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Sufi saint hazrat jalaluddin bukhari uch sharif who visited Mecca 36 times

36 बार मक्का की यात्रा करने वाले इकलौते सूफी संत का इतिहास

भारत में चिश्ती, नक्शबंदी, कादरी और सुहरावर्दी ऐसे चार प्रमुख सिलसिले हैं जिनका इस देश की संस्कृति पर गहरा प्रभाव रहा है। आज हम आपको सुहरावर्दी सिलसिले के एक ऐसे सूफी संत के बारे में बताने जा रहे हैं जिसे जहानियाँ जहां गश्त’ (विश्व का यात्री) की उपाधि से नवाजा गया। ऐसा कहा जाता है कि सूफी सिलसिलों में यह एकमात्र ऐसे सूफी संत थे जिन्होंने एक-दो बार नहीं ​अपितु 36 बार मक्का की यात्रा की। इतना कुछ जानने के बाद आप भी उस सूफी संत के बारे में जानने को इच्छुक हो चुके होंगे, ऐसे में इस रोचक स्टोरी को जरूर पढ़ें।

सैयद जलालुद्दीन बुखारी

भारत में सुहरावर्दी सिलसिले के प्रवर्तक शेख बहाउद्दीन जकारिया के शिष्य सैयद जलालुद्दीन बुखारी ने उच्छ (सिन्ध) में खानकाह स्थापित कर सुहरावर्दी सिलसिले के जलाली शाखा की स्थापना की। सैयद जलालुद्दीन बुखारी कोजलाल सुर्ख (लाल) या सुर्ख-पोश बुखारी (बुखारा के लाल वस्त्रधारी) के नाम से भी जाना जाता है। चूंकि सैयद जलालुद्दीन बुखारी हमेशा लाल चोगा पहनते थे इसीलिए उन्हें सुर्ख-पोश (लाल वस्त्रधारी) की उपाधि मिली।

ऐसा कहा जाता है कि तकरीबन 1198 . में उच्छ शरीफ (अब पाकिस्तान में) में जन्में सैयद जलालुद्दीन सुर्ख बुखारी ने 36 बार मक्का की यात्रा की। इतना ही नहीं,  सैयद जलालुद्दीन सुर्ख बुखारी ने मिस्र, सीरिया, फिलिस्तीन, मेसोपोटामिया, बल्ख, बुखारा, खुरासान, इराक और मक्का सहित कई अन्य देशों की यात्राएं पूर्ण की, इसीलिए सुर्ख बुखारी को जहानियाँ जहां गश्त’ (विश्व का यात्री) की उपाधि से नवाजा गया।

सैयद जलालुद्दीन बुखारी को सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक ने शेख-उल-इस्लाम’ (मुख्य काजी) के पद पर नियुक्त किया तथा सिवास्तान में चालीस खानकाह प्रदान किए। किन्तु वे अपना पद त्याग कर हज के लिए मक्का चले गए। सुल्तान फ़िरोज़ शाह तुगलक के आध्यात्मिक गुरु भी थे जहानियां जहांगश्त। उन्होंने अपने शिष्य फिरोजशाह को कदम शरीफ भेंट किया। दिल्ली के पहाड़गंज स्थित दरगाह कदम शरीफ में पैगंबर के पदचिह्न वाला एक पत्थर भी है, जिसे जहानियां जहांगश्त द्वारा मक्का से लाया गया था। सुल्तान फ़िरोज़शाह तुगलक की धार्मिक नीतियों पर भी उनका गहरा प्रभाव था।

सैयद जलालुद्दीन सुर्ख बुखारी ने तीन शादियां की थी। उनकी पहली पत्नी का नाम बीबी फातिमा था जिनसे दो बेटे हुए : हजरत सैयद अली और हजरत सैयद जाफर। ये दोनों बुखारा में ही रहकर उनके धार्मिक विरासत को आगे बढ़ाया। बुखारी की दूसरी पत्नी का नाम बीबी जैनब था, जिनसे हजरत सैयद सदरुद्दीन मुहम्मद गौस का जन्म हुआ। इसी वंश में कन्नौज के मशहूर संत हजरत पीर शाह जूना हुए जो उत्तरी भारत के प्रभावशाली ​सूफियों में से एक थे। सैयद जलालुद्दीन बुखारी की तीसरी पत्नी बीबी ज़ाहिदा ने हज़रत सैयद बहाउद्दीन मासूम और हज़रत सैयद अहमद कबीर को जन्म दिया।

सैयद जलालुद्दीन सुर्ख बुखारी ने एक इस्लामी धर्म प्रचारक के रूप में आजीवन यात्राएं की तथा दक्षिणी पंजाब और सिंध क्षेत्रों में सम्मा, सियाल, चधार, दाहेर और वारार जनजातियों को इस्लाम में परिवर्तित किया। सैयद जलालुद्दीन सुर्ख बुखारी तकरीबन 1244 ई. में अपने पुत्र बहा-उल-हलीम के साथ पंजाब के उच्छ में चले गए, जहाँ उन्होंने एक धार्मिक विद्यालय की स्थापना की।

1292 ई. में सैयद जलालुद्दीन सुर्ख बुखारी की मृत्यु हो गई तत्पश्चात उन्हें उच्छ में ही दफनाया गया था किन्तु घग्गर-हाकरा नदी की भयंकर बाढ़ से उनकी कब्र क्षतिग्रस्त हो गई तत्पश्चात उनके कब्र को कत्तल शहर में स्थानांतरित कर दिया गया। मुहम्मद नासिर-उद-दीन के पुत्र सज्जादा नशीन मखदूम हामिद ने बुखारी के अवशेषों को पुन: में उच्छ में स्थापित कर, उसके ऊपर एक शानदार कब्र का निर्माण करवाया।

बाद में, इस कब्र का पुनर्निर्माण 1670 ई. में बहावलपुर के नवाब बहावल खान द्वितीय द्वारा करवाया गया। हजरत सैयद जलालुद्दीन बुखारी की दरगाह उच्छ शरीफ में है, जहां हर साल चैत्र महीने में उर्स मनाया जाता है। यह उर्स सात दिनों तक चलता है और इसमें कव्वाली, धमाल, सामूहिक लंगर आदि का आयोजन होता है।

हज़रत सैयद जलालुद्दीन सुर्ख-पोश बुखारी के वंशज आज भी उनकी मज़ारों के रखवाले हैं। सैयद जलालुद्दीन बुखारी के वंशजों जिन्हें जलाली सैयद के नाम से जाना जाता है, आज भी पंजाब, सिंध, गुजरात, बरेली, अमरोहा और यहां तक ​​कि तुर्की के कुछ हिस्सों में पाए जाते हैं। हजरत सैयद जलाल बुखारी का लाल चोगा जलाली सूफी वंश की पहचान बना हुआ है। हजरत बुखारी को केवल उपदेशक ही नहीं अपितु एक ऐसे संत के रूप में याद किया जाता है जिन्होंने लोगों के दिलों और समाज को जोड़ने का काम किया।