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Ramakrishna Paramahansa body had become a skeleton due to throat cancer

कैंसर से पीड़ित रामकृष्ण परमहंस का शरीर हो चुका था कंकाल

महान गुरु का महान शिष्य। जी हां,  मैं ​स्वामी विवेकानन्द के गुरु रामकृष्ण परमहंस की बात कर रहा हूं। तांत्रिक, वैष्णव और अद्वैत साधना में माहिर रामकृष्ण ने निर्विकल्प समाधि की स्थिति को प्राप्त कर लिया था, इसलिए लोग उन्हें परमहंस कहने लगे।

कलकत्ता  (अब कोलकाता) शहर स्थित प्रख्यात दक्षिणेश्वर काली मंदिर के पुजारी रामकृष्ण परमहंस के बारे में ऐसा कहा जाता है कि मां काली उन्हें साक्षात दर्शन देती थीं। वह अपने हाथों से मां काली को भोजन कराते, उनके साथ खेलते-घूमते तत्पश्चात मां काली उन्हें आनंद-विभोर कर चली जातीं थीं। हैरानी की बात है कि इस महान विभूति को जीवन के अंतिम दिनों में गले के कैंसर जैसे असाध्य रोग का कष्ट झेलना पड़ा।

अब आपका यह सोचना बिल्कुल लाजिमी है कि आखिर में परमहंस पद को प्राप्त इस महान विभूति को कैंसर जैसा भयावह रोग कैसे हो गया? सच है दोस्तों, इस भूलोक पर जन्म लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति को चाहे वह कोई भी हो, उसे अपने वर्तमान अथवा प्रारब्ध का कष्ट भोगना ही पड़ता है। यदि आप जानने चाहते हैं कि कैंसर से पीड़ित रामकृष्ण परमहंस के अंतिम दिन कैसे बीते तो यह रोचक स्टोरी अवश्य पढ़ें।

स्वामी विवेकानन्द को कराया था ईश्वर दर्शन

साल 1893 में अमेरिका के शिकागो शहर में आयोजित सर्व धर्म सम्मेलन’ (Parliament of religion) में अपने प्रसिद्ध भाषण से पश्चिमी संसार को पहली बार भारत की सनातन संस्कृति की तरफ आकृष्ट करने वाले स्वामी विवेकानन्द (नरेन्द्र दत्त) की भेंट रामकृष्ण परमहंस से जब पहली बार हुई, उस समय दोनों के विचारों में कोई समानता नहीं थी। रामकृष्ण परमहंस हिन्दू धर्म के प्रतीक थे,  जबकि विवेकानन्द तर्क, विचार एवं बुद्धिवाद में विश्वास करने वाले युवक थे।

किन्तु रामकृष्ण परमहंस के सम्पर्क से विवेकानन्द के जीवन की दिशा ही बदल गई। अपनी पहली मुलाकात में ही विवेकानन्द (नरेन्द्र) ने रामकृष्ण परमहंस से प्रश्न किया कि क्या आपने ईश्वर को देखा है?”  रामकृष्ण परमहंस ने तुरन्त उत्तर दिया - “हां, मैं ईश्वर को देखता हूं, जैसे मैं तुम्हे देखता हूं। तुम चाहो तो उसे देख सकते हो। आगे उन्होंने कहा- “इस संसार में कोई अपने बाप के लिए, कोई मां के लिए, कोई पत्नी के लिए रोता है, किन्तु आज तक ऐसे व्यक्ति को नहीं देखा जो इसलिए रो रहा हो कि उसे ईश्वर नहीं मिला।

रामकृष्ण परमहंस के इस कथन से नरेन्द्र (विवेकान्द) अत्यंत प्रभावित हुए। तत्पश्चात विवेकानन्द जब दूसरी बार रामकृष्ण परमहंस से मिले तो उन्होंने अपना दायां पांव नरेन्द्र के शरीर पर रखा। इस स्पर्श से नरेन्द्र यानि की विवेकान्द को जो अनुभूति हुई, उसका वर्णन उन्होंने इस प्रकार किया है- “आंखें खुली होने पर भी मैंने दीवारों सहित सारे कमरे को शून्य में विलीन होते देखा। मेरे व्यक्तित्व सहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही एक सर्वव्यापक रहस्यमय शून्य में लुप्त होते दिखाई पड़ा।

गले के कैंसर से पीड़ित थे रामकृष्ण परमहंस

रामकृष्ण परमहंस मूर्ति पूजा में विश्वास रखते थे और उसे शाश्वत, सर्वशक्तिमान ईश्वर को प्राप्त करने का एक साधन मानते थे। किन्तु ईश्वर प्राप्ति के लिए नि:स्वार्थ एवं अनन्य भक्ति में आस्था रखते थे। ऐसे समाधिस्थ संत को अपने जीवन के अंतिम दिनों में कैंसर जैसे असाध्य रोग का कष्ट झेलना पड़ा।

रामकृष्ण परमहंस को गले का कैंसर था। शुरूआती लक्षण में उन्हें कुछ भी निगलने में कठिनाई और गले में दर्द महसूस हुआ तत्पश्चात यह स्थिति और भी बदतर होती गई। तमाम चिकित्सा उपचार के बावजूद रामकृष्ण परमहंस को डॉक्टर ठीक नहीं कर पाए। आखिरकार उन्होंने अपनी इस असह्य पीड़ा को ईश्वरीय इच्छा मानते हुए दवाईयां लेने से मना कर दिया।

फिर क्या था, रामकृष्ण परमहंस की यह बीमारी बढ़ती ही गई। इसलिए स्वामी विवेकानन्द और उनके शिष्य उन्हें कोलकाता के निकट कोसीपुर गार्डन हाउस लाए। तकरीबन पौने छह फीट के रामकृष्ण परमहंस काफी मोटे थे किन्तु बीमारी के चलते वह कंकाल बन चुके थे। जीवन के अंतिम कुछ महीनों में उनका शरीर इतना कमजोर हो चुका था कि वह धनुष की तरह मुड़ा हुआ लगता था। रामकृष्ण परमहंस का शरीर एलोपैथिक दवाईयां भी नहीं झेल सकता था।

लिहाजा होम्योपैथिक इलाज शुरू हुआ और कई कॉम्बिनेशन आज़माए गए, फिर भी कुछ फायदा नहीं हुआ। रामकृष्ण को बकरे का मांस तथा सूप देने के बाद उनकी सेहत में कुछ सुधार होते दिखता, फिर कुछ ही दिनों में बीमारी बेरहमी से बढ़ने लगती। रामकृष्ण को सुबह चावल का दलिया, सूप और दूध दिया जाता था जबकि शाम को दूध और जौ का पानी पिलाया जाता था। 

एक दिन रामकृष्ण परमहंस को सूप में आलू, हरे केले, एगफ्रूट और एक- दो फूलगोभी के टुकड़े का सूप दिया गया। उस दिन डॉक्टर ने चौंकते हुए पूछा क्या आपने फूलगोभी खा ली? फूलगोभी बहुत तीखी होती है और पचाने में मुश्किल होती है। तब रामकृष्ण ने कहा कि नहीं, उन्होंने कोई फूलगोभी नहीं खाई है। सम्भवत: इसी सूप की वजह से उनकी बीमारी और बढ़ गई।

डॉक्टर जब रामकृष्ण परमहंस के गले की हालत देखने के लिए उनकी जीभ खींचते थे, तब वह कराह उठते थे। इस दौरान रामकृष्ण दूसरे डॉक्टरों से शिकायत करते थे-“वे लोग मेरी जीभ ऐसे खींचते हैं जैसे वे गाय हों। स्वामी प्रेमानन्द के अनुसार, “जब रामकृष्ण परमहंस के गले में कैंसर वाला ट्यूमर धोया जाता था, तब वह तकलीफ के मारे कराह उठते थे। वे कुछ पल रूकने के लिए कहते, फिर कहते थे, अब धो लो।

रामकृष्ण परमहंस का निधन

हम सभी थोड़ी सी सर्दी-जुखाम अथवा बुखार से परेशान हो जाते हैं किन्तु रामकृष्ण परमहंस तो गले के कैंसर से मर रहे थे, स्थित यह हो गई थी कि वह बातचीत नहीं कर पाते थे, यहां तक कि कुछ भी निगलना मुश्किल हो गया। फिर भी, उन्होंने न सिर्फ़ अपना धैर्य बनाए रखा, बल्कि दुर्बल अवस्था में भी अपने शिष्यों को अध्यात्म के प्रसार तथा मानवता की सेवा करने का संदेश देते रहे।

स्वामी विवेकानन्द अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस की इस तकलीफ को नहीं देख सकते थे। इसलिए उन्होंने अपने गुरु से अपनी बीमारी ठीक करने के लिए मां काली से प्रार्थना करने के लिए कहा। तब रामकृष्ण परमहंस ने जवाब दिया — “तुम्हारे लिए ऐसी बातें करना आसान है किन्तु मां काली से मैं ऐसी चीजें कभी नहीं मांग सकता।

विवेकानन्द (नरेन्द्र) ने कहा - “नहीं, ऐसे नहीं चलेगा, कम से कम हमारे लिए तो आपको मां से बताना ही होगा। रामकृष्ण ने विवेकानन्द को भरोसा दिलाया कि वह ऐसा ही करेंगे। कुछ घंटे बाद विवेकानन्द जब वापस आए तब रामकृष्ण ने कहा, “मैंने अपने गले की ओर इशारा करते हुए मां काली से कहा, ‘मैं यहां घाव की वजह से कुछ नहीं खा सकता। कृपया देखें कि मैं थोड़ा खा सकूं ।

तब मां काली ने जवाब दिया, ‘क्यों! क्या आप इतने सारे मुंह से नहीं खा रहे हैं?’ मुझे इतनी शर्म आ रही थी कि मैं एक भी शब्द नहीं बोल सका।इन्हीं शब्दों के साथ रामकृष्ण परमतत्व में विलीन हो गए। अर्थात् 16 अगस्त 1886 को रामकृष्ण परमहंस का निधन हो गया।

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