इल्बारी तुर्क इल्तुतमिश को ‘दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक’ माना जाता है। तुर्क सुल्तानों में इल्तुतमिश ने लाहौर के स्थान पर दिल्ली को राजधानी बनाया।
इल्तुतमिश ने 1226 ई.में रणथम्भौर को जीता। जालौर के चौहान शासकों को अपने अधीन किया। तत्पश्चात बयाना, साम्भर, अजमेर व नागौर को भी दिल्ली सल्तनत में मिला लिया। अपनी जीत की खुशी में सुल्तान ने नागौर में ‘अतारकिन का दरवाजा’ भी बनवाया।
किन्तु साल 1227 में सुल्तान इल्तुतमिश को ‘भूताला के युद्ध’ में मेवाड़ के हाथों पहली बार करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। अब आप सोच रहे होंगे कि मेवाड़ का वह शासक कौन था, जिसने दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश को बुरी तरह पराजित किया? एक सवाल यह भी उठता है कि भूताला युद्ध का वर्णन इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में क्यों नहीं मिलता है? इन सभी प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए यह रोचक स्टोरी जरूर पढ़ें।
सुल्तान इल्तुतमिश का राजपूताना पर प्रहार
‘दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक’ इल्तुतमिश ने बंगाल और बिहार को अपनी अधीन करने के बाद हिन्दू राजाओं के प्रति आक्रमणकारी नीति का पालन किया। उसने 1226 ई. में रणथम्भौर को जीता तत्पश्चात परमारों की राजधानी मन्दौर पर भी अधिकार कर लिया।
साल 1228-1229 में जालौर के शासक उदय सिंह को पराजित कर वार्षिक कर देने हेतु बाध्य किया। तत्पश्चात इल्तुतमिश ने बयाना, साम्भर, अजमेर, नागौर सहित आसपास के क्षेत्रों को जीत लिया। किन्तु इसी बीच 1227 ई. में सुल्तान इल्तुतमिश को मेवाड़ के शासक जैत्र सिंह के हाथों करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा।
भूताला का युद्ध (1227 ई.)
दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश ने मेवाड़ के शासक रावल जैत्र सिंह के बढ़ते प्रभाव को दबाने के लिए 1227 ई. के आसपास मेवाड़ की राजधानी नागदा पर आक्रमण उसे तहस-नहस कर दिया। ऐसे में रावल जैत्र सिंह ने सर्वप्रथम चित्तौड़गढ़ को मेवाड़ की राजधानी बनाई।
नागदा का विनाश करने के पश्चात सुल्तान इल्तुतमिश ने मेवाड़ को दिल्ली सल्तनत के अधीन करने का निर्णय लिया। लिहाजा साल 1227 में गोगूंदा क्षेत्र के भूताला घाटी में मेवाड़ी सेना और सुल्तान इल्तुतमिश के सैनिकों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। भारतीय इतिहास में इसे ‘भूताला का युद्ध’ भी कहते हैं।
भूताला के युद्ध में रावल जैत्र सिंह और उनके पुत्र राणा तेज सिंह के नेतृत्व में मेवाड़ी राजपूतों ने असीम शौर्य कर प्रदर्शन करते हुए मुस्लिम आक्रमणकारियों को बुरी तरह पराजित किया। भूताला के युद्ध में रावल जैत्र सिंह के विरूद्ध सुल्तान इल्तुतमिश की करारी हार का वर्णन जयसिंह सूरी कृत ‘हम्मीर हद मर्दन’ में विस्तार से किया गया है। इसके अतिरिक्त 1273 ई० के ‘चिरवा शिलालेख’ में भी इसका जिक्र मिलता है।
ध्यान देने योग्य बात है कि जहां एक तरफ राजपूत अभिलेखों में नागदा के विनाश तथा इल्तुतमिश की पराजय का विस्तृत विवरण मिलता है, वहीं दूसरी तरफ किसी भी मुस्लिम इतिहासकार ने इल्तुतमिश के मेवाड़ अभियान का उल्लेख तक नहीं किया है। इस सम्बन्ध में डॉ. के.एस. लाल का मत है कि “मुस्लिम इतिहासकारों की चुप्पी सुल्तान इल्तुतमिश की पराजय सुनिश्चित करती है, क्योंकि सुल्तानों के विफल अभियानों का उल्लेख नहीं करना उनकी परम्परा रही है।”
रावल जैत्र सिंह की प्रशंसा में राजस्थान के प्रख्यात इतिहासकार डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा लिखते हैं कि “दिल्ली के गुलाम सुल्तान के समय मेवाड़ के राजाओं में सबसे प्रतापी एवं शक्तिशाली राजा जैत्रसिंह ही हुआ। जिसकी वीरता की प्रशंसा विपक्षियों ने भी की है।” इसके अलावा इतिहासकार डॉ. दशरथ शर्मा ने जैत्रसिंह के शासनकाल को ‘मध्ययुगीन मेवाड़ का स्वर्णकाल’ तथा राजा जैत्र सिंह को ‘मेवाड़ की नवशक्ति का संचारक’ कहा है।
जैत्र सिंह का संक्षिप्त परिचय
मध्यकालीन मेवाड़ के इतिहास में रावल जैत्र सिंह का महत्वपूर्ण स्थान है। जैत्र सिंह के नेतृत्व में मेवाड़ राज्य की शक्ति का विस्तार उस समय हुआ जब अजमेर में चौहानों की शक्ति का पतन हो चुका था और राजस्थान का एक बड़ा भूभाग तुर्क सेनाओं के अधीन हो चुका था। ऐसे में मेवाड़ की नवोदित शक्ति से सशंकित होकर दिल्ली के तुर्क सुल्तानों ने उसकी शक्ति को कुचलने का प्रयास किया।
पदम सिंह का पुत्र जैत्रसिंह 1213 ई. में मेवाड़ के सिंहासन पर बैठा और उसने 1252 ई. तक शासन किया। जैत्र सिंह ने अपने सैन्य अभियानों के दम पर न केवल मेवाड़ को सुदृढ़ बनाया बल्कि राज्य की सीमाओं का विस्तार कर अपने राजनीतिक प्रभुत्व को भी बढ़ाया।
जालौर के चौहान वंश के संस्थापक कीर्तिपाल (कीतू) ने गुहिल राजा सामंत सिंह को परास्त कर चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया था। ऐसे में जैत्र सिंह जैसे ही मेवाड़ की गद्दी पर बैठा, उसने गुहिलों की पराजय का बदला लेने के लिए चौहान वंश के राजा उदयसिंह के नाडौल राज्य पर आक्रमण कर दिया। अत: नाडौल को विनाश से बचाने के लिए उदय सिंह ने अपनी पौत्री रूपा देवी का विवाह जैत्र सिंह के पुत्र तेजसिंह के साथ करके मेवाड़ के साथ मैत्री सम्बन्ध स्थापित कर लिया।
डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा के मुताबिक, राजा जैत्र सिंह ने मालवा नरेश देवपाल को भी पराजित किया। हांलाकि गुजरात के सोलंकियों एवं जैत्रसिंह के आपसी सम्बन्धों के बारे में सटीक जानकारी नहीं मिल पाती है। डॉ. ओझा के अनुसार, गुजरात के वघेलवंशी शासक वीरधवल के दो मंत्रियों वास्तुपाल और तेजपाल ने तुर्कों की बढ़ती हुई शक्ति से लोहा लेने के लिए जैत्रसिंह के पास सन्धि प्रस्ताव भेजा था, किन्तु राजा जैत्र सिंह ने यह सन्धि प्रस्ताव ठुकरा दिया।
इससे स्पष्ट होता है कि मेवाड़ का शासक जैत्र सिंह गुजरात के प्रभाव से मुक्त हो चुका था और उसकी सैनिक शक्ति काफी सुदृढ़ हो चुकी थी। जैत्र सिंह की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र तेज सिंह 1252 ई. में मेवाड़ का शासक बना। तेजसिंह के गद्दी पर बैठते ही 1252-53 ई. में सुल्तान बलबन ने भी मेवाड़ पर असफल आक्रमण किया।
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