थित मथुरा नगरी का इतिहास भगवान वाराह, मधुदानव के पुत्र लवणासुर, भगवान श्रीराम के अनुज राजा शत्रुघ्न, भगवान श्रीकृष्ण तथा चैतन्य महाप्रभु के ​अतिरिक्त महाकवि सूरदास, स्वामी हरिदासस्वामी विरजानंद तथा उनके परम शिष्य स्वामी दयानन्द सरस्वती, महान कवि रसखान के साथ जुड़ा है। यद्यपि मथुरा-वृदांवन को भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली तथा क्रीड़ास्थली के रूप में सर्वाधिक लोकप्रियता प्राप्त है।

द्वारकाधीश मंदिर के बिल्कुल नजदीक ही यमुना नदी के किनारे स्थित मथुरा का सबसे विख्यात घाट स्थित है, जिसे हम सभी विश्राम घाट’ (मथुरा जंक्शन से तकरीबन 4 किमी. दूर) के नाम से जानते हैं। जैसा कि विश्राम घाट के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है- “आराम करने का घाट।मथुरा के कुल 25 घाटों में विश्राम घाट ही सर्वाधिक लोकप्रिय है। लोक मान्यता है कि विश्राम घाट पर मां यमुना की पूजा-अर्चना तथा विश्राम करने से आत्मिक शांति मिलती है। 84 कोस ब्रज मंडल परिक्रमा शुरू करने से पूर्व तीर्थयात्री विश्राम-घाट पर स्नान अवश्य करते हैं।

विश्राम घाट पर भगवान श्रीकृष्ण तथा अन्य देवी-देवताओं के अतिरिक्त यमुना महारानी का एक अति सुन्दर मंदिर है। यहीं पर म​थुरा के राजा कंस की दासी कुब्‍जा का मंदिर भी है। इसके अतिरिक्त विश्राम घाट पर भैया दूज के दिन स्नान करने का विशेष महत्त्व है। ऐसी मान्यता है कि भैया दूज पर यमुना नदी में स्नान करने से भाई को अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है और उसकी आयु लंबी होती है। इसीलिए लाखों भाई-बहन उस दिन यमुना में विश्राम घाट पर स्नान करते हैं।

विश्राम घाट पर सायंकाल का वातावरण बेहद आध्यात्मिक होता है। यमुना महारानी की आरती देखते ही बनती है। श्रद्धालुजन शाम के वक्त यमुना नदी में तेल के दीए और पान के पत्तों पर दीए जलाते हैं।

सूर्यास्त के समय लोग नाव की सवारी कर संध्या आरती का मनोरम दृश्य देखते हैं। विश्राम घाट का पुनर्निर्माण साल 1814 में किया गया था। इसके अतिरिक्त सबसे खास बात यह है कि भगवान विष्णु के तीन अवतारों ने मथुरा के विश्राम घाट पर आराम किया था, इसका वर्णन कुछ इस प्रकार मिलता है।

1. भगवान वराह

भगवान वराह को श्रीहरि विष्णु का तीसरा अवतार माना गया है। संस्कृत शब्द वराह का अर्थ होता है- सूअर। भगवान वराह को सूअर के सिर और मानव शरीर के रूप में दर्शाया जाता है, जिसमें वह अपने दांतों पर पृथ्वी को उठाए हुए दिखते हैं। प्रत्येक वर्ष भाद्र महीने के शुक्ल पक्ष में तृतीया को वराह जयंती मनाई जाती है।

हिन्दू धर्मग्रन्थों के अनुसार, अत्यंत बलशाली राक्षस हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को चुराकर समुद्र (पाताल लोक) में छिपा दिया था। इसके बाद भगवान विष्णु ने वराह का अवतार धारण कर हिरण्याक्ष का वध किया और पृथ्वी को अपने दांतों की मदद से उठाकर समुद्र से बाहर निकाला तत्पश्चात यथावत स्थापित किया।

भयंकर युद्ध के दौरान राक्षस हिरण्याक्ष का वध करने के बाद थके हुए भगवान वराह ने यमुना नदी के किनारे जिस स्थान पर विश्राम किया था, उसका नाम विश्राम घाट पड़ा। विश्राम घाट पर ही भगवान वराह ने धरती माता को वराह पुराण सुनाया ​जिसे महर्षि व्यास ने संग्रहित किया।

2. भगवान श्रीकृष्ण

श्रीमद्भागवत और महाभारत महाकाव्यमें भगवान श्रीकृष्ण का विस्तृत वर्णन मिलता है। भगवान विष्णु के आठवें अवतार भगवान श्रीकृष्ण ने मथुरा के निर्दयी राजा कंस सहित अन्य राक्षसों का वध कर अपने माता-पिता (देवकी और वासुदेव) को कारागार से मुक्त करवाया था।

भगवान श्रीकृष्ण और उनके ज्येष्ठ भाई बलराम ने राजा कंस समेत उसके आठ भाईयों का वध करने के पश्चात यमुना नदी के विश्राम घाट पर ही आराम किया था। विश्राम घाट पर भगवान श्रीकृष्ण और बलराम कृष्ण का मंदिर बना हुआ है।

3. चैतन्य महाप्रभु

सम्पूर्ण भारत में हरि संकीर्तन को जन-जन तक पहुंचाने वाले चैतन्य महाप्रभु ने गौड़ीय वैष्णववाद की स्थापना की। श्रीमद्भागवत और गरुड़ पुराण सहित उनके समस्त अनुयायी चैतन्य महाप्रभु (गौरांग प्रभु) को भगवान श्रीकृष्ण का अवतार मानते हैं। इतना ही नहीं, उड़ीसा के गजपति महाराज प्रताप रुद्रदेव ने चैतन्य महाप्रभु को श्रीकृष्ण का अवतार माना और वह चैतन्य महाप्रभु का परम भक्त बन गया।

चैतन्य महाप्रभु की जगन्नाथ धाम से मथुरा-वृंदावन पदयात्रा जगप्रसिद्ध है। साल 1515 में चैतन्य महाप्रभु ने मथुरावृदांवन की यात्रा की थी। चैतन्य महाप्रभु ने मथुरा नगर को जैसे ही देखा वे श्रीकृष्ण के प्रेम में लीन होकर भूमि पर बेसुध होकर गिर पड़े।

चैतन्य महाप्रभु ने सर्वप्रथम विश्राम घाट पर स्नान-आराम करने के पश्चात श्रीकृष्ण जन्मस्थान के दर्शन किए। विश्राम घाट के अतिरिक्त महाप्रभु ने मथुरा के अन्य 24 घाटों पर भी स्नान किया। चैतन्य महाप्रभु ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर के पास एक कोठरी में रात्रि विश्राम किया था तत्पश्चात सुबह पूजा-अर्चना करके उन्होंने वृंदावन के पवित्र श्रीकृष्ण लीला स्थलों की खोज की जो तकरीबन लुप्त हो चुके थे।

इसे भी पढ़ें : कैंसर से पीड़ित रामकृष्ण परमहंस का शरीर हो चुका था कंकाल

इसे भी पढ़ें : गांधी जी ने जयप्रकाश नारायण से क्यों कहा था तुम दूसरी शादी कर लो?