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Rajendra Chola First conquered many wars just for Ganga water

श्रीलंका विजय करने वाले भारत के इस शक्तिशाली शासक ने सिर्फ गंगाजल के लिए जीते कई युद्ध

चोल साम्राज्य का यशस्वी सम्राट राजराज एक महान विजेता, साम्राज्य निर्माता, कुशल प्रशासक तथा धर्मसहिष्णु व्यक्ति था। उसका शासनकाल चोल वंश के चरमोत्कर्ष को व्यक्त करता है। राजराज की मृत्यु के बाद उसका योग्यतम पुत्र राजेन्द्र प्रथम सम्राट बना जो चोल साम्राज्य का सबसे प्रतापी शासक सिद्ध हुआ। राजेन्द्र प्रथम ने 1012 से 1044 ई. तक शासन किया।

राजेन्द्र प्रथम ने अपने शासनकाल के पांचवें वर्ष (1017 ई.) में ​सम्पूर्ण श्रीलंका पर अधिकार कर लिया और वहां के शासक महिन्द पंचम को कैद कर चोल राज्य भेज दिया जहां 12 वर्षों बाद उसकी मृत्यु हो गई। करन्दै तामपत्रों के अनुसार, राजेन्द्र प्रथम ने श्रीलंका के राजा के मुकुट, रानी, पुत्री, सम्पूर्ण सम्पत्ति, वाहन, इन्द्र का निर्मलहार (जो पाण्ड्य राजा द्वारा वहां धरोहर रखा गया था) आदि पर अपना अधिकार कर लिया। महावंश से भी राजेन्द्र प्रथम के श्रीलंका विजय की पुष्टि होती है। इतना ही नहीं राजेन्द्र प्रथम ने वहां के बौद्ध विहार को भी नष्ट कर दिया तथा सम्पूर्ण कोष अपने साथ उठा ले गया।

श्रीलंका को अपने अधीन करने के बाद राजेन्द्र प्रथम ने अरब सागर स्थित सदिमन्तीब नामक द्वीप पर भी अपना अधिकार ​स्थापित किया। इसके बाद राजेन्द्र प्रथम ने पाण्डय तथा चेरों पर भी आक्रमण किया। तिरूवालंगाडु के तामपत्र केरल तथा पाण्डय राज्यों के विरूद्ध राजेन्द्र प्रथम की सफलताओं का उल्लेख करते हैं। इन राज्यों पर अधिकार करने के पश्चात उसने अपने पुत्र राजाधिराज को पाण्डय प्रदेश का वायसराय (महामण्डलेश्वर) नियुक्त किया तथा उसे चोल पाण्डय की उपाधि दी।

वर्ष 1020-21 ई. में राजेन्द्र प्रथम ने चालुक्य राज्य की तरफ ध्यान दिया। वहां विमलादित्य के दो पुत्रों विजयादित्य सप्तम तथा राजराज के बीच सिंहासन​ लिए संघर्ष चल रहा था। विजयादित्य के समर्थन में कल्याणी के पश्चिमी चालुक्य शासक जयसिंह द्वितीय तथा कलिंग के पूर्वी गंग शासक कर रहे थे। ऐसे में राजेन्द्र प्रथम ने राजराज का पक्ष लिया।

जब जयसिंह द्वितीय ने वेंगी पर आक्रमण कर विजयवाड़ा पर अधिकार कर लिया तब राजराज की स्थिति दयनीय हो गई तत्पश्चात राजेन्द्र प्रथम ने जयसिंह द्वितीय पर दोतरफा हमला किया। मास्की में जयसिंह द्वितीय की सेना पराजित हुई तथा तुंगभद्रा दोनों के राज्यों की सीमा मान ली गई।

वेंगी में भी राजेन्द्र चोल की सेना ने जयसिंह द्वितीय के सेनानायकों को कई युद्धों में बुरी तरह पराजित किया। वेंगी विजय के बाद अब राजेन्द्र चोल की सेना कलिंग में घुस गई और वहां के शासक मधुकामानव को दण्डित किया। कलिंग विजय के बाद चोल सैनिकों ने  गंगा घाटी के मैदानों में व्यापक सैन्य अभियान चलाया। राजेन्द्र चोल के इसी पूर्वी अभियान का उल्लेख तिरूवालंगाडु तामपत्रों में मिलता है।

राजेन्द्र प्रथम का गंगा घाटी अभियान

उत्तर-पूर्वी भारत की विजय के लिए राजेन्द्र प्रथम ने अपने पुत्र विक्रम चोल के नेतृत्व में एक विशाल सेना भेजी। विक्रम चोल ने उड़ीसा, बस्तर, इन्द्ररथ तथा दक्षिण कोशल राज्यों को विजित करते हुए बंगाल में प्रवेश किया। विक्रम चोल ने बंगाल के पाल शासक महिपाल को भी पराजित किया। परा​जित महिपाल युद्ध क्षेत्र से भाग गया। चोल साम्राज्य के इस व्यापक सैन्य अभियान का मुख्य उद्देश्य गंगा नदी का ​पवित्र जल लाना था। कहा जाता है कि बंगाल के पराजित शासकों ने अपने सिर पर लाद कर गंगाजल चोल राज्य में पहुंचाया।

 गंगा घाटी अभियान की सफलता के बाद राजेन्द्र प्रथम ने गंगैकोण्ड की उपाधि धारण की तथा इसके उपलक्ष में उसने गंगैकोण्डचोलपुरम (त्रिचनापल्ली जिले में) नामक एक नई राजधानी की स्थापना की। उत्तरी भारत को विजित करने के पश्चात राजेन्द्र प्रथम ने एक शक्तिशाली नौसेना भेजकर मलय प्रायद्वीप, जावा, सुमात्रा तथा अन्य द्वीपों पर भी अधिकार कर लिया। गौरतलब है कि उत्तर-पूर्वी भारत के सफल सैन्य अभियान के बाद राजेन्द्र प्रथम की धाक सम्पूर्ण देश में जम गई।

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