मुगल बादशाह शाहजहां ने अपने सबसे बड़े पुत्र दाराशिकोह को अपना अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था। शाहजहां ने अपनी ताजपोशी के दिन ही दाराशिकोह को 60000 जात और 40000 सवार का मनसब प्रदान किया था जबकि औरंगजेब को केवल 20000 जात और 15000 सवार की मनसबदारी दी थी। उसी दिन से औरंगजेब को इस बात का अहसास हो गया कि शाहजहां अपने तीनों पुत्रों में सबसे बड़े बेटे दाराशिकोह को ज्यादा महत्त्व देता था। इतना ही नहीं औरंगजेब की नजरों में दाराशिकोह एक काफिर था, क्योंकि वह मुगल दरबार में न केवल शिया मुसलमानों को प्रोत्साहित कर रहा था बल्कि हिन्दुओं को भी आगे बढ़ा रहा था। दाराशिकोह के चलते बहुत से हिन्दु सरदार और शिया मुगल दरबार में बड़ा ओहदा हासिल कर चुके थे।
इसी वजह से शाहजहां के बीमार पड़ते ही दक्कन के सूबेदार औरंगजेब और मालवा सूबे में नियुक्त मुरादबक्श ने मिलकर दाराशिकोह को काफिर घोषित कर दिया तत्पश्चात औरंगजेब ने अपने पिता शाहजहां को मुगलिया तख्त से हटाकर आगरा के किले में कैद कर दिया। इतना ही नहीं औरंगजेब ने स्वयं को मुगल बादशाह घोषित कर दिया और उत्तराधिकार की लड़ाई में दारा शिकोह को हराकर जेल भेज दिया और कुछ ही दिनों बाद दारा को मौत का आदेश दे दिया।
शाहजहां के दरबार में नियुक्त शाही इतिहासकार मोहम्मद सालेह कम्बोह लाहौरी ने अपनी कृति शाहजहांनामा में लिखा है कि ‘जब शहजादे दाराशिकोह को कैद करके दिल्ली लाया गया तब उनके शरीर पर मैले-कुचैले कपड़े थे।’ बर्नियर लिखता है कि “दारा के पैर ज़ंजीरों में बंधे हुए थे, लेकिन उसके हाथ आज़ाद थे बावजूद इसके उन्हें इसी हालत में हाथी पर सवार करके खिज़राबाद में लाया गया और कुछ समय के लिए एक संकीर्ण और अंधेरी जगह में रखा गया। इसके कुछ ही दिनों बाद जल्लाद जेल में दाखिल हुए और क्षणभर में ही दारा के गले पर खंजर चलाकर उसकी हत्या कर दी। खून से सने उन्हीं कपड़ों में दाराशिकोह को हुमायूं के मक़बरे में दफन कर दिया गया।”
बता दें कि मुगल उत्तराधिकार की लड़ाई में दाराशिकोह के हारने की सबसे बड़ी वजह यह थी कि बादशाह शाहजहां अपने प्रिय पुत्र दाराशिकोह को शुरू से ही सैन्य अभियानों में भेजने से कतराते रहे थे, और उन्हें हमेशा अपनी आंखों के सामने अपने दरबार में रखा। शायद यही वजह रहा कि दाराशिकोह को प्रशासन और सैन्य मामलों में कोई रुचि नहीं थी। दाराशिकोह की सबसे बड़ी कमी यह थी कि उनके अन्दर लोगों को पहचानने की समझ बहुत संकुचित थी। जबकि ठीक इसके विपरीत औरंगजेब 16 वर्ष की अवस्था से ही सैन्य अभियानों का नेतृत्व करते आ रहा था।
अवीक चंदा अपनी किताब 'दारा शुकोह, द मैन हू वुड बी किंग' में लिखती हैं कि औरंगजेब की तुलना में दाराशिकोह एक बहुआयामी और जटिल व्यक्तित्व का था। वह विचारक, प्रतिभाशाली कवि, अध्येता, उच्चकोटि का धर्मशास्त्री, सूफी और ललित कलाओं का पारखी और बेहद गर्मजोश इंसान था।
स्वयं दाराशिकोह भी अपनी साधारण जीवनशैली के कारण मुगल शहजादा कम और फकीर ज्यादा लगता था। जीवन के शुरूआती दौर में वह ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती के कादरिया सम्प्रदाय से प्रभावित था, लेकिन बाद में वह हिन्दू धर्म में अनुरक्त होता चला गया। दाराशिकोह सूफी संतों,मुसलमान उलेमाओं और दरवेशों से जितना संपर्क रखता था, उतनी ही रूचि उसे हिन्दू विद्वानों में भी थी। अपने समय के प्रतिभाशाली लेखकों में से दाराशिकोह भी एक था। दाराशिकोह ने सूफी संतों के जीवन चरित्र पर आधारित दो पुस्तकें ‘सफीनात अल औलिया’ और ‘सकीनात अल औलिया’ की रचना की। उसके द्वारा लिखित पुस्तकें ‘रिसाला ए हकनुमा’ और ‘तारीकात ए हकीकत’ में सूफीवाद का दार्शनिक विवेचन किया गया है।
दाराशिकोह के कविता संग्रह ‘अक्सीर-ए-आजम’ में सभी धर्मों के प्रति आदरभाव का बोध होता है। दाराशिकोह के सर्वाधिक चर्चित ग्रंथ ‘मजमा अल बहरेन’ में वेदान्त और सूफीवाद के शास्त्रीय शब्दों का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। दाराशिकोह ने हिन्दूओं के 52 उपनिषदों का फारसी में अनुवाद करके ‘सीर-ए-अकबर’ नामक ग्रंथ की रचना की। दाराशिकोह ने श्रीमद्भगवद्गीता और योग वासिष्ठ का भी फारसी भाषा में अनुवाद किया।
दाराशिकोह की विभिन्न कृतियों से ज्ञात होता है कि वह हिन्दू धर्म, दर्शन और पुराणों से बहुत ज्यादा प्रभावित था। जहां कुछ लोग उसे पंडितजी कहने लगे थे तो कुछ काफिर। दाराशिकोह के कुछ कट्टर आलोचकों ने लिखा है कि दाराशिकोह कभी-कभी रामनामी ओढ़कर सार्वजनिक जगहों पर दिखाई देता था। उसने शाही मोहरों पर भी राम नाम अंकित करवा लिया था। यह सब देखकर मुल्ला, मौलवी, उलेमा उसे काफिर समझने लगे थे।
दाराशिकोह नियमित रूप से नमाज पढ़ता लेकिन वह सनातन धर्म के गूढ़ रहस्यों को जानने के लिए सदैव उत्सुक रहता था इसलिए प्रभु नाम की अंगूठी भी पहनता था। वह मस्जिद में सिजदा भी करता था और मंदिर में भी आस्था रखता था। उसके एक हाथ में कुरान थी और दूसरे हाथ में पवित्र उपनिषद लेकिन मुगल सत्ता की लड़ाई में उसे काफिर बताकर उसकी हत्या कर दी गई। दरअसल मौलवी- मुल्ला इस बात से डर गए थे कि यदि आम मुसलमान दाराशिकोह की बातें मानने लगा तो हिन्दुस्तान में इस्लाम का क्या होगा?