हिन्दी सिनेमा की मशहूर अभिनेत्री नरगिस और उनके सुपरस्टार बेटे संजय दत्त से तकरीबन हर भारतीय परिचित है। किन्तु क्या आप जानते हैं संजय दत्त की नानी जद्दनबाई का जन्म पूर्वांचल के सबसे विख्यात शहर बनारस में हुआ था। बनारस की दालमंडी में जद्दनबाई की महफिल सजती थी, जहां देशभर के राजा-महाराजा आया करते थे।
अब आप सोच रहे होंगे कि नृत्य-संगीत में माहिर जद्दनबाई आखिर में बनारस की दालमंडी से उठकर मुम्बईया सिनेमा की पहली महिला संगीत निर्देशक और अभिनेत्री कैसे बनीं? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए यह रोचक स्टोरी जरूर पढ़ें।
बनारस में पैदा हुई थी जद्दनबाई
हिन्दी सिनेमा की खूबसूरत अभिनेत्री नरगिस और संजय दत्त की नानी जद्दनबाई की मां दलीपाबाई एक तवायफ थी। जद्दनबाई का जन्म साल 1892 में बनारस में हुआ था। जद्दनबाई को नृत्य-संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा अपनी मां से मिली थी किन्तु शास्त्रीय संगीत और ठुमरी का प्रशिक्षण उन्होंने उस्ताद मोइनुद्दीन खान तथा अन्य संगीत महारथियों से प्राप्त की थी। फिर क्या था, देखते ही देखते जद्दनबाई भी एक मशहूर गायिका बन गईं।
दलमंडी में सजती थी महफिल
काशी विश्वनाथ मंदिर के पास मौजूद एक घनी आबादी वाला बाजार दालमंडी की पुरानी गली रेडीमेड कपड़ों, दुल्हन के लहंगों, कॉस्मेटिक्स, सेवईं और सूखे मेवों के थोक व्यापार के लिए मशहूर है। किन्तु यह सच है कि दालमंडी क्षेत्र में कभी दालों के व्यापारी अपना कारोबार करते थे और शाम को नृत्य-संगीत में माहिर तवायफों के प्रदर्शन का आनन्द लेते थे।
ब्रिटिश दौर था, देशी रियासतों के कई राजा-महाराजा बनारस की दालमंडी में जद्दनबाई का ठुमरी गायन और नृत्य देखने आते थे। जद्दनबाई का रिश्ता बनारस के अलावा कलकत्ता और गया शहर से भी रहा है। कुछ जानकारों का कहना है कि जद्दनबाई ने तीन शादियां की थीं जिनमें से एक शादी बिहार के गया जिले के रहने वाले एक शख्स से हुई थी। हांलाकि कुछ इसे नहीं भी मानते हैं।
जद्दनबाई गया घराने से भी जुड़ी थीं। कहते हैं ब्रिटिश दौर में दौलतबाग नाम से रजवाड़ा था जहां आज गया शहर का पंचायती अखाड़ा है। कहते हैं, दौलतबाग के नवाब जफरूद्दीन ने जद्दनबाई की ठुमरी से प्रभावित होकर अपने महल में ही उन्हें एक आलीशान हवेली दे दी थी। वर्तमान में जद्दनबाई की आलीशान हवेली गया शहर के पंचायती अखाड़ा रोड स्थित शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान डायट परिसर में मौजूद है जहां कभी रईसों की महफिल सजती थी।

खेद है, डायट परिसर में मौजूद जद्दनबाई की हवेली को अब ध्वस्त किया जा चुका है, इसकी जगह एक एकेडमिक भवन बन रहा है। हांलाकि कुछ प्रशंसकों का कहना है कि गया शहर स्थित जद्दनबाई की हेवली को संरक्षित किया जाना चाहिए, सरकार द्वारा इसे तोड़ा जाना दुर्भाग्यपूर्ण है।
सुपरस्टार संजद दत्त भी कहते रहते हैं कि गया शहर से हमारा पुराना नाता रहा है। संजय दत्त की मां नरगिस ने इस हवेली की देखरेख काफी समय तक की। जद्दनबाई गया शहर में वर्षों तक रहीं, इसी दौरान वह अपने संगीत कार्यक्रमों के चलते कोलकाता और मुम्बई जाया करती थीं।
जद्दनबाई की बेटी नरगिस
जद्दनबाई की ठुमरी और गजलों ने धूम मचा रखी थी। आलम यह था कि जद्दनबाई का संगीत सुनने आए दो हिन्दू युवकों ने इस्लाम कबूल कर लिया और इनसे शादी कर ली। बनारस के एक रईस जगन्नाथ प्रसाद खन्ना उर्फ बच्ची बाबू और जद्दन बाई से नाजीर मुहम्मद उर्फ अख्तर हुसैन का जन्म हुआ।
दरअसल जद्दनबाई ने तीन शादियां की थी। जद्दनबाई की पहली शादी गुजरात के एक व्यापारी नरोत्तम दास से हुई थी। नरोत्तम दास अपनी प्रेमिका जद्दनबाई के प्यार में इस कदर पागल थे कि उन्होंने हिन्दू धर्म छोड़कर इस्लाम कुबूल कर लिया।
जद्दनबाई की दूसरी शादी उस्ताद मीर खान से हुई थी जो उनके कोठे पर हारमोनियम बजाते थे। जद्दनबाई की तीसरी शादी मोहनचंद उत्तमचंद त्यागी उर्फ मोहन बाबू से हुई जिन्होंने इस्लाम कुबूल कर अपना नाम अब्दुल रशीद रख लिया। मोहन बाबू और जद्दनबाई से एक बेटी पैदा हुई जिसे हम सभी ‘नरगिस’ के नाम से जानते हैं।
बता दें कि मशहूर अभिनेता सुनील दत्त की पत्नी और सुपरस्टार संजय दत्त की मां नरगिस भी खूबसूरत और बेहतरीन अभिनेत्री थीं जिनसे तकरीबन हर सिनेप्रेमी परिचित है।
जद्दनबाई और नरगिस : हिन्दी सिनेमा का सफर
संगीत के क्षेत्र में लोकप्रियता हासिल करते ही जद्दनबाई को रामपुर, बीकानेर, ग्वालियर, कश्मीर, इंदौर और जोधपुर रियासत के शासकों ने आमंत्रित करना शुरू किया। इतना ही नहीं, जद्दनबाई की गजलों को यूके की म्यूजिक कम्पनी रिकॉर्ड करने लगी। यहां तक ब्रिटिश अफसर भी जद्दनबाई को अपनी महफिलों में बुलाने लगे।
जल्द ही जद्दनबाई के गाने और गजलें रेडियो स्टेशनों में गूंजने लगी। जद्दनबाई की पॉपुलारिटी को देखते हुए लाहौर की प्लेआर्ट फ़ोटोटोन कंपनी ने 1933 में अपनी फिल्म ‘राजा गोपीचंद’ में काम करने के लिए सम्पर्क किया। इस फिल्म में जद्दनबाई ने शीर्षक चरित्र के माँ की भूमिका निभाई।

इसके बाद जद्दनबाई अपने परिवार के साथ माया नगरी मुम्बई पहुंच गईं जहां बड़े पैमाने पर फिल्में बन रही थीं। मुम्बई पहुंचकर जद्दनबाई ने फिल्म 'इंसान या शैतान’ में अभिनय के साथ ही संगीत निर्देशन भी किया। इस फिल्म के जरिए जद्दनबाई ने हिन्दी सिनेमा की पहली महिला संगीत निर्देशक होने का गौरव प्राप्त किया।
तत्पश्चात जद्दनबाई ने प्रोडक्शन कम्पनी 'संगीत फिल्म्स' की स्थापना की और साल 1935 में फिल्म ‘तलाश-ए-हक’ के जरिए अपनी छह वर्षीय बेटी नरगिस को भी एक बाल कलाकार की भूमिका में मौका दिया। जद्दनबाई ने साल 1936 में फिल्म ‘मैडम फैशन’ और ‘हृदय मंथन’ व साल 1937 में फिल्म ‘मोती का हार’ तथा ‘जीवन स्वप्न’ के लिए भी म्यूजिक कम्पोज किया।
हांलाकि जद्दनबाई की प्रोडक्शन कम्पनी कर्जे में आ गई, जिसका कर्ज उतारने के लिए उन्होंने अपनी बेटी नरगिस को फिल्मी जगत में पूरी तरह से उतार दिया। नरगिस को अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी और फिल्म जगत के मेनस्ट्रीम में उतरना पड़ा। बाद के वर्षों में खूबसूरत अभिनेत्री नरगिस ने मदर इंडिया (1957), आवारा (1951), श्री 420 (1955), बरसात (1949), अंदाज (1949), चोरी चोरी (1956 ) और रात और दिन (1967 ) जैसी कई सुपरहिट फिल्में दी।
जद्दनबाई का निधन
साल 1940 तक भारी नुकसान की वजह से जद्दनबाई की प्रोडक्शन कम्पनी बन्द हो गई। तत्पश्चात हिन्दी सिनेमा की पहली संगीत निर्देशक जद्दनबाई ने फिल्मों में काम करना बन्द कर दिया।
बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की पहली शो वुमन जद्दनबाई आखिरकार कैंसर की बीमारी से ग्रसित हो गईं जिसके चलते 8 अप्रैल 1949 ई. को उनका निधन हो गया।
सच है, जद्दनबाई की विरासत को उनकी बेटी नरगिस और नाती संजय दत्त ने बखूबी आगे बढ़ाया। खूबसूरत अभिनेत्री नरगिस के अलावा संजय दत्त को भी सुपरस्टार का दर्जा हासिल है।
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