लोकनायक जयप्रकाश (जेपी) जब 18 साल के थे तब उनकी शादी 1920 ई. में 14 वर्षीय प्रभावती से हुआ। किशोरावस्था के दिनों में प्रभावती कुर्ता और पायजामा पहना करती थीं। प्रभावती के पिता ब्रजकिशोर प्रसाद एक मशहूर वकील तथा कांग्रेसी नेता थे। जयप्रकाश नारायण उच्च शिक्षा के लिए साल 1922 में कैलिफोर्निया चले गए। तब प्रभावती भी गांधीजी से प्रभावित होकर साबरमती आश्रम में रहने के लिए चली गईं।
तकरीबन सात साल बाद जयप्रकाश नारायण जब स्वदेश लौटे तब उन्होंने देखा कि प्रभावती साध्वी का जीवन व्यतीत कर रही थीं। प्रभावती दरअसल गांधीजी के प्रभाव में आकर ब्रह्मचर्य के रास्ते पर निकल पड़ी थीं। जयप्रकाश नारायण को इससे बहुत दुख हुआ और उन्होंने इसकी शिकायत महात्मा गांधी से की।
तब गांधी जी ने जयप्रकाश नारायण से कहा कि प्रभावती ब्रह्मचर्य का शपथ ले चुकी है तो मैं उसे तोड़ने के लिए नहीं कहूंगा। यदि तुम्हारी इच्छा है तो दूसरा विवाह कर लो। इस बात से जेपी बहुत आहत हुए। अब आप सोच रहे होंगे कि गांधीजी ने जयप्रकाश नारायण से ऐसा क्यों कहा? यह जानने के लिए इस रोचक स्टोरी को जरूर पढ़ें।

प्रभावती का ब्रह्मचर्य
महात्मा गांधी का ‘ब्रह्मचर्य के साथ प्रयोग’ उनके जीवन के सबसे विवादित पहलूओं में से एक माना जाता है। महात्मा गांधी का महिलाओं के साथ सामूहिक स्नान और युवतियों के साथ नग्न अवस्था में सोना उनके ब्रह्मचर्य के प्रयोग का अनूठा उदाहरण था। बकौल गांधीजी, “जो पुरुष किसी खूबसूरत महिला के साथ नग्न रहकर भी कामभावना से दूर रहे, वही असली ब्रह्मचारी है।”
ब्रह्मचर्य व्रत लेने के ठीक एक साल बाद साल 1907 में समाचार पत्र ‘इंडियन ओपिनियन’ में गांधी जी अपने पाठकों को लिखते हैं कि “यह हर विचारशील भारतीय का कर्तव्य है कि वह विवाह न करे। यदि विवाह के सम्बन्ध में वह असहाय है, तो वह अपनी पत्नी के साथ संभोग न करे। पति-पत्नी को केवल बच्चे पैदा करने के उद्देश्य से ही यौन सम्बन्ध बनाने चाहिए।”
कुछ ऐसा था महात्मा गांधी का ब्रह्मचर्य। ऐसे में गांधी के साबरमती आश्रम में ब्रह्मचर्य व्रत लेने वाले पुरुषों के अलावा महिलाओं की भी बहुत लम्बी फेहरिस्त है, इनमें गांधी जी की पत्नी कस्तूरबा गांधी, सरला देवी चौधरी, अमतुस सलाम, मीणा बेन, मनु बेन सहित प्रभावती देवी का नाम भी शामिल है।
भारत के महान समाजवादी लोकनायक जयप्रकाश नारायण अपने विवाह के दो साल बाद साल 1922 में उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका चले गए। जयप्रकाश नारायण सात साल तक विदेश में ही रहे, ऐसे में गांधी दर्शन से प्रभावित होकर प्रभावती देवी उनके आश्रम साबरमती चली गईं।
प्रभावती देवी के साथ गांधी जी का ब्रह्मचर्य प्रयोग
गांधीजी ने साबरमती आश्रम की जिन महिलाओं संग ब्रह्मचर्य का प्रयोग किया था उनमें सुशीला नायर, आभा, कंचन, वीनस, मनुबेन, अमतुस सलाम, सरला देवी चौधरानी, सरोजिनी नायडू, सुचेता कृपलानी सहित प्रभावती देवी का नाम भी शामिल है। अपने विवाह के तुरन्त बाद प्रभावती ने गांधी के संगत में ब्रह्मचर्य जीवन जीने का प्रण ले लिया था। हैरानी की बात यह है कि इतना बड़ा निर्णय लेने से पूर्व प्रभावती ने जयप्रकाश नारायण को भरोसे में नहीं लिया था। हांलाकि सुजाता प्रसाद अपनी किताब ‘द ड्रीम ऑफ रिवॉल्यूशन : ए बायोग्राफी ऑफ़ जयप्रकाश नारायण’ में लिखती हैं कि “प्रभावती देवी ने पत्र के जरिए अपने ब्रह्मचर्य व्रत की जानकारी जयप्रकाश नारायण को दे दी थी। किन्तु जयप्रकाश नारायण अपनी पत्नी प्रभावती के इस फैसले से नाखुश थे। जयप्रकाश नारायण ने भी पत्र लिखकर कहा था कि इस तरह के मामलों में आपस में खुलकर बात होनी चाहिए।”

हांलाकि प्रभावती के साथ गांधीजी किस तरह का रिश्ता रखते थे, इस बात की जानकारी गांधीजी के एक पत्र से मिलती है, जिसे उन्होंने अपने सहयोगी मुन्ना लाल शाह को 6 मार्च 1945 ई. को लिखा था। गांधीजी अपने पत्र में लिखते हैं, “प्रभावती अनेक बार मुझे गर्मी पहुंचाने के लिए मेरे साथ सोई। जब वो थर-थर कांपती जमीन पर पड़ी होती थी तो मैं उसे अपने में समेट लेता था। अब आप स्वयं समझ सकते हैं कि गांधीजी साबतरमती आश्रम के अन्य महिलाओं सहित प्रभावती देवी संग किस तरह का ब्रह्मचर्य पालन करते थे।” इतना ही नहीं, प्रभावती देवी प्रतिदिन गांधीजी के साथ टहलने जाती थीं और उनके पैरों में घी की मालिश किया करती थीं।
महात्मा गांधी से आजीवन नाराज रहे जयप्रकाश नारायण
प्रभावती के ब्रह्मचर्य की वजह से लोकनायक जयप्रकाश नि:सन्तान ही रहे, जिसका उन्हें आजीवन बहुत दु:ख हुआ। जयप्रकाश नारायण ने नाराजगी भरे लहजे में इस बात की शिकायत महात्मा गांधी से की। तब गांधी जी ने जयप्रकाश नारायण से कहा कि प्रभावती ब्रह्मचर्य का शपथ ले चुकी है तो मैं उसे तोड़ने के लिए नहीं कहूंगा। यदि तुम्हारी इच्छा है तो दूसरा विवाह कर लो। हांलाकि इसके लिए जेपी ने गांधी को दोषी नहीं माना किन्तु इस बात से जेपी बहुत आहत हुए।
हांलाकि जयप्रकाश नारायण ने इस बात के लिए महात्मा गांधी को आजीवन माफ नहीं किया। 1930-40 के दशक में गांधी को लेकर प्रभावती और जयप्रकाश नारायण के बीच कई बार लड़ाईयां हुईं। इस बारे में सुजाता प्रसाद अपनी किताब में लिखती हैं कि “प्रभावती ने गांधी को कई पत्र लिख कर जेपी के साथ अपने जीवन पर कई संशय उठाए थे। किन्तु गाँधी ने उनका तुरंत जवाब देते हुए उनके संशय को दूर किया था और उन्हें जेपी के साथ अधिक से अधिक समय बिताने की सलाह दी थी।” आखिरकार प्रभावती के ब्रह्मचर्य को स्वीकार करते हुए जेपी ने स्वयं के लिए भी उसी रास्ते को चुन लिया।
प्रभावती का निधन
प्रभावती देवी अपने जीवन के अंतिम दिनों में कैंसर से पीड़ित गई थीं। हांलाकि प्रभावती ने इस बात को जयप्रकाश नारायण से छुपाए रखा था। यद्यपि जब एक पत्र के जरिए जयप्रकाश नारायण को प्रभावती की इस बीमारी का पता चला तो वे उन्हें लेकर मुम्बई स्थित टाटा कैंसर इंस्टीट्यूट लेकर गए।
किन्तु प्रभावती देवी का कैंसर चौथे स्टेज में था, ऐसे में अप्रैल 1973 में प्रभावती देवी की कैंसर जैसे असाध्य बीमारी से मौत हो गई। इसके बाद जयप्रकाश नारायण बहुत अकेले पड़ गए।
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