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Ganeshotsav-2025: Ganeshotsav has a direct connection with Indian nationalism

भारतीय राष्ट्रवाद से है गणेशोत्सव का सीधा कनेक्शन

वक्रतुण्ड, एकदन्त, कृष्णपिंगाक्ष, लम्बोदर, विघ्नराजेन्द्र, धूम्रवर्ण, विनायक, गणाध्यक्ष, भालचंद्र, गणपति, गजानन, विघ्नविनाशक जैसे प्रमुख 12 नामों वाले प्रथमपूज्य गणेशजी महाराज की सर्वाधिक पूजा-अर्चना पहले दक्कन में होती थी, बतौर उदाहरण- गणेशोत्सव को महाराष्ट्र में राज्य उत्सव घोषित किया जा चुका है।

वेद तथा पुराणों में ज्ञान-विवेक, बल-बुद्धि, ऋत और सत्य के देवता भगवान गण​पति को दक्षिण भारत में श्रम का देवता माना गया है। दक्षिण भारतीयों का ऐसा मानना है कि श्रम करने वालों पर गणपति महाराज सदा प्रसन्न रहते हैं। दक्षिण भारत में कला शिरोमणिके रूप लोकप्रिय गणेशजी महाराज की नृत्य मुद्रा वाली प्रतिमाएं विशेषरूप से दर्शनीय हैं।

किन्तु आज की तारीख में गणेशोत्सव और गणपति पूजा की धूम सम्पूर्ण भारतवर्ष में देखने को मिलती है। यह गणेशोत्सव भाद्रपद की चतुर्थी से लेकर चतुर्दशी तक पूरे 10 दिनों तक चलता है। अत: पूरे देश में गणेशोत्सव की शुरूआत जोरशोर से हो चुकी है।

सार्वजनिक पांडालों से लेकर आवासीय परिसरों तथा घर-घर में गणपति महाराज की मूर्ति स्थापना एवं पूजा-अर्चना की जा रही है। अब आपका यह सोचना लाजिमी है कि देवाधिदेव महादेव तथा मां गौरी के पुत्र भगवान गणपति तो हिन्दू धर्म के आदिदेव, प्रथमपूज्य तथा मंगलमूर्ति देव हैं, फिर इनका भारतीय राष्ट्रवाद तथा देश की आजादी से क्या कनेक्शन है? इस संवदेनशील प्रश्न का उत्तर जानने के लिए यह रोचक स्टोरी जरूर पढ़ें।

सिर्फ उच्च जातियों तक सीमित था गणेशोत्सव

कुछ इतिहासकारों के अनुसार, गणेशोत्सव को छत्रपति शिवाजी महाराज ने 1630-1680 के दौरान मनाना शुरू किया था। ऐसा कहते हैं कि शिवाजी महाराज के बाल्यकाल में उनकी मां जीजाबाई ने पुणे के ग्रामदेवता कसबा गणपति की स्थापना की थी  तत्पश्चात छत्रपति शिवाजी महाराज और फिर पेशवाओं ने इस परम्परा को जारी रखा। पेशवाओं के महल शनिवारवाड़ा में पेशवाओं के सेवक तथा आमजन हर्षोल्लास के साथ भजन-कीर्तन कर गणेशोत्सव मनाते थे। इस दौरान ब्राह्मणों को महाभोज दिया जाता था तथा गरीबों में मिठाई एवं पैसे बांटे जाते थे।

साल 1893 से पूर्व महाराष्ट्र में गणेशोत्सव मुख्यत: ब्राह्मण परिवारों अथवा उच्च जातियों के द्वारा निजी तौर पर मनाया जाता था। हैरानी की बात, यह गणेशोत्सव सिर्फ एक दिन मनाया जाता था, लोग हाथ से बनी हुई मिट्टी की छोटी-छोटी मूर्तियों में विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा कर उसे पवित्र स्थान पर स्थापित कर पूजा-अर्चना करते थे।

किन्तु आज की तारीख में गणेशोत्सव भाद्रपद की चतुर्थी से लेकर चतुर्दशी तक पूरे 10 दिन चलता है। दस दिनों तक चलने वाले गणेशोत्सव के दौरान सार्वजनिक पांडालों से लेकर आवासीय परिसरों के साथ ही घर-घर में गणपति महाराज की मूर्ति स्थापना एवं पूजा-अर्चना की जाती है। गणेशोत्सव को राष्ट्रीय उत्सव में बदलने और इसे आम लोगों से जोड़ने का श्रेय लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को दिया जाता है, इसके पीछे भी एक गहरा इतिहास छुपा है।

भारतीय राष्ट्रवाद से है गणेशोत्सव का सीधा सम्बन्ध

भारतीय मुक्ति संग्राम के दौर में सबसे जुझारू नेताओं में एक नाम बाल गंगाधर तिलक का भी है, जिन्होंने अपना पूरा जीवन देश-सेवा में लगा दिया। भारतीय मुक्ति संग्राम के दौरान लोकमान्य तिलक ने लोगों में राष्ट्रीयता की भावना भरने के लिए एक नारा दिया था- “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा।

उग्र राष्ट्रवादी नेता बाल गंगाधर तिलक ने साल 1881 में मराठी भाषा में केसरी तथा अंग्रेजी में मराठा नाम से दो अखबारों का प्रकाशन शुरू किया। कांग्रेस स्थापना के ठीक तीन साल बाद यानि 1888 ई. में बाल गंगाधर तिलक ने खुद ही इन दोनों अखबारों (‘केसरीऔरमराठा’) का सम्पादन सम्भाल लिया और इन अखबारों के जरिए ब्रिटिश शासन के खिलाफ जनता में जागरूकता पैदा करना शुरू किया।

बाल गंगाधर तिलक का ऐसा मानना था कि भारत को संयुक्त राष्ट्र के रूप में उभारने के लिए भारतीयों को एकजुट धर्म स्वयं प्रदान करना होगा। ऐसे में लोकमान्य तिलक ने भारतवासियों में राष्ट्रीयता की भावना का प्रचार-प्रसार करने के लिए एक अन्य अद्भुत तरीका खोज निकाला। पूरे महाराष्ट्र में अत्यधिक उत्साह और श्रद्धा से मनाए जाने वाले गणपति महोत्सव को बाल गंगाधर तिलक ने पहली बार साल 1893 में राष्ट्रीयता के प्रचार-प्रसार का माध्यम बनाया। अनवरत दस दिनों तक चलने वाले गणपति महोत्सव में देशभक्ति गीतों, भाषणों और अन्य तरीकों से बाल गंगाधर तिलक ने लोगों में राष्ट्रीय प्रेम की भावना कूटकूट कर भरी।

धनन्जय कीर अपनी किताब लोकमान्य तिलक : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के जनक में लिखते हैं कि पूरे महाराष्ट्र में गणेशोत्सव समितियों की स्थापना की गई। युवक टोलियां बनाकर देशभक्ति गीत गाते थे तथा उत्सव के दौरान ओजस्वी वक्ताओं तथा पुजारियों के द्वारा युवाओं को आत्म त्याग तथा देशप्रेम के लिए प्रेरित किया जाता था। उन दिनों गणेशोत्सव के दौरान युवाओं में शारीरिक शक्ति प्रदर्शन का भी खूब चलन हुआ करता था।

महाराष्ट्र के उच्चवर्गीय परिवारों तक सीमित रहने वाले गणपति उत्सव को बाल गंगाधर तिलक ने सार्वजनिक महोत्सव का रूप देकर समाज में व्याप्त छूआछूत को दूर करने, समाज को संगठित करने तथा आम आदमी में राष्ट्रवाद की भावना जगाने का जरिया बनाया। 

भारतीय मुक्ति संग्राम में गणेशोत्सव

साल 1893 में बाल गंगाधर तिलक द्वारा ​शुरू किया गणेशोत्सव देखते ही देखते पूरे महाराष्ट्र में आजादी का नया जरिया बन गया। नागपुर, वर्धा, अमरावती आदि शहरों में गणेशोत्सव के ​जरिए जनता ने आजादी का नया राग छेड़ दिया। भारतीयों में आजादी की अलख जगाने के लिए वीर सावरकर, बाल गंगाधर तिलक, सुभाषचन्द्र बोस, मदन मोहन मालवीय सरोजनी नायडु आदि गणेशोत्सव के दौरान भाषण दिया करते थे।

इस सम्बन्ध में रौलट एक्ट रिपोर्ट में चिन्ता जताते हुए ​कहा गया कि गणेशोत्सव के दौरान युवक सड़कों पर घूम-घूमकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ देशभक्ति गीत गाते हैं। छात्रगण ब्रिटिश विरोधी पर्चियां बांटते हैं जिसमें अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हथियार उठाने व विद्रोह करने का आह्वान होता है। इतना ही नहीं, ब्रिटिश सत्ता को बेदखल करने के लिए जनता में धार्मिक एकजुटता को जरूरी बताया जाता है।

यह सच है कि आजादी की लड़ाई के दौरान भारतवासियों में राष्ट्रीयता की भावना जगाने के लिए शुरू किया गया गणेशोत्सव आज की तारीख में देशभर के सनातनियों के लिए धार्मिक एकजुटता एवं प्रेम का माध्यम बन चुका है। 

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