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Chera dynasty was famous for its spice trade with Rome.

रोम के साथ मसालों के व्यापार के लिए विख्यात था यह राजवंश

ऐतरेय ब्राह्मण ग्रंथ एवं अशोक के दूसरे शिलालेख में दक्षिण भारत के चेर राजवंश को केरलपुत्र कहा गया है। चेर साम्राज्य का विस्तार आधुनिक कोयम्बटूर, सलेम तथा करूर जिले (तमिल नाडु) तथा मध्य केरल के कुछ क्षेत्रों के पास केन्द्रित था। प्राचीन भारतीय इतिहास में चेर राजवंश रोमन साम्राज्य के साथ मसालों के व्यापार के लिए प्रसिद्ध था। इतना ही नहीं, दक्षिण में गन्ने की खेती का जनक भी चेर राजवंश को ही माना जाता है।

पहली शताब्दी ईस्वी की चर्चित किताब पेरिप्लस ऑफ दि एरिथ्रीयन सी में भारत तथा रोम के बीच होने वाले व्यापार का विस्तृत वर्णन मिलता है। यह भी सच है कि जब तक रोम के साथ व्यापार जारी रहा, तब तक चेर राजवंश भी समृद्धिशाली बना रहा, किन्तु जब व्यापार का पतन हुआ तब चेर राज्य का भी पतन हो गया।

अब आपका सोचना लाजिमी है कि रोम और चेर राजवंश के बीच मसालों के अतिरिक्त अन्य किन-किन चीजों का व्यापार होता था। जाहिर उन दिनों जलमार्ग के जरिए ही व्यापार होता था, ऐसे में चेर राजवंश के प्रमुख बन्दरगाह कौन-कौन से थे, जहां रोम के व्यापारिक जहाज रूकते थे। इन सभी प्रश्नों का जवाब जानने के लिए यह रोचक स्टोरी जरूर पढ़ें। 

चेर राजाओं का संक्षिप्त परिचय

ऐतरेय ब्राह्मण ग्रंथ तथा अशोक के दूसरे शिलालेख में दक्षिण भारत के चेर राजवंश को केरलपुत्र कहा गया है। चेर साम्राज्य का विस्तार आधुनिक कोयम्बटूर, सलेम तथा करूर जिले (तमिल नाडु) तथा मध्य केरल के कुछ क्षेत्रों के पास केन्द्रित था। चेरों की राजधानी करुयूर (अब पणजी) थी। चेर राजवंश का प्रतीक चिह्न धनुष-बाण था।

संगम कवियों के अनुसार, चेर राजवंश के पहले शासक उदियजीरल (तकरीबन 130 ईस्वी) ने महाभारत युद्ध में भाग लेने वाले सभी योद्धाओं को भोजन कराया था, हालांकि इस सम्बन्ध में कोई पुख्ता सबूत नहीं है।

उदियजीरल का पुत्र नेदुजीरल आदन तकरीबन 155 ईस्वी में राजा बना। नेदुजीरल आदन ने मालाबार तट पर अपने शत्रु को पराजित कर रोम तथा अरब व्यापारियों को बन्दी बना लिया था, बाद में हीरे-मोती एवं बहुमूल्य मणियों को लेकर उन्हें मुक्त कर दिया। एक अन्य अनुश्रुति के अनुसार, नेदुजीरल ने सात राजाओं को हराकर अधिराज की उपाधि धारण की।

यह भी विवरण मिलता है कि नेदुजीरल ने हिमालय तक अपने राज्य का विस्तार कर इमयवम्बन की उपाधि ग्रहण किया, किन्तु यह भी प्रामाणिक नहीं है। नेदुजीरल अदन का चोल शासक इलेंजेतिचिन्न के साथ भीषण संघर्ष हुआ, इस युद्ध में दोनों शासक मारे गए और दोनों की रानियां सती हो गईं। नेदुजीरल आदन के दो पुत्र कलंगायक्कणि तथा सेनगुट्टुवन थे।

सेनगुट्टुवन चेर राजवंश का सबसे प्रतापी शासक हुआ जो 180 ईस्वी के लगभग राजा बना। सेनगुट्टुवन एक वीर योद्धा तथा कुशल सेनानायक था। उसके पास हाथी, घोड़ों की विशाल सेना के साथ एक नौसैनिक बेड़ा भी था। उसने राज्य का विस्तार पूर्वी तथा पश्चिमी समुद्र तट तक किया।

इतना ही नहीं, सेनगुट्टुवन ने उत्तर दिशा में चढ़ाई की और गंगा नदी को पार किया। सेनगुट्टुवन के पश्चात चेर राजवंश कई उप शाखाओं में बंट गया। निष्कर्षत: ​उदियजीरल, नेदुजीरल आ​दन और सेनगुट्टुवन ही चेर राजवंश के प्रसिद्ध शासक थे। चेर साम्राज्य में महिलाओं को उच्च स्थान प्राप्त था। शाही रानी तो प्रत्येक धार्मिक समारोहों में राजा के बगल में बैठती थी।

रोम के साथ व्यापार

संगम साहित्य से पता चलता है कि चेरों तथा रोम के साथ व्यापारिक सम्बन्ध अपने चरम पर था। चेरों के प्रमुख बन्दरगाह मुशीरी, पुहार तथा तोण्डी रोमन व्यापारियों के प्रमुख केन्द्र थे, जहां रोमन व्यापारियों की बस्तियां थीं। चेरों के प्रमुख बन्दरगाह मुशीरी में अपने व्यापारिक हितों की सुरक्षा के लिए रोमनों ने अपनी दो सैन्य टुकड़ियों की तैनाती कर रखी थी।

चर्चित किताब पेरिप्लस ऑफ दि एरिथ्रीयन सीके मुताबिक, रोमन व्यापारी अपने जहाजों में सोना और शराब भरकर नोरा, मुशिरी, तोण्डी तथा नेल्सिंडा जैसे पश्चिमी तट के समृद्ध बन्दरगाहों पर उतरते थे तथा उसके बदले में काली मिर्च, हाथीदांत, रेशम, मोती, मलमल, कीमती रत्न, नीलम, शंख आदि ले जाते थे। विलासिता के इन सामानों की पूरे रोमन साम्राज्य में खूब डिमांड थी। हैरानी की बात है कि रोम के साथ व्यापारिक सम्बन्धों में ज्यादातर भारत को ही लाभ होता था।

रोम के साथ चेर राजवंश मुख्यतया काली मिर्च (यवनप्रिया) का व्यापार करता था। रोमन व्यापारी मिर्च के बदले भारी मात्रा में सोना लाते थे, इसलिए काली मिर्च को काला सोना भी कहा गया। बतौर साक्ष्य -चेर शासित प्रदेशों में रोमन स्वर्ण सिक्के, एम्फ़ोरा (शराब के कंटेनर) के टुकड़े, बर्तन आदि प्राप्त हुए हैं। कुछ ऐसे भी सिक्के मिले हैं जिस पर रोमन सम्राटों आगस्टस, नीरो, टायवेरियस आदि का चित्र बना हुआ है। रोमनों ने चेर क्षेत्र में ऑगस्टस को समर्पित एक मंदिर का भी निर्माण करवाया था, जो स्थानीय संस्कृति के साथ-साथ चेर-रोमन व्यापार पर उनके प्रभाव को गहराई से दर्शाता है।

इन उपरोक्त साक्ष्यों से पता चलता है कि ईसा की प्रथम दो शताब्दियों में भारत तथा रोम के साथ गहरा व्यापारिक सम्बन्ध था। हांलाकि तीसरी और चाथी शताब्दी में रोमन साम्राज्य के पतन के साथ ही मसाला व्यापार कम हो गया और उनकी जगह चीन और अरब/मध्य के पूर्वी नाविकों ने ले ली।

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