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India is the birthplace of chess; how did the game eventually reach Europe?

शतरंज का जन्मदाता है भारत, आखिर यूरोप कैसे पहुंचा यह खेल?

दोस्तों, हम सभी जानते हैं कि ग्रैंडमास्टर विश्वनाथन आनंद पांच बार के विश्व शतरंज चैंपियन हैं। इतना ही नहीं, विश्वनाथन आनंद दो बार विश्व रैपिड शतरंज चैंपियन और विश्व ब्लिट्ज शतरंज कप चैंपियन का खिताब भी अपने नाम कर चुके हैं।

अभी हाल में ही 20 वर्षीय आर. प्रज्ञानानंदा ने प्रतिष्ठित नार्वे शतरंज टूर्नामेंट जीतकर इतिहास रच दिया है। इसी के साथ आर. प्रज्ञानानंदा यह प्रतिष्ठित खिताब हासिल करने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बन गए हैं। हैरानी की बात है कि टूर्नामेन्ट के दौरान इस युवा भारतीय खिलाड़ी ने विश्व के नम्बर एक शतरंज खिलाड़ी मैग्नस कार्लसन को क्लासिकल मुकाबलों में दो बार हराया।

उपरोक्त तथ्यों के आधार पर बड़े गर्व के साथ हम कह सकते हैं कि शतरंज के ​खेल में भारत का चैम्पियन होना कोई हैरानी की बात नहीं है, क्योंकि शतरंज का जन्मदाता भी भारत ही है। हांलाकि आज की तारीख में शतरंज एक वैश्विक खेल बन चुका है, विशेषकर यूरोप के प्रतिष्ठित खेलों में शतरंज का एक अलग ही स्थान है।

इतना कुछ जानने के बाद लाजिमी है,  आप भी भारत में शतरंज के जन्म का इतिहास जानने को उत्सुक हो चुके होंगे। इसके अलावा आप यह भी सोच रहें होंगे कि शतरंज का खेल आखिर में भारत से यूरोप कैसे पहुंचा? इन प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए इस रोचक स्टोरी को जरूर पढ़ें। 

शतरंज का जन्मदाता है भारत

ज्यादातर विद्वानों के अनुसार, चतुरंग का खेल गुप्त साम्राज्य के दौरान अस्तित्व में आया। तत्पश्चात यह खेल 6वीं शताब्दी के दौरान भारत में काफी लोकप्रिय हुआ। छठीं शताब्दी में चतुरंग को युद्ध कौशल का खेल माना जाता था क्योंकि चतुरंग का तात्पर्य था सेना के चार अंग - हाथी, घोड़े, रथ और पदाति (पैदल सैनिक)। दरअसल प्राचीन भारत का चतुरंग ही वर्तमान में शतरंज के नाम से जाना जाता है।

चतुरंग पर संस्कृत में चार ग्रन्थ भी मौजूद हैं - चतुरंगकेरली, चतुरंगक्रीड़न, चतुरंगप्रकाश और चतुरंगविनोद। तकरीबन 700 वर्ष पूर्व दक्षिण के एक विद्वान त्रिभंगाचार्य चतुरंग नामक विद्या में काफी निपुण थे। त्रिभंगाचार्य के अनेक उपदेशों में चतुरंग नामक क्रीड़ा का उल्लेख मिलता है।

 त्रिभंगाचार्य के चतुरंग नामक खेल में हाथी, घोड़ा, नौका और बट्टे (पैदल) का प्रयोग होता था। भारतीय साहित्य में बाणभट्ट कृत हर्षचरित में चतुरंग का सर्वप्रथम उल्लेख मिलता है। ज्ञातव्य है, सम्राट हर्ष की जीवनी 7वीं शताब्दी की है। हर्षचरित से जानकारी मिलती है कि उस समय तक चतुरंग नामक खेल भारतीय अभिजात वर्ग में अच्छी तरह से प्रचलित हो चुका था।

तिथितत्व नामक ग्रंथ में भी वेदव्यास जी द्वारा कौरवों और पांडवों को इस खेल का विवरण बताने का उल्लेख मिलता है। चतुरंग के मोहरे कुछ इस प्रकार होते थे राजा, मंत्री, रथ, गज (हाथी), अश्व (घोड़े) और पदाति (पैदल सैनिक) हैरानी की बात है, तकरीबन 1795 से 1805 के बीच ब्रिटिश म्यूजियम में लगी एक पेंटिंग में कृष्ण और राधा को चतुरंग खेलते हुए दिखाया गया है, जाहिर है चतुरंग नामक खेल द्वापर युग में प्रचलित रहा होगा।

महाभारत में चौसर का खेल भी प्रचलित था जो आधुनिक लूडो जैसा था जबकि चतुरंग रणनीतिक युद्ध-बोर्ड खेल था। रामायण और महाभारत में चतुरंग नामक युद्ध संरचना का उल्लेख है, जिसमें पैदल सेना, घुड़सवार सेना, रथ और युद्ध हाथी शामिल होते थे। इतना ही नहीं, चालुक्य शासक सोमेश्वर तृतीय द्वारा संकलित 12वीं शताब्दी के ज्ञानकोश ग्रंथ मानसोलसा में चतुरंग के के नियमों और सांस्कृतिक महत्व का विस्तार से वर्णन किया गया है।

शतरंज का सफर : भारत से यूरोप तक

चतुरंग का खेल भारत से होते हुए सबसे पहले फारस (ईरान) पहुंचा। फ़िरदौस कृत फ़ारसी महाकाव्य शाहनामा के अनुसार, “चतुरंग खेल खुसरो नुशीरवान (531-579) के शासनकाल में एक भारतीय विद्वान के जरिए फ़ारसी साम्राज्य में पहुँचा। फारसियों को यह खेल बेहद पसंद आया, जिससे उन्होंने इसमें काफी बदलाव किए जैसे शाह और मत यानि कि चेकमेट।

सातवीं शताब्दी में फारस पर अरब विजय के बाद यह खेल अरब देशों में खूब चर्चित हुआ,  इस दौरान खेल में ऊँट और वजीर आदि मोहरे बढ़ाए गए और इसे खेलने की क्रिया में काफी परिवर्तन किए गए। कालांतर में चतुरंग से बदलकर इसका नाम चतरंग तत्पश्चात शतरंज रखा गया।

बतौर पुरातात्विक साक्ष्य उज्बेकिस्तान के समरकन्द (दुनिया के सबसे प्राचीन शहरों में से एक) में तकरीबन 760 ईस्वी के हाथी दांत के कुछ मोहरे मिले हैं, इन मोहरों की शैली भारतीय कलात्मक परम्पराओं को दर्शाती है। ये माहेरे भारतीय मूल और रेशम मार्ग (Silk Road) के जरिए पूर्व की तरफ जाने के सिद्धान्त का समर्थन करते हैं।

इस प्रकार मुस्लिम व्यापारियों और यात्रियों के प्रयासों से यह खेल एशिया और यूरोप के अन्य देशों तक पहुंचा। जब यह खेल 8वीं-9वीं शताब्दी तक यूरोप पहुंचा तब इसे राजाओं का खेल कहा गया। फ्रांसीसियों ने इसे ईचेस (Eches) कहा जिसका अर्थ हैफेल होना।

अंग्रेजी में शतरंज को चेस’ (chess) नाम से जाना जाता है। शतरंज (Chess) का खेल दो खिलाड़ियों के बीच 64 खानों वाले चौकोर बोर्ड पर खेला जाता है जिसमें विरोधी खिलाड़ी राजा (King) को खतरे में डालकर 'शह और मात' (Check-mate) देना होता है।

चतुरंग खेलने का तरीका

चतुरंग में प्राचीन भारतीय सेना के चार अंगों - हाथी, रथ, घोड़े, और पैदल सैनिक का प्रति​निधित्व करने वाले मोहरों का उपयोग किया जाता था। यह खेल अष्टपद (8x8 खानों वाले बोर्ड) पर खेला जाता था। चतुरंग खेल में दोनों प्रति​द्वंदियों की सेना में राजा, मंत्री, रथ, अश्व (घोड़ा), गज (हाथी) और पैदल सैनिक (प्यादा) नामक मोहरे शामिल होते थे।

राजा आज के शतरंज के समान ही सभी दिशाओं में एक कदम चल सकता था।

मंत्री   यह मोहरा केवल एक कदम तिरछे चल सकता था।

रथ यह मोहरा आड़ी अथवा खड़ी बिल्कुल सीधी रेखा में कितने भी खाने चल सकता था।

अश्व (घोड़ा) घोड़ा एल आकार में ढाई कदम कूदकर चलता था, शतरंज में यह नियम आज तक अपरिवर्तित है।

हाथी गज को ठीक दो कदम तिरछा कूदकर चलना होता था।

पैदाति पैदल सैनिक केवल एक कदम सीधा आगे बढ़ता था और तिरछे दुश्मन को काटता था।

शतरंज खेलने का तरीका

शतरंज भी दो खिलाड़ियों के मध्य खेला जाता है। यह दिमागी खेल भी 64 खानों वाले बोर्ड पर खेला जाता है। इसमें प्रत्येक खिलाड़ी के पास 16 मोहरे होते हैं। इस खेल का अंतिम लक्ष्य विरोधी राजा को खतरे में डालना (शह) और उसे भागने का कोई मौका न देना (मात) होता है।

राजा यह किसी भी दिशा में एक कदम चल सकता है। किन्तु इसे सुरक्षित रखना खेल का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।

रानी/वजीर शतरंज का यह सबसे शक्तिशाली मोहरा सीधी या तिरछी दिशा में बिना किसी रुकावट के चाहे जितने खाने चल सकती/सकता है।

हाथी यह मोहरा आगे, पीछे, दाएं या बाएं सीधी रेखा में कितने भी कदम चल सकता है।

ऊँट यह मोहरा केवल तिरछी दिशा में कितने भी कदम चल सकता है।

घोड़ा अश्व एकमात्र मोहरा है जो दूसरे मोहरों के ऊपर से कूद सकता है। घोड़ा एल आकार में दो कदम आगे और एक कदम दाएं या बाएं चलता है।

प्यादा (पैदल सैनिक) यह मोहरा सर्वदा एक कदम सीधा आगे चलता है, हांलाकि शुरुआत में यह दो कदम भी चल सकता है। प्यादा अपने विरोधी मोहरों को केवल तिरछे तरीके से काटता है।

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